प्रधानमंत्री का पद और राहुल

१ जुलाई २०११

देश को एक गैर-जरूरी बहस में व्यस्त किया जा रहा है कि राहुल गांधी अब प्रधानमंत्री का पद संभालने के योग्य हो गए हैं। यह कांग्रेस पार्टी का एक अंदरूनी मामला है कि वह सरकार चलाने के लिए राहुल गांधी को जिम्मेदारी सौंपने का फैसला कब करती है। ईमानदारी से कहा जाए तो निर्णय पार्टी को भी कम और राहुल गांधी को ही ज्यादा करना है। वर्ष २००४ के चुनावों के बाद जब कांग्रेस ने सरकार बनाने की हैसियत प्राप्त कर ली तो पार्टी के ज्यादातर नेताओं ने श्रीमती सोनिया गांधी के ही प्रधानमंत्री बनने की घोषणा कर दी थी। पर कांग्रेस अध्यक्ष ने जिंदाबादियों की एक बड़ी जमात को निराश करते हुए प्रधानमंत्री की कुर्सी पर डॉ. मनमोहन सिंह की ताजपोशी कर देश और दुनिया को आश्चर्यचकित कर दिया। कहना होगा कि डॉ. सिंह ने भी न सिर्फ श्रीमती गांधी द्वारा अपने प्रति व्यक्त किए गए सम्मान का अनादर नहीं होने दिया, अपनी छवि की मदद से वर्ष २००९ में पार्टी को फिर से सत्ता में वापस लौटने में योगदान दिया। शायद इसीलिए उन्हें उनके पद से हटा देने की बार-बार की चर्चाओं के बीच डॉ. सिंह को अपनी धीमी पर विश्वास भरी आवाज में जताते रहना पड़ता है कि वे अभी अपने पद पर बने रहना चाहते हैं, और उन्हें बहुत से काम पूरे करना है। वैसे भी एक लोकतांत्रिक देश में सर्वमान्य प्रक्रिया के जरिए प्रधानमंत्री पद के लिए होने वाले चयन की इससे बड़ी अवमानना नहीं हो सकती कि एक सामंती तरीके से प्रजा को सूचित किया जाए कि कौन व्यक्ति अब राज-काज संभालने के योग्य हो गया है। इसमें तो डॉ. मनमोहन सिंह को भी शक नहीं है कि यूपीए-दो के वर्तमान कार्यकाल में राहुल गांधी जिस दिन चाहेंगे प्रधानमंत्री बन सकते हैं। और वे बिना किसी विलम्ब या ना-नुकुर के राहुल गांधी के लिए अपनी कुर्सी खाली भी कर देंगे। दूसरी ओर, देश की जनता भी इतनी सीधी और ईमानदार रहती आई है कि वह प्रधानमंत्रियों की नियुक्तियों के प्रति कोई पूर्वाग्रह और दुराग्रह नहीं रखती। वह हरेक प्रधानमंत्री को आंखें बंद करके स्वीकार भी कर लेती है और चुपचाप आंखें खोलकर पद से हटाने के कारण भी ढूंढ़ लेती है। वर्ष 1977 में जनता ने श्रीमती इंदिरा गांधी को उनके पद से हटा दिया और वर्ष 1980 में दो-तिहाई से अधिक बहुमत प्रदान कर वह उन्हेंं वापस सत्ता में भी ले आई। साथ ही यह भी कि भारत की राजनीति अब उस दौर से लगभग मुक्त हो चुकी है जिसमें किसी एक राष्ट्रीय व्यक्तित्व को धुरी बनाकर मतदाताओं से वोटों की मांग की जा सके। इंदिराजी के निधन और अटलजी की अस्वस्थता के बाद राष्ट्रीय स्तर के व्यक्तित्वों का देश में जो सन्नाटा पैदा हुआ है उसने प्रधानमंत्री पद के लिए आवश्यक योग्यताओं के स्केल को ही बदल कर रख दिया है। पर यह भी एक सच्चाई है कि कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के पद पर बैठाने का जितना ज्यादा ढिंढोरा सार्वजनिक रूप से पीटेंगे, युवा नेता को वे उतना ही जनता से दूर करने का जोखिम पार्टी के कंधों पर डालेंगे। कहना होगा कि राहुल गांधी के पक्ष में गैर-जरूरी प्रचार की ऐसी हरेक कोशिश के बाद डॉ. मनमोहन सिंह के प्रति जनता की सहानुभूति और ज्यादा बढ़ जाती है। और फिर कांग्रेस प्रवक्ताओं को टीवी चैनलों पर सफाई देने के लिए मजबूर होना पड़ता है कि डॉ. सिंह अच्छा कार्य कर रहे हैं और वे अपना वर्तमान कार्यकाल अवश्य पूरा करेंगे। श्री दिग्विजय सिंह द्वारा प्रारंभ की गई बहस के बाद कांग्रेस प्रवक्ता श्रीमती जयंती नटराजन द्वारा दी गई सफाई इसका ताजा उदाहरण है।

