प्रधानमंत्री और होने वाले ‘प्रधानमंत्री’

रेंद्र मोदी के पक्ष में भारतीय जनता पार्टी और उनके समर्थकों का लोहा इतना गरम है कि वे गुजरात के फायरब्रांड मुख्यमंत्री को जल्द से जल्द लाल किले पर चढ़ाने के लिए बेताब हैं। इसमें कोई बुरी बात भी नहीं है। पर यहां मुद्दा अलग है। पंद्रह अगस्त देश के लिए एक राष्ट्रीय पर्व है। लाल किले की प्राचीर से फहराया जाने वाला तिरंगा उस पर्व की आत्मा का प्रतीक है। जवाहरलाल नेहरू से लगाकर मनमोहन सिंह तक सभी प्रधानमंत्री जब सत्रहवीं शताब्दी में शाहजहां द्वारा निर्मित इस ऐतिहासिक धरोहर से राष्ट्र को संबोधित करते हैं तो वहां से उठने वाली ‘जय हिंद’ की गूंज से दुनिया भर में फैले हुए भारतीयों का खून हिलोर लेने लगता है। बहस का विषय यह नहीं है कि डॉ. मनमोहन सिंह क्या और कैसा बोलते हैं, या कुछ बोलते भी हैं कि नहीं! कुछ गिने-चुने ओजस्वी राष्ट्रनायकों को छोड़ दें तो किसी भी प्रधानमंत्री के पास एक लिखे हुए को पढ़ने के अलावा ज्यादा कुछ होता भी नहीं। अपने पिछले सभी दस उद्बोधनों में डॉ. मनमोहन सिंह ने भी यही किया है। डॉ. सिंह चाहते तो इस बार के अपने भाषण को ज्यादा धारदार और ऐतिहासिक बना सकते थे पर इसके लिए उन्हें कई स्थापित परंपराएं तोड़ना पड़तीं जो कि उनके बस की बात नहीं थी। पर प्रधानमंत्री पद के जुझारू उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने एक ऐसी परंपरा को तोड़ दिया जिसकी कि देश उनसे अपेक्षा नहीं करता था। भुज के लालन सिंह कॉलेज के प्रांगण से आत्मविश्वास से भरे नरेंद्र मोदी ने डॉ. मनमोहन सिंह के इकतीस मिनट के लचर उद्बोधन का अड़तालीस मिनट में बिंदुवार ओजस्वी जवाब शुद्ध हिंदी में दिया और साथ ही देश को सरकार में चल रहे ‘सास-बहू और दामाद’ के सीरियल के बारे में भी जानकारी दी। नरेंद्र मोदी चाहते तो डॉ. मनमोहन सिंह को चुनौती देने वाले अपने उद्बोधन को आगे आने वाले पंद्रह अगस्त के लिए बचाकर रख सकते थे। पर निश्चित ही उनके चुनावी सलाहकारों ने उन्हें इस तरह का कोई धैर्य नहीं बरतने की सलाह दी होगी। दिल्ली सहित सभी कांग्रेस-शासित राज्यों की बात छोड़ दें तो भी कहना मुश्किल है कि गुजरात से बाहर किसी भाजपा वाले राज्य में भी मोदी अगर इस तरह की कोई पहल करते तो उसे किस तरह का रिस्पांस प्राप्त होता। यह बताता है कि गुजरात, खासकर भुज की जनता नरेंद्र भाई का कितना सम्मान करती है। जो कुछ हुआ वह एक परंपरा का टूटना है और वह भी उस व्यक्ति के द्वारा जो स्वयं प्रधानमंत्री पद का एक सशक्त दावेदार है। क्या कल्पना की जा सकती है कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के पद पर काबिज होकर पंद्रह अगस्त के दिन राष्ट्र को संबोधित करें और सर्वोच्च पद के लिए कोई विपक्षी दावेदार इसी तरह से उन्हें चुनौती देने की हिम्मत जुटा सके? एक चीज जो साफ है, वह यह कि डॉ. मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी दोनों ने ही एक शानदार अवसर को जान-बूझकर हाथ से फिसल जाने दिया। आश्चर्यजनक नहीं कि दोनों ही पार्टियों के नेता अपने-अपने ‘प्रधानमंत्री’ का बचाव करने में जुट गए हैं।