बदलाव के जज्बे के साथ करें वर्ष की अगवानी

र्ष 2012 की जब हमने शुरुआत की थी तब बेशक हम उम्मीदों से भरे हुए थे। हमें लगता था कि जिन आशाओं की सुबह के साथ हम नए साल में प्रवेश कर रहे हैं वे न सिर्फ पूरी ही होंगी बल्कि वर्ष 2012 का अंत एक ऐसी संतुष्टि के साथ होगा कि हम सिर उठाकर वर्ष 2013 की किरणों का स्वागत करेंगे। पर अफसोस इसी बात का है कि ऐसा नहीं हुआ। हमें पता भी है कि दरअसल ऐसा क्यों नहीं हुआ। हमारे सिर शर्म से क्यों झुके हुए हैं! हमारी तमाम उपलब्धियों को कैसे शर्मसार कर दिया गया! हमें यकायक उदास कर दिया गया। हरेक 31 दिसंबर की रात अपनी छोटी-छोटी बस्तियों में चिरागों की रोशनी में जश्न मनाने वाले युवा इस बार सड़कों पर मोमबत्तियों की लौ से अपनी हथेलियां क्यों जला रहे हैं? वे हथेलियों में मोमबत्तियां लिए हुए भर ही नहीं हैं बल्कि उनकी हथेलियों में बहुतेरे सुलगते सवाल हैं। ये सवाल एक किस्म का चौंकाने वाला आलोक पैदा कर रहे हैं, जिसमें उन्हें देश-समाज और सत्ता की हकीकतों की शक्लें साफ-साफ नजर आ रही है। इस कठिन वक्त में जवान हो रही पीढ़ियां उन्हें पहचान भी रही हैं। उन शक्लों के खिलाफ वक्त के रजिस्टर में कोई प्राथमिकी जरूर दर्ज होगी इसमें किसी को कोई संदेह नहीं है।
हरेक राष्ट्र की जिंदगी में कभी न कभी ऐसे क्षण आते ही हैं जब उसका साक्षात्कार अपने ही भीतर के अंधेरे से होता है। इस अंधेरे को लोग उजालों के पहले की एक अनिवार्य नियति मानते हैं। इसीलिए हम इसमें अपने लिए खुशियों के कुछ संकेत भी ढूंढ सकते हैं कि जिन संकल्पों के साथ हम नए साल की यात्रा आज से प्रारंभ कर रहे हैं वह अनूठी और अद्भुत है। ऐसा यकीन और विश्वास पैदा करने वाली है कि यह उस भारत का निर्माण कर सकेगी जिसका कि जिक्र पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 14-15 अगस्त 1947 की रात राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में ‘नियति से साक्षात्कार” के रूप में किया था। बहुत मुमकिन है कि वर्ष 2013 भारत को उस विकास दर से रू-ब-रू कराए जिसकी कि परिभाषा अर्थशास्त्र की अकादमिक किताबों में नहीं मिलती। हमें एक विकासशील समाज के नागरिकों की तरह बाकायदा भारत का उसकी उस नियति से साक्षात्कार कराने की उम्मीद रखनी होगी जिसकी कि देश को पिछले पैंसठ वर्षों से तलाश है।

ज की नई सुबह का भी हम सबको ठीक उसी तरह अभिनंदन करना चाहिए जैसा कि हमने पिछली बार किया था। ऐसा हर साल करते हैं। करते ही रहते हैं, थकते नहीं हैं। संभव है जिन संघर्षों की शुरुआत पिछले वर्ष या उसके भी पिछले साल से हुई है उन्हें न सिर्फ इस साल भी जारी रखना पड़े, बहुत दूर तक आगे भी ले जाना पड़े। वे निहित स्वार्थ जो अपने ही नागरिकों के हकों के खिलाफ हैं, बहुत आसानी से हार नहीं मानने वाले हैं। पर इस बार उन्हें पूरी तरह से हराना जरूरी है। हो सकता है, पराजय की प्रतीति हो। लेकिन जब ऐसा संदेह हो तो लड़ना और लड़ते रहने को एक धारावाहिक प्रतिज्ञा में बदल लेना चाहिए। अगर इस क्षण को हाथों से फिसल जाने दिया गया तो पता नहीं प्रतीक्षा फिर कितनी लंबी और यात्रा कितनी कठिन रहने वाली साबित हो। बहादुरी के जज्बे के साथ वर्ष 2013 की अगवानी करनी चाहिए।