पी. बंसल का पी. चिदम्बरम बजट

देश अगर केवल दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नाई, रायबरेली और अलवर तक ही सीमित है तो रेलमंत्री पवनकुमार बंसल द्वारा मंगलवार को पेश किए गए रेल बजट की जरूरत से ज्यादा भी तारीफ की जा सकती है। पर हकीकत में देश और उसकी रेल जरूरतें थोड़ी अलग हैं। सत्रह साल बाद एक कांग्रेसी मंत्री को रेल बजट बनाने का मौका मिला पर पार्टी उसका भी फायदा लेने में चूक गई। बंसल ने कुल मिलाकर यही आभास दिया कि रेल बजट तैयार करने में उन्होंने वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम की खासी मदद ली होगी। एक जमाने में रेल बजट, केंद्रीय बजट का ही हिस्सा रहता भी था। बाद में दोनों अलग-अलग पेश किए जाने लगे। सिद्ध हुआ कि गैर-कांग्रेसी रेल मंत्री देश की जनता को खुश करने में ज्यादा समझदार साबित होते हैं। ठीक वैसे ही जैसे कि राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें कांग्रेस के मुकाबले ज्यादा अच्छा काम कर रही हैं। कोई आश्चर्य नहीं अगर चिदम्बरम ने रेल बजट की जमकर तारीफ करते हुए उसे शानदार बताया है। भारतीय रेलवे अगर डीजल की एक बड़ी उपभोक्ता है और पवनकुमार बंसल इस आयातीत ईंधन की कीमतों में होने वाली वृद्धि को साल में दो बार माल-भाड़े की दरों में पांंच प्रतिशत के इजाफे से जोड़ने की हिम्मत दिखाते हैं तो किसी भी अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री और महत्वाकांक्षी वित्तमंत्री के लिए खुश होने के पर्याप्त कारण बनते हैं। फिर बाकी देश जाए तीर्थयात्रा करने। यात्री किरायों में बंसल कोई सीधी-सीधी बढ़ोतरी कर भी नहीं सकते थे। अगर कर देते तो चुनावों के पहले ही कांग्रेस बुरी तरह हार जाती। जनवरी में ही बंसल ने यात्री किरायोंें में वृद्धि की थी जिससे कि रेलवे को छ: हजार छ: सौ करोड़ की अतिरिक्त सालाना आय होना है। इसीलिए रेलमंत्री ने बाजीगरी दिखाते हुए छद्म तरीकों से यात्रियों की जेबें काटने की व्यवस्था की है। बंसल साहब एहसान जताने से भी नहीं चूके कि डीजल के मूल्यों को नियंत्रण-मुक्त करने के बाद रेलवे पर साढ़े आठ सौ करोड़ का जो भार आया है, उसका ठीकरा वे जनता के मत्थे नहीं फोड़ रहे हैं। हम अब अच्छे से कल्पना कर सकते हैं कि दो दिनों के बाद चिदम्बरम देश को अपने केंद्रीय बजट के मार्फत क्या देने वाले हैं।

यात्री किरायों में इजाफा नहीं किया जा सकता था और चालू वर्ष के लिए माल ढुलाई के निर्धारित लक्ष्य में एक करोड़ अस्सी लाख टन की कमी आर्थिक मंदी के कारण करनी पड़ी है। ऐसी स्थिति में चिदम्बरम के वित्तीय घाटे को सीमा में रखने के लिए बंसल के लिए जरूरी हो गया था कि ईंधन की मूल्य वृद्धि को माल भाड़े से जोड़ें और इसके लिए भी तृणमूल कांग्रेस के रेल मंत्री रहे दिनेश त्रिवेदी को जिम्मेदार ठहराएं। रेल मंत्री ने जो कुछ किया है उसके परिणाम भी प्राप्त होने लगे हैं। रेलवे ने डीजल और खाना पकाने के ईंधन को ढोने की दरों में आठ प्रतिशत की वृद्धि कर दी है। इसी प्रकार रेलवे ने मंगलवार को अनाज, दलहनों और सींगदाना तेल की ढुलाई दरों में भी छह प्रतिशत की वृद्धि कर दी। पवन बंसल के प्रस्तावों की मेहरबानी से महंगाई कितनी ऊंचाई पर पहुंचने वाली है, इसका असली पता कांग्रेस को इस साल कर्नाटक, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में होने वाले चुनावों और अगले वर्ष के लोकसभा चुनाव के बाद ही चल पाएगा। रेलवे की इस कार्रवाई का सड़क मार्ग के जरिए होने वाली माल ढुलाई की दरों पर कितना असर पड़ेगा, उस पर बहस बाकी रहेगी। सत्रह वर्षों में पहली बार किसी कांग्रेसी ने रेल बजट पेश किया और इतने ही सालों में पहली बार सम्मिलित विपक्ष ने मिलकर किसी बजट प्रस्ताव की इतनी आलोचना की होगी। चूंकि यूपीए सरकार गठबंधन में शामिल दलों के समर्थन से ज्यादा जनता की कमजोर याददाश्त पर टिकी हुई है, बहुत मुमकिन है चिदम्बरम अपने बजट में वेतनभोगियों और उद्योगपतियों को इतनी राहतें लुटा देंें कि मुंबई के शेयर बाजार का मंगलवार को डूबा हुआ सूचकांक गुरुवार को फिर से छलांगें मारने लगे और जो लोग रेलमंत्री को कोस रहे हैं, वे वित्तमंत्री को ‘वाह उस्ताद” बताने लगें।