प्रधानमंत्री का पार्टी के नाम संदेश!

क्या डॉ. मनमोहन सिंह का इरादा देश की जनता को यह बताने का था कि प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के लिए वे अपनी ओर से ही इनकार कर रहे हैं, पार्टी तो उन्हें फिर से मैदान में उतारना चाहती थी? अगर ऐसा नहीं था तो वे अपनी पत्रकार वार्ता के जरिए और क्या संदेश देना चाहते थे?

डॉ. मनमोहन सिंह ने घोषणा कर दी है कि अगले लोकसभा चुनाव के दौरान या उसके बाद भी वे यूपीए की ओर से प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार नहीं होंगे। सही पूछा जाए तो डॉ. सिंह को केवल इतनी-सी बात की घोषणा करने के लिए चार वर्षों के बाद देश के मीडिया का सामना करने की जरूरत नहीं थी। कारण यह कि चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में पार्टी की सफाई के तत्काल बाद (8 दिसंबर को) सोनिया गांधी ने सार्वजनिक रूप से संकेत दे दिए थे कि प्रधानमंत्री पद के लिए नए उम्मीदवार के नाम की घोषणा शीघ्र की जाने वाली है। ऐसा अब होने भी जा रहा है। इसके बावजूद डॉ. सिंह ने अगर मीडिया से रूबरू होने का मन बनाया तो क्या उसके पीछे उनका इरादा देश की जनता को यह बताने का था कि प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के लिए वे अपनी ओर से ही इनकार कर रहे हैं, पार्टी तो उन्हें फिर से मैदान में उतारना चाहती थी? अगर ऐसा नहीं था तो डॉ. सिंह अपनी पत्रकार वार्ता के जरिए और क्या संदेश देना चाहते थे? क्या वे प्रधानमंत्री पद से मुक्त होने से पहले अपने पर लगने वाले तमाम आरोपों की सफाई देकर बोझ से बरी होना चाहते थे? या फिर वे यह बताना चाहते थे कि राजनीतिक मुद्दों पर भी उनके अपने विचार हैं और वे वक्त आने पर उन्हें व्यक्त भी कर सकते हैं? पिछले तमाम सालों और हाल के महीनों में चुनावी रैलियों के दौरान भी डॉ. मनमोहन सिंह यह कहने की कभी हिम्मत नहीं जुटा पाए कि अगर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो यह देश के लिए विनाशकारी साबित होगा। या कि मोदी के ताकतवर होने का मतलब यह नहीं कि अहमदाबाद की सड़कों पर कत्लेआम हो। पर अपनी विदाई की पत्रकार वार्ता में डॉ. सिंह भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी पर अपना अब तक का सबसे बड़ा हमला करने से नहीं चूके और साथ ही देश को यह यकीन भी दिलाया कि ‘मोदी जो चाहते हैं, वह कभी हकीकत में तब्दील नहीं होगा।’

र सच यह है कि नई दिल्ली में शुक्रवार को देश के मीडिया के सामने कोई ऊर्जावान तथा चमक से भरे डॉ. मनमोहन सिंह नहीं, बल्कि एक ऐसा थका हुआ प्रधानमंत्री उपस्थित था, जिसे यह स्वीकार करने में रत्तीभर संकोच नहीं था कि महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर वे ज्यादा कुछ नहीं कर पाए और अपनी असफलताओं की मशाल वे अब राहुल गांधी के ‘सक्षम’ हाथों में सौंपना चाहते हैं। डॉ. सिंह साथ ही यह बताना नहीं भूले कि उनका कार्यकाल पूरा होने में अभी पांच माह का वक्त शेष है।

याद रखने के लिए जरूरी है कि सजायाफ्ता जनप्रतिनिधियों को अयोग्यता से बचाने वाले अध्यादेश को राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से ‘बकवास’ बताते हुए उस समय फाड़ दिया था, जब डॉ. मनमोहन सिंह अमेरिका यात्रा पर थे और राष्ट्रपति ओबामा से मिलने से पहले होटल के अपने कमरे में रात की नींद में थे। राहुल गांधी के प्रति अपनी कोई भी नाराजगी भरी प्रतिक्रिया देने में एक प्रधानमंत्री के रूप में डॉ. सिंह ने तब अभूतपूर्व धैर्य का परिचय दिया था। देखना होगा कि अब अपने कार्यकाल के बचे हुए पांच महीनों में वे किस तरह का धैर्य निभाते हैं।

डॉ. सिंह ने एक सवाल के जवाब में पत्रकारों से कहा कि उनके कार्यकाल का मूल्यांकन इतिहासकार ही करेंगे। क्या वास्तव में ऐसा होगा? इतिहासकारों के लिए तात्कालिक रुचि का विषय शायद यह हो सकता है कि प्रधानमंत्री ने पत्रकारों के सवालों के जवाब में जो कुछ भी कहा, उससे पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के भावी उम्मीदवार को चुनावों में कुछ फायदा मिलेगा कि नहीं!