पिता, तुम तो पहाड़

वह जो पहाड़,
खड़ा किया था तुमने
पत्थर के टुकड़ों को अपनी
लगातार ज़ख़्मी होती
पीठ पर ढो-ढोकर
आज भी वैसा ही खड़ा है।
कहीं भी कुछ नहीं बदला,
सब कुछ वैसा ही सुरक्षित है
जैसा कि छोड़ गए थे तुम
सालों-साल पहले।

बादलों का वह टुकड़ा जो
तुम्हारे फटे हुए छाते के पार
से जैसा दिखता था
आज भी आकाश में वैसा ही
लटका हुआ है।

गांव के हाल-चाल कहूं तो –
वह बूढ़ा डाकिया बाबू अब नहीं रहा।
जो आता था लेकर तुम्हारा पोस्टकार्ड।
अब की बरसात भर गया था
पानी घर में घुटनों की ऊंचाई तक
और उनमें घुल गए वे सारे पोस्टकार्ड
जिन्हें संभाल रखा था मैंने सालों से।
धूप में सुखाए गए पोस्टकार्डों पर
हरफ़ बिखरे पड़े थे ऐसे
जैसे कि बह रहे हों मोतियों जैसे
आंसू तुम्हारे पोपले गालों पर।

ठीक वैसे ही जब निकल रहा था
मैं घर से बाहर, नौकरी के लिए
पहली बार तुम्हें छोड़कर
सिवाय इसके नहीं बदला है और कुछ।

हां, एक बात और –
आंगन में लगा तुलसी का पौधा
काफ़ी सूख गया है।
मां भी बहुत बूढ़ी हो गई है।