पेड़, पत्तियां और पगडंडियां

याद आ जाते हैं पिता
अक्‍सर ही इन दिनों।
भरने लगता है पानी घर में,
जब-जब भी बरसात का
दिखने लगता है कृशकाय
शरीर उनका उलीचते हुए
पानी झुक-झुककर।
और तभी लगती हैं झांकने
झुर्रियां पड़ी बूढ़ी होती पीठ उनकी
फटी हुई कमीज़ के नीचे से।
न जाने कहां चले गए वे –
बिना कुछ बताए,
कानों में कुछ कहे बग़ैर
कोई पता नहीं,
समाचार भी नहीं कोई,
न ही कोई चिट्ठी-पतरी।
डाकिया भी आता है रोज़,
रोज़ाना की तरह।
पर यह डाकिया वह तो नहीं
वह तो था कोई और।
उसकी लाई डाक भी होती थी अलग –
मसलन, पत्रिका किसी के ब्‍याह की
या संदेश किसी के न होने का
या कि कोई नोटिस मालिक-मकान का।
और बैठा रहता था वह डाकिया।
पिता के पास घंटों तक
गिनता रहता था पहाड़े
एक-दो-तीन के।
गिनता रहता था बची हुई
नदियां, नाले, पगडंडियां
और बचे हुए बूढ़े झाड़ गांव के।
याद थी गिनती उसे
एक-एक हरी और सूख रही टहनी
पत्तियों की।
बतलाता था हर रोज़ पिता को वह
किस पेड़ की छांह के नीचे
सुस्‍ताया था, कितनी देर।
धीरे-धीरे गुम हो गई नदियां सारी
पगडंडियां हो गईं तब्‍दील रेतीली सड़कों में
नहीं नज़र आते अब दूर-दूर तक
वे हरे-भरे झाड़, जो छुपाए रखते थे।
गोद में अपनी समूचे गांव को।
अब तो केवल दिखाई देता है
कहीं दूर बूढ़ा होता हुआ एक पहाड़
दिखाई देती है उसकी नंगी पीठ
ठीक पिता की तरह।

Leave a comment

Your email address will not be published.