प्रधानमंत्री का ‘गांधी-दर्शन’

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह अमेरिका से वापस घर लौट आए हैं। वे नहीं मानते हैं कि राहुल गांधी ने उनका या सरकार का कोई अपमान किया है। ‘मैं हर परिस्थिति का सामना करता हूं और आसानी से परेशान नहीं होता’, उनका कहना है। इसलिए उन्होंने तय किया है कि पद से इस्तीफा देने का कोई कारण नहीं बनता। डॉ. मनमोहन सिंह एक ‘परिपक्व’ नेता हैं। अत: वे दु:ख से दु:खी और सुख से सुखी नहीं होते। वे सच्चे राजनीतिक कर्मयोगी हैं। प्रधानमंत्री आज सुबह महात्मा गांधी की समाधि के दर्शन करेंगे और फिर राहुल गांधी के। प्रधानमंत्री कांग्रेस पार्टी के युवा उपाध्यक्ष से यह नहीं पूछना चाहेंगे कि उनकी विदेश यात्रा के दौरान (नरेंद्र मोदी के शब्दों में) ‘पगड़ी’ क्यों उछाली गई। वे पूछेंगे कि अध्यादेश के प्रति युवराज की नाराजगी का कारण क्या है? राहुल गांधी प्रधानमंत्री को क्या सफाई देंगे, कभी पता नहीं चलेगा, पर निश्चित ही डॉ. मनमोहन सिंह पार्टी के युवा उपाध्यक्ष से मिलने के बाद अपनी तमाम नाराजगी दूर कर लेंगे। शरद पवार और मुलायम सिंह यादव के तमाम विरोधों के बावजूद वे मंत्रिमंडल को मना लेंगे कि राष्ट्रपति भवन की ओर से अगर कुछ स्पष्टीकरण मांगा गया है या मांगा जा सकता है तो इन परिस्थितियों के मद्देनजर या फिर वैसे भी अध्यादेश को वापस ले लेना चाहिए। कहा जाएगा कि अगर ऐसा नहीं किया गया तो विपक्षी दलों, विशेषकर भारतीय जनता पार्टी को यह कहने का मौका मिल जाएगा कि कांग्रेस सजायाफ्ता नेताओं की सदस्यता बचाने का प्रयास कर रही है। समूचे हंगामे के पहले केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद द्वारा दिया गया तर्क मानें तो अध्यादेश का लाभ आगे चलकर सभी पक्षों के नेताओं को मिलता, जिनमें नरेंद्र मोदी भी हो सकते हैं।

प्रधानमंत्री के इस साहस की दाद दी जानी चाहिए कि राहुल गांधी ने दिल्ली के प्रेस क्लब पहुंचकर उनकी शान में जो कुछ भी किया, उसे डॉ. मनमोहन सिंह घुट्टी मानकर पूरी तरह से निगल गए और मुंह में जरा-सी भी कड़ुवाहट पैदा होने का संकेत नहीं दिया। अत: माना जा सकता है कि कांग्रेस में जो कुछ भी ड्रामा चल रहा है, वह तयशुदा स्क्रिप्ट के मुताबिक ही प्रस्तुत हो रहा है। पार्टी के हित में प्रधानमंत्री हर तरह का बलिदान देने को तैयार हैं। सोनिया गांधी ने कहा है कि पूरी पार्टी प्रधानमंत्री के साथ है। अध्यादेश का मसौदा इसलिए तैयार किया गया था कि पार्टी अपने अनन्य सहयोगी लालू प्रसाद यादव को यह (झूठा) दिलासा देना चाहती थी कि वह उनके साथ है। मेडिकल एडमिशन में फर्जीवाड़े के दोषी अपने राज्यसभा सांसद रशीद मसूद को भी अध्यादेश आश्वस्त करना चाहता था कि कांग्रेस अपने अल्पसंख्यक नेता का साथ नहीं छोड़ेगी। अब राहुल गांधी हीरो बन गए हैं कि वे सजायाफ्ता नेताओं को किसी भी तरह का संरक्षण देने के खिलाफ हैं। मतलब यह कि मुलायम सिंह भी इस मुद्दे पर अगर कांग्रेस का ‘साथ’ छोड़ना