बेवजह बचाव की मुद्रा में है कांग्रेस!

१८ दिसंबर २०१०

कट्टरपंथी हिन्दू संगठनों द्वारा फैलाए जाने वाले धार्मिक तनाव को लेकर राहुल गांधी द्वारा की गई टिप्पणी पर भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खेमों मेें बवाल मचने को एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया माना जाना चाहिए। पर अपने युवा महासचिव की अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर के साथ हुई बातचीत को लेकर कांग्रेस पार्टी जिस तरह से बचाव की मुद्रा में आ गई और अपने आप को शॄमदगी से बचाने के लिए जिस तत्परता से पार्टी ने राहुल गांधी की ओर से नया बयान जारी किया वह कहीं ज्यादा चौंकाने वाला है। देश के हिन्दू संगठनों को लेकर कांग्रेस के ज्ञात विचारों के संबंध में देश में किसी तरह की भ्रम की स्थिति नहीं है। और न ही हिन्दू संगठन भी कांग्रेस के इस विचार के प्रति कोई दुविधा व्यक्त करना चाहेंगे कि हर प्रकार का आतंकवाद और सांप्रदायिकता भारत के लिए खतरा है। कांग्रेस महासचिव पूर्व में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना सिमी के साथ कर चुके हैं और इस संबंध में उनकी पार्टी ने राहुल के बयान के संबंध में कभी कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया जैसा कि विकीलीक्स वेबसाइट द्वारा जारी दस्तावेजों के जारी होने के बाद किया गया है। विकीलीक्स द्वारा केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम सहित देश के अन्य नेताओं और अधिकारियों को लेकर चौंकानेवाले खुलासे किए गए हैं पर सरकार अथवा कांग्रेस पार्टी द्वारा उनके संबंध में कोई सफाई नहीं दी गई है। कोई आश्चर्य नहीं कि भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार की रुचि भी लड़ाई को केवल राहुल गांधी तक ही सीमित रखने की है। कारण भी स्पष्ट है कि विपक्षी दलों के लिए दूरसंचार घोटाले और राडिया टेप से उजागर हो रही जानकारियों से घिरे सत्तारूढ़ गठबंधन पर आगामी चुनावों तक दबाव बनाए रखने के लिए राहुल गांधी को ही निशाने पर ताने रखना जरूरी है। और ऐसा राहुल गांधी और कांग्रेस को हिन्दू-हितों का विरोधी करार देकर ही किया जा सकता है। आतंकवाद को जब रंगों में बांटा जाएगा तो फिर चुनावी राजनीति का भी अयोध्या और आजमगढ़ के बीच ध्रुवीकरण होने ही लगेगा। अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन के सम्मान में प्रधानमंत्री द्वारा दी गई दावत के दौरान बातचीत में अमेरिकी राजदूत के सवाल को राहुल गांधी अगर चाहते तो मनमोहन सिंह के अंदाज में टाल भी सकते थे। पर चूंकि संवेदनशील मुद्दों पर अपने मंतव्य किसी विदेशी राजनयिक के समक्ष इस तरह से जाहिर करने के मामले में कांग्रेस महासचिव को डॉ.मनमोहन सिंह जैसा निर्मम बनने में अभी वक्त लग जाएगा, विपक्षी दलों के लिए वे ऐसे ही साफ्ट टारगेट बनते रहेंगे और वे इसके लिए अपने आपको प्रस्तुत भी कर रहे हैं। यह मुद्दा अलग है कि कांग्रेस पार्टी में यथास्थितिवाद को कायम रखने का हामी खेमा अपने युवा महासचिव की राजनीति के साथ चाहे जितनी असहमति रखना चाहे, उनके कथन के बचाव में बयान जारी करते रहना या स्पष्टीकरण देते रहना उसकी अनुशासनात्मक मजबूरी बनी रहेगी। कांग्रेस पार्टी अपने इस वैचारिक द्वंद्व से बाहर नहीं निकल पाई है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित अन्य हिन्दू संगठनों के प्रति उसका वास्तविक एजेंडा क्या होना चाहिए। स्पष्ट है कि श्रीमती सोनिया गांधी की छवि के आसपास जिस कद और काठी के कांग्रेसी नेताओं का जमावड़ा नजर आता है उनमें से अधिकांश राहुल गांधी की फ्रेम से बाहर पाए जाते हैं। कार्यसमिति के सदस्यों का चयन चुनावों के जरिए हो या अध्यक्ष द्वारा मनोनयन से, पार्टी के आंतरिक द्वंद्व का केवल एक उदाहरण है। इस द्वंद्व के चलते इस हकीकत पर भी गौर किया जा सकता है कि पार्टी देश के अधिकांश राज्यों में सत्ता से बाहर है और बिहार के बाद आगामी वर्षों में होने वाले अन्य चुनावों को लेकर किसी तरह का सट्टा भी उसके पक्ष में हाल-फिलहाल तो नहीं लगाया जा सकता। कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग चूंकि राहुल गांधी को देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहता है, यह जरूरी है कि पार्टी अपने ही द्वारा बुनी गई भूल-भूलैया से बाहर आए। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने अपने इर्द-गिर्द जो तिलिस्म खड़ा कर लिया है वह कम से कम बाहर से तो विकीलीक्स के खुलासों से ज्यादा सनसनीखेज नजर आता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि नए साल की पूर्व संध्या पर आयोजित हो रहे कांग्रेस के राष्ट्रीय महाधिवेशन के बाद यह तिलिस्म टूटेगा और शीर्ष पार्टी नेतृत्व एक ही फोटो फ्रेम में नजर आने लगेगा। क्योंकि आत्मविश्वासपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता कि भविष्य में उजागर होने वाले गोपनीय दस्तावेज किस तरह के वार्तालापों को उगलने वाले हैं और किस-किस को वे अपना शिकार बनाएंगे।