‘बाबाओं’ की सवारी, राजनीति पर भारी

पने ही आश्रम की एक किशोरी के साथ दुष्कृत्य के आरोप में दो सप्ताह की न्यायिक हिरासत में जोधपुर केंद्रीय कारागृह में बंद आसाराम बापू के विशाल धार्मिक साम्राज्य का क्या अंत हो जाएगा? आसाराम बापू के खिलाफ लगे आरोपों के बारे में राजस्थान पुलिस का दावा है कि उन्हें सिद्ध करने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं। पर क्या हमारी न्यायिक प्रक्रिया इतनी सक्षम हो गई है कि आरोप साबित होकर तुरंत सजा का प्रावधान भी हो जाएगा और समूचे देश में मीडिया के मार्फत जो हाहाकार मचा है, वह थम जाएगा? ऐसा निश्चित ही नहीं होने वाला है। आसाराम बापू को मिल सकने वाली सजा को लेकर लग रही तमाम अटकलों को हाल-फिलहाल केवल जुबानी जमा-खर्च ही माना जाना चाहिए। आसाराम बापू ने अपने इर्द-गिर्द लाखों भक्तों और हजारों करोड़ की धन-संपत्ति का जो साम्राज्य खड़ा कर लिया है, वह अपने ‘गुरु’ को इतनी आसानी से एक सजायाफ्ता मुजरिम में नहीं बदलने देगा। सवाल केवल भक्तों की भावनाओं और अकूत संपत्ति की रक्षा का ही नहीं है, धर्म को हथियार बनाकर वोटों की राजनीति करने वाले दलों और उनके नेताओं का सुख-चैन भी इस समय दांव पर लगा हुआ है। भारतीय जनता पार्टी और उससे जुड़े संगठनों से जुड़े कुछ नेताओं ने जिस आक्रामकता से आसाराम बापू का बचाव किया और उनके खिलाफ आरोपों को हिंदुओं के प्रति षड्यंत्र बताने की कोशिश की, उससे यही संदेश गया है कि धर्म के नाम पर सत्ता की राजनीति का ही खेल खेला जा रहा है। महिलाओं के प्रति होने वाले अत्याचारों को एक ईमानदार मुद्दा बनने में अभी वक्त लगने वाला है।

त: ऐसा कुछ भी मान लेने की गलती नहीं करना चाहिए कि अभियोजन पक्ष की तमाम कोशिशों के बावजूद आसाराम बापू के खिलाफ जुटाए गए तमाम साक्ष्य न्याय की कसौटी पर अदालत में भी खरे साबित किए जा सकेंगे, सभी गवाह अंतिम फैसला आने तक पीड़िता का साथ देते रहेंगे और कि स्वयं पीड़िता और उसका परिवार तमाम प्रकार के दबावों और धमकियों को बर्दाश्त करते हुए अपनी लड़ाई को उचित अंजाम तक ले जाने में कामयाब हो सकेगा। महिलाओं के साथ दुष्कृत्य की हजारों घटनाएं प्रतिवर्ष देश में घटित होती हैं, पर न तो मीडिया और न ही समाज ही हरेक घटना को उतने आक्रामक तरीके से उठाता है, जैसा कि हाल की तीन घटनाओं के सिलसिले में हुआ है। दिल्ली के निर्भया कांड के बाद मुंबई के शक्ति मिल कंपाउंड में हुई सामूहिक बलात्कार की घटना और अब एक धार्मिक संत पर लगा आरोप। निश्चित ही जो प्रकरण इस समय सबसे ज्यादा चर्चा में है, उसने धर्म के नाम पर देशभर में बिछे तमाम साम्राज्यों की चूलों को तात्कालिक रूप से ही सही, हिलाकर रख दिया है। इसके अंतिम नतीजे दुनिया के उन देशों में भी निर्यात होने वाले हैं, जहां कि भारत भूमि के धर्म प्रतिष्ठानों की शाखाएं अमरबेल की तरह फैल रही हैं।

समें दो मत नहीं कि बहत्तर वर्षीय आसुमल सिरुमलानी या अपने भक्तों के बीच बापू के नाम से पूजे जाने वाले आसाराम इस समय अपनी लंबी ‘धार्मिक’ यात्रा के सबसे ज्यादा संकटपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं। उनके समर्थकों की व्यथा को सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी इस टिप्पणी से शायद और बढ़ा दिया होगा कि मादक पदार्थों की तस्करी करने वाले लोग या तो राजनीति में या फिर धर्म में प्रवेश कर संपत्तियों पर कब्जा कर लेते हैं और लोगों को तरकीबों से सम्मोहित करते रहते हैं। और यह भी कि एक आरोपी के इर्द-गिर्द इतनी बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मी तैनात किए जाते हैं।

