पिता, एक तलाश

कहां-कहां नहीं ढूंढ़ा तुम्‍हें मैंने
घर के कोने-कोने
पुरानी फ़ाइलों, ख़तों, एलबमों
और जर्जर हो चुके
तुम्‍हारे बही-खातों के बीच।

इस आशंका से कि शायद
किसी दशरथ की तरह
तुम भी झेल रहे होंगे
किसी नेत्रहीन और बूढ़े मां-बाप
का दिया शाप।

तलाशा मैंने तुम्‍हें
हनुमान की उस प्रतिमा के पीछे भी
आराधना में जिनकी
थकने नहीं दिया कभी
तुमने अपने पैरों को।
और तलाशता हुआ मैं तुम्‍हें
पहुंचा उन पहाड़ों की चोटियों पर भी
छूने का साहस जिनकी ऊंचाइयों को
भरा था तुमने मुझमें
थामकर कमज़ोर अंगुलियां मेरी।

पर मिले नहीं कहीं भी तुम मुझे
और जब हारकर सो गया
मैं गोद में स्‍मृतियों की तुम्‍हारी
पाया मैंने कि तुम हो उपस्थित
अपनी संपूर्ण संवेदनाओं के साथ
मेरे ही भीतर
एक पहाड़ की तरह।