फैसले के अमल की गारंटी कौन देगा?

२७ सितंबर २०१०

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आज दी जाने वाली व्यवस्था शायद तय कर पाए कि अयोध्या में विवादास्पद भूमि के मालिकाना हक को लेकर चल रहा छह दशक पुराना विवाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के जरिए एक अक्टूबर के पहले निकलना चाहिए या फिर आपसी बातचीत के जरिए उसका हल ढूंढऩे की संभावनाओं को अभी भी टटोला जा सकता है। दोनों ही तरफ के कट्टरपंथी पक्षों का मानना है कि चूंकि विवाद का हल बातचीत से निकल ही नहीं सकता इसलिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय को अपना फैसला सुनाने की अनुमति दी जानी चाहिए। दोनों ही पक्षों का ऐसा मानना सही भी हो सकता है। पर इस बात की गारंटी हमें किससे मांगना चाहिए कि इलाहाबाद का फैसला चाहे जिसके कि पक्ष में या खिलाफ जाए, दोनों ही उसका पूरी तरह से सम्मान करेंगे और देश में साम्प्रदायिक सद्भाव पूरी तरह से कायम रखा जाएगा? हमारे अतीत के अनुभव तो यही बताते हैं कि संवेदनशील मसलों को लेकर अदालतों द्वारा दिए जाने वाले फैसले भी राजनीतिक दबावों के चलते अंत में संसद में बदल दिए जाते रहे हैं। श्रीमती इंदिरा गांधी के चुनाव को लेकर इसी इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले का अंत में क्या हुआ था वह भी देश को पता है और शाहबानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय के बाद देश की सडक़ों पर न्यायाधीशों के खिलाफ किस तरह के दृश्य देखे गए और फिर संसद में उसका क्या हश्र हुुआ, वह सब भी हमारी याददाश्त से अभी गुम नहीं हुआ है। हकीकत यह है कि कम से कम धार्मिक भावनाओं से जुड़े मामलों को लेकर तो देश अभी इतना तैयार नहीं हो पाया है कि वह अदालती फैसलों का पवित्र गं्रथों की तरह ही सम्मान करते हुए उन्हें अपने माथों से लगा सके। अदालतोंं द्वारा दी जाने वाली फांसी की सजाएं या सामूहिक जुर्माने शायद ज्यादा ईमानदारी से सभी पक्षों द्वारा आमतौर पर स्वीकार कर लिए जाते रहे हैं हालांकि अब तो उसकी भी लंबी गारंटी नहीं दी जा सकती। और अगर हम इतने परिपक्व नहीं हो पाए हैं कि अपनी न्यायव्यवस्था पर आंख मूंदकर भरोसा कर सकें तो इस बात में कोई हर्ज नहीं कि देश की उस व्यापक और मौन आबादी के हित में जिसकी कि किसी भी तरह के धार्मिक विवाद में कम रुचि बची है और जो अपनी सांसों के मालिकाना हक और अपने अस्तित्व की हिफाजत को लेकर ही सुबह से शाम तक खून को पसीने की शक्ल में बहाती रहती है, इस तरह के विवादों को आने वाले कुछ और दशकों के लिए केवल इस उम्मीद से टाल देना चाहिए कि वक्त की जरूरत अपने आप उनके कोई न कोई हल निकाल लेगी। किसी से छुपा हुआ नहीं है कि अधिकांश मर्तबा संवेदनशील विवादों को पहले तो वोटों की राजनीति के मकसद से राजनीतिक दलों द्वारा ही हवा दी जाती है और जब वे ही परेशानियां बनकर गले की फांस बनने लगती हैं तो उन्हें अदालतों की सीढिय़ों पर रख दिया जाता है। दिसम्बर 1992 में जो कुछ हुआ उसे आज अठारह साल पूरे हो चुके हैं। उम्र की एक समूची पीढ़ी देश में जवान हो चुकी है जो कि आज पीछे मुडक़र देखने को तैयार नहीं है। हरेक तरह के आतंकवाद से लोग मुक्ति भी चाहते हैं और अपने अंदर बैठे हुए ईश्वर की आराधना भी नहीं छोडऩा चाहते हैं। और फिर हम इसे अंतिम सत्य कैसे करार दे सकते हैं कि बातचीत के जरिए विवाद का हल निकल ही नहीं सकता? दोनों ही तरफ के वर्तमान पक्षकारों को क्या देश एक सौ बीस करोड़ की आबादी की भावनाओं को प्रतिनिधित्व करने का अधिकार अंतिम रूप से प्राप्त हो गया है या फिर देश में कोई मुनादी उस अंतिम आदमी की मंशा जानने के लिए भी की जाएगी जिसकी कि कल्पना गांधी ने की थी और जिसकी कि हिफाजत के लिए उन्होंने अपनी शहादत दी थी?