साराम के खिलाफ इतना विपरीत वातावरण निर्मित हो जाने के बावजूद अगर लाखों भक्त उनके लिए अपनी जान भी देने के लिए तैयार हैं और अपने ‘बापू’ के खिलाफ आरोपों को स्वीकार करने को कतई राजी नहीं हैं तो वक्त आ गया है कि इन धार्मिक शिखर-पुरुषों के समाज में बढ़ते प्रभाव के असली कारणों की खोज में हम गंभीरता से जुट जाएं। आसाराम बापू के खिलाफ आरोपों की कतार वर्षों से लगी हुई है, पर ऐसा क्यों होता है कि ‘हर नए विवाद के बाद मेरे भक्तों की संख्या और बढ़ जाती है।’ इस मामले में आसाराम बापू कोई अपवाद नहीं हैं। कई दूसरे संतों, संन्यासियों और बाबाओं पर भी तरह-तरह के आरोप लगते रहते हैं, पर किसी के भी आश्रम, अनुयायियों या उत्पाद पर कभी कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ा। सही पूछा जाए तो उनकी हर प्रकार की संपदा में इजाफा ही होता रहा है। अत: यही मानकर चला जाना चाहिए कि आसाराम बापू के कारागृह में बंद रहते हुए या उन पर लगाए गए आरोपों के सिद्ध होने/न होने की स्थिति में भी न तो उनके ‘भक्तों’ की संख्या में कमी आने वाली है और न ही उनके आश्रमों की तादाद और जमीनों के रकबे कम होने वाले हैं।

पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक हजारों-लाखों की संख्या में मौजूद सभी तरह के साधु-संतों, बापुओं, स्वामियों और बाबाओं के भक्तों की संख्या भी एक अंदाज के मुताबिक देश की आधी आबादी से भी कहीं ज्यादा ही होनी चाहिए। लाखों की संख्या में फैले हुए मठों, आश्रमों, धार्मिक प्रतिष्ठानों और उनसे जुड़ी लाखों एकड़ की जमीन के मार्फत धर्म के रूप में दुनिया का एक ऐसा विशालतम उद्योग भारत में चल रहा है, जिसमें लाखों लोगों को रोजगार भी मिल रहा है और करोड़ों लोगों को केवल भगवान और भाग्य के भरोसे ही खुश रहकर जीना सिखाया जा रहा है। ये लोग भगवान के अलावा किसी और से अपने कष्टों के लिए शिकायत नहीं करते। इन करोड़ों लोगों के गुरु, बापू और बाबा अपने भक्तों की पीड़ा के लिए उनके स्वयं के भाग्य को ही जिम्मेदार ठहराते हैं और ये अनुयायी मान भी लेते हैं। गौर करने की बात है कि इन बाबाओं ने इतनी संपदा और ताकत अर्जित कर ली है कि अपने भक्तों और अनुयायियों को इनकी सीटी का केवल एक इशारा कि उनकी सारी तकलीफों के लिए भगवान नहीं, केवल सरकारें या पार्टियां ही दोषी हैं, सत्ताएं बदल सकता है। इसीलिए धर्म और राजनीति का एक ऐसा तगड़ा गठबंधन देश में कायम हो गया है कि सारे राजनीतिक दल और उनसे जुड़े कथित धर्मनिरपेक्ष नेता भी इन धर्मगुरुओं से खौफ खाने को मजबूर हैं। पार्टियों की ‘अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक’ तुष्टिकरण की नीतियों का संबंध वास्तव में सभी किस्म और संप्रदायों के धर्मगुरुओं की बढ़ती हुई ‘दादागिरी’ और वोट दिलाने के लिए उनके द्वारा समय-समय पर की जाने वाली राजनीतिक ‘सौदेबाजी’ से ही है। आसाराम बापू अगर इतने आत्मविश्वास के साथ समूची व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं तो उसके कारणों की खोज जोधपुर के केंद्रीय कारागृह के भीतर नहीं, बल्कि बाहर स्थित उन स्रोतों में की जानी चाहिए, जहां से धर्मगुरुओं को इतनी जबरदस्त ऊर्जा प्राप्त होती है। और सच्चाई यह भी है कि तमाम प्रहारों के बावजूद ये स्रोत कभी भी सूखने वाले नहीं हैं।