इसमें कोई ज्यादा मतभेद नहीं है कि यूपीए-एक के मुकाबले यूपीए-दो का कार्यकाल कांग्रेस पार्टी के लिए अभी तक तो कोई खास उपलब्धियों वाला नहीं रहा है। पिछले दो सालों में पार्टी का ग्राफ नीचे ही गिरा है। 2004 में चुनाव जीतने के बाद अपार लोकप्रियता के रथ पर सवार श्रीमती गांधी को जिस तरह से प्रधानमंत्री की कुर्सी उपलब्ध थी वैसी लोकप्रियता की सुविधा 2011 में राहुल गांधी को उपलब्ध नहीं है। आज की स्थिति में यह भी निश्चित नहीं है कि 2014 तक कांग्रेस के लिए हालात क्या बनेंगे। यूपीए-एक के सहयोगी वापमंथी इस समय परिदृश्य से बाहर हैं और यूपीए-दो की दोस्त द्रमुक का राजनीतिक भविष्य भी संकट में है। ऐसे में यूपीए -तीन के लिए गठबंधन के साथी कौन होंगे और उनके चेहरे कैसे होंगे विश्वासपूर्वक कुछ भी कहा नहीं जा सकता। देश की नई राजनीति में नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, जयललिता और मायावती के रूप में एक आक्रामक गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपाई नेतृत्व उभर कर सामने आ चुका है। यही नेतृत्व भी आने वाली संसद का भविष्य और बनने वाली सरकारों के लिए गठबंधन तय करेगा। अत: कांग्रेस की इस चिंता पर गौर किया जा सकता है कि उसके पास दो वर्षों से कुछ ज्यादा का ही वक्त कुछ कर दिखाने का बचा है और पार्टी को तत्काल किसी चमत्कारिक नेतृत्व की जरूरत है। शायद इसीलिए शोर भी मचाया जा रहा है कि पार्टी को फिर से सत्ता में लाने का नेतृत्व राहुल ही दे सकते हैं। पर राहुल या तो सरकार की बागडोर अभी से संभालकर 2014 में पार्टी को जीत हासिल कराने की चुनौती स्व्ीकार कर सकते हैं या फिर अगले लोकसभा चुनावों के परिणाम आने तक अपनी वर्तमान भूमिका में ही प्रतीक्षा करने का धैर्य दिखा सकते हैं। दोनों ही विकल्पों के फायदे और नुकसान भी गिनाए जा सकते हैं। पर एक तीसरा विकल्प भी खुला हुआ है और वह यह कि वे मनमोहन सिंह के नेतृत्व में ही मंत्रिमंडल में शामिल होकर सरकार चलाने का अभ्यास प्रारंभ कर दें और समय आने पर प्रधानमंत्री पद भी संभाल लें। ऐसी स्थिति में वे मंत्रिमंडल के प्रस्तावित फेरबदल को भी अपनी पसंद के मुताबिक करवा सकते हैं। पर तब तक के लिए कांग्रेस को अपने अंदरूनी घमासान से निपटने के साथ ही राहुल गांधी की प्रशस्ति के मार्फत डॉ. मनमोहन सिंह को कमजोर दिखाने की कोशिशों को भी काबू में रखना होगा। पर शक है कोई भी कांग्रेस प्रवक्ता इस संबंध में पक्का आश्वासन देना चाहेगा।