पेड़ों पर पैसे और हथेलियों पर सरसों

प्रधानमंत्री का कहना बिलकुल ठीक है कि पैसा पेड़ों पर नहीं लगता। डॉ. मनमोहनसिंह चूंकि राष्ट्र को संबोधित कर रहे थे, गरीब जनता का ध्यान इस हकीकत की ओर आकर्षित करना उनके लिए बेहद जरूरी था कि सरकारों “में”/ “का” सारा काम पैसे से ही चलता है। प्रधानमंत्री को शिकायत हो सकती है कि उनके इतने महत्वपूर्ण संदेश को भी देश की जनता द्वारा अपेक्षित “गंभीरता” से नहीं लिया गया। दूसरी ओर, खुफिया जांच इस बात की भी करवाई जा सकती है कि क्या जनता का इस बात से भरोसा उठ गया है, डॉ. मनमोहनसिंह आम आदमी की परेशानियों को लेकर वाकई “गंभीर” हैं। देश का इतना बड़ा नेता क्या एक बड़ी आबादी को साल भर में रसोई गैस के छः सिलेंडर की खपत करने वाली भीड़ ही मानता है या और कुछ भी समझता है! सही पूछा जाए तो शक होता है कि प्रधानमंत्री का संदेश भारत देश की असली जनता के नाम पर था या फिर देश-विदेश के निवेशकों के नाम कि चाहे जो कुछ हो जाए, जिन रास्तों पर “मैंने” (‘हमने” नहीं) कदम बढ़ाया है उससे “मेरे” पीछे हटने का अब सवाल ही नहीं उठता। इस तरह के संदेश आमतौर पर (आंतरिक या बाह्य) आपात या असाधारण परिस्थितियों में ही प्रसारित किए जाते हैं। प्रधानमंत्री के संदेश को संजीदगी से लेना हो तो ऐसा माना जाना चाहिए कि ऐसी परिस्थितियां देश में बन चुकी हैं। जनता को पता ही नहीं चला कि विपक्ष उसे गुमराह कर रहा है और उसे उसके बहकावे में नहीं आना चाहिए। डॉ. सिंह से पूछा जा सकता है कि वे नाम लेकर बताएं कि कौन, किसे गुमराह कर रहा है।

प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम उद्‌बोधन को लेकर दो मुद्दों पर बहस हो सकती है : पहला तो यह कि डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने पूरे संबोधन में “भ्रष्टाचार” शब्द का जिक्र तक नहीं किया और इस संबंध में सरकार पर लगातार लग रहे आरोपों को लेकर भी कोई सफाई या बचाव प्रस्तुत करने की जरूरत नहीं समझी। उन्होंने इस बात पर कोई दुख या संताप भी जाहिर नहीं किया कि कोयला खदानों के आवंटन और अन्य आरोपों के कारण संसद का मानसून सत्र पूरी तरह से ठप रहा और शीतकालीन सत्र को लेकर अनिश्चितता बरकरार है। बजट सत्र कौन-सा रास्ता पकड़ेगा पता नहीं।

न्होंने कोई चिंता नहीं व्यक्त की कि संसदीय व्यवस्था का क्या होने वाला है। दूसरा यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि प्रधानमंत्री के संबोधन का असली उद्देश्य एफडीआई और डीजल मूल्य वृद्धि पर जनता को सरकार की मजबूरियों से अवगत कराना था या फिर मजबूती के साथ चुनावों का सामना करने की तैयारी दिखाना! प्रधानमंत्री के संबोधन के बाद कांग्रेस का काम इस मायने में निश्चित ही बढ़ गया है कि एफडीआई और डीजल आदि मुद्दों को लेकर आम आदमी और विपक्ष की नाराजगी बजाए कम होने के और ज्यादा हो गई है। यह नाराजगी प्रधानमंत्री की मौजूदगी में ही व्यक्त भी होने लगी है। पैसे पेड़ों पर तो निश्चित ही नहीं लगते पर सवाल यह भी है कि सरसों की उस फसल पर कितना भरोसा करना चाहिए जिसे प्रधानमंत्री हथेलियों पर उगाना चाहते हैं?