बढ़ सकती हैं शिवराज की मुसीबतें

व्यावसायिक परीक्षा मंडल के कुख्यात फर्जीवाड़े में मध्यप्रदेश का समूचा राजनीतिक घटनाक्रम दिल्ली में तैयार की गई स्क्रिप्ट के मुताबिक ही चल रहा है। भोपाल का रोल समाप्त हो गया नजर आता है। रविवार की रात तक मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अड़े हुए थे कि कोई पैंतालीस लोगों की रहस्यमय परिस्थितयों में जान लेने वाले घोटाले की जांच सही दिशा में चल रही है और मामले को सीबीआई के हाथों में सौंपने की कोई जरूरत नहीं है।

पर सोमवार को दिन में ऐसा क्या हुआ कि मुख्यमंत्री को व्यापमं घोटाले की जांच का रुख बदलने का फैसला लेने को मजबूर होना पड़ा और फिर वे रात भर सो भी नहीं पाए? देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सोमवार को जब अप्रत्याशित रूप से झाबुआ में घोषणा कहा कि व्यापमं फर्जीवाड़े की सीबीआई जांच की कोई जरूरत नहीं है और उसी दिन जब एक अन्य केंद्रीय मंत्री साध्वी उमा भारती ने मांग कर दी कि किसी सक्षम एजेंसी से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करवाई जानी चाहिए तो साफ हो गया था कि दाल में कुछ काला है।

दो केंद्रीय मंत्री एक ही दिन में एक बहुत ही संवेदनशील विषय पर अलग-अलग बयान दें और वह भी ऐसे समय जब प्रधानमंत्री देश से बाहर हों, ऐसा आमतौर पर संभव नहीं। पर दिल्ली में फैसला पहले से कर लिया गया था और शिवराज सिंह से उस पर राय नहीं ली गई होगी। संभवतः यही कारण रहा होगा कि मुख्यमंत्री रात भर सो नहीं पाए।

दिल्ली की मंशा की मंगलवार को प्रेस कांफ्रेंस में घोषणा करने का काम भी मुख्यमंत्री पर छोड़ दिया गया जिससे कि शिवराज सिंह की प्रतिष्ठा पर कोई आंच नहीं आए। अतः साफ है कि हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुसार एसआईटी की निगरानी में वर्तमान में चल रही जांच के मुद्दे पर भाजपा का आलाकमान मुख्यमंत्री के साथ लंबे समय तक खड़ा नहीं दिखना चाहता था।

व्यापमं घोटाले को लेकर जिस तरह से एक के बाद एक मौत हो रही है और कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष भाजपा के खिलाफ लामबंद हो रहा है उसका भारी नुकसान पार्टी को बिहार विधानसभा चुनावों में भुगतना पड़ सकता था। व्यापमं फर्जीवाड़े से राष्ट्रीय स्तर पर भी केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी की छबि को नुकसान पहुंचने लगा था। अतः प्रधानमंत्री अपनी विदेश यात्रा से लौटने से पहले पूरे मामले को ठंडा पड़ा देखना चाहते थे। इस बात की वैसे अभी भी कोई संभावना नहीं है कि मुख्यमंत्री द्वारा सीबीआई को जांच का जिम्मा सौंपने की मंशा जाहिर कर देने से ही सबकुछ शांत हो जाएगा।

अब नजरें राज्यपाल राम नरेश यादव के भविष्य को लेकर लिए जाने वाले फैसले पर टिक गई हैं। दूसरे यह कि मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने भी शिवराज सरकार के अनुरोध पर फिलहाल कोई भी फैसला करने से इंकार कर दिया है। ऐसा सुप्रीम कोर्ट में प्रकरण के विचाराधीन होने के कारण किया गया है जहाँ कि गुरुवार को दिग्विजय सिंह और अन्य लोगों की याचिकाओं पर विचार होना है। अतः शिवराज सिंह की मुसीबतें आने वाले दिनों में बढ़ भी सकती हैं