पिता और इतिहास

कभी सोच ही नहीं पाया मैं
पूरी ईमानदारी से
तुम्‍हारे बारे में।
ड्राइंग रूम के किसी कोने में कै़द,
परिचय की मोहताज
किसी टूटी हुई कुर्सी
या मेज़ की तरह
जुड़े रहे जीवन भर तुम
मेरे शरीर के साथ।

और मैं अभागा
कभी जी ही नहीं पाया
ऊर्जा उन सांसों की
जो‍ मिलती थीं मुझे
अपने नन्‍हे बचपन में
सवार होकर तुम्‍हारी पीठ पर
घर का फर्नीचर तोड़ने में
तुम्‍हारी उपस्थिति का बोध
होता था केवल उस समय
जब लाता था डाकिया कोई
ख़त तुम्‍हारे नाम का
या फिर मनीऑर्डर
तुम्‍हारी पेंशन का।

पर अब तो वह सब भी
चुक चुका है
चींटियों ने भी बदल लिए
हैं घर अपने, किसी और
बूढ़े की तलाश में
आटे के लिए।

भूले-बिसरे भी नहीं झांकती
कोई चिडि़या अब
दाने के लिए घर की ओर।
मैं भी जान गया हूं –
बीता हुआ इतिहास और
अंगुली छोड़कर गए पिता
कभी वापस नहीं लौटते