चाहते हैं तो वे ऐसा करके दिखा सकते हैं। प्रधानमंत्री पद के लिए कांग्रेस के अघोषित उम्मीदवार की रणनीति साफ है। जेल जाने के बाद भी अगर लालू बिहार के नायक बने रहते हैं तो कांग्रेस उनके साथ बनी रहेगी, वरना नीतीश कुमार तो हैं ही। ज्यादा संभावना यही दिखती है कि कांग्रेस लालू के साथ बनी रहे। क्योंकि लालू की अनुपस्थिति में राष्ट्रीय जनता दल रघुवंश प्रसाद और प्रभुनाथ सिंह के नेतृत्व में शायद ज्यादा समझदारी से काम कर सकता है। महाराजगंज के उपचुनाव में प्रभुनाथ सिंह अपनी ताकत कांग्रेस और नीतीश दोनों को दिखा चुके हैं। दूसरे यह कि वर्ष 2009 के चुनावों में लालू कुछ ज्यादा ही आत्मविश्वास से भरे हुए थे और कांग्रेस को केवल चार सीटों की पेशकश करके उन्होंने राहुल गांधी से पंगा ले लिया था। राहुल गांधी ने अध्यादेश को लेकर दिल्ली के प्रेस क्लब में जो सन्नाटा पैदा किया, वह इसी पंगे का भुगतान भी हो सकता है। बिहार में परफॉर्मेंस को लेकर राहुल गांधी की तब काफी किरकिरी हुई थी। नीतीश कुमार के साथ राहुल गांधी की पटरी इसलिए कम बैठ सकती है कि दोनों ही उस उच्च पद के महत्वाकांक्षी हैं, जिसके कि लिए नरेंद्र मोदी ने भाजपा को या भाजपा ने मोदी को दांव पर लगा रखा है। कांग्रेस लालू से मुक्ति पाना चाहती है, पर अपने पांसे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री को कल घोषित होने वाली सजा के सालों के आधार पर ही फेंकना चाह सकती है। इसी तरह से कांग्रेस पार्टी का इरादा उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव से भी मुक्ति प्राप्त कर बहुजन समाज पार्टी के साथ जुड़ने का भी हो सकता है। मायावती प्रसन्न् हैं कि उनके खिलाफ लगे आरोपों का निपटारा ‘बहुजन समाज’ की भावनाओं के अनुरूप ही हो रहा है। अत: अध्यादेश को लेकर ‘युवराज’ के गुस्से का संबंध उत्तर प्रदेश और बिहार की अस्सी जमा चालीस (120) सीटों के साथ हो सकता है। रशीद मसूद को जेल की सजा मिलने के ठीक पहले केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे का राज्यों के मुख्यमंत्रियों के नाम पर लिखा पत्र उजागर होता है कि आतंकवाद के नाम पर मुस्लिम युवाओं को परेशान न किया जाए। ‘वोट बैंक’ की राजनीति के लिए जो कुछ भी संभव है, वह किया जा रहा है। राहुल गांधी द्वारा इस तरह सार्वजनिक रूप से ‘अपमानित’ किए जाने के बावजूद प्रधानमंत्री अगर इतने सरल और सामान्य नजर आते हैं और कांग्रेस उपाध्यक्ष की कार्रवाई को ‘लोकतांत्रिक व्यवस्था’ का ही हिस्सा बताते हैं तो निश्चित ही सच्चाई वह नहीं है, जो नंगी आंखों के जरिए देश को दिखाई दे रही है। राजनीति के वे तमाम पंडित और विश्लेषक जो यह मानते हैं कि हमारे मौन रहने वाले प्रधानमंत्री तो केवल अर्थशास्त्री हैं, वे न तो राजनीति समझते हैं और न राजनीतिक फैसले ले सकते हैं, अब उन्हें अपनी समूची धारणा बदल लेना चाहिए। अत: मानकर यही चलना चाहिए कि न तो प्रधानमंत्री इस्तीफा देंगे और न ही अध्यादेश कभी हकीकत बन पाएगा।