पाकिस्तान मांगे युद्ध, हम देंगे क्या?

पाकिस्तानी सैनिकों ने अपनी बर्बरतापूर्ण हरकत को पिछले मंगलवार को अंजाम दिया था। वे हमारे दो बहादुर जवानों की हत्या करने के बाद लांस नायक हेमराज का सिर काटकर अपने साथ ले गए थे। एक सौ बीस करोड़ जनता के सिर झुका देने वाली इस अमानवीय कार्रवाई पर सिर को थोड़ा-सा ऊंचा कर अपनी पहली प्रतिक्रिया देकर देश की भावनाओं को समझने और पाकिस्तानी हुक्मरानों को संदेश देने में प्रधानमंत्री को आठ दिन लगे। डॉ. मनमोहन सिंह को अपना मौन तोड़कर आखिर कहना पड़ा कि इस बर्बरतापूर्ण कार्रवाई के बाद पाकिस्तान के साथ सब कुछ पहले जैसा सामान्य नहीं हो सकता। १६ दिसंबर की रात दिल्ली में हुए शर्मनाक गैंग रेप के बाद भी अपनी प्रतिक्रिया देने में प्रधानमंत्री ने इसी तरह से देर की थी और देश को इंतजार कराया था।

ई दिल्ली के सत्ता प्रतिष्ठान की ओर से देश का मूड समझने में की गई चूक को इस परिप्रेक्ष्य में पढ़ा जाना जरूरी है कि वायु सेनाध्यक्ष और थल सेनाध्यक्ष दोनों ने राजनीतिक और कूटनीतिक स्तरों पर की जाने वाली कोशिशों की परवाह किए बगैर सेना की चेतावनियों को समय रहते सीमा पार पहुंचा दिया। मनमोहन सिंह सरकार अपनी प्रतिक्रिया देने से पहले शायद इस बात की पुष्टि कर लेना चाहती थी कि इस्लामाबाद में अब सत्ता जनता के हाथों से निकलकर सेना के हाथों में पहुंचने जा रही है और पाकिस्तान की न्यायपालिका भी इस काम में उसका साथ दे रही है। पाकिस्तान की सेना ने अपने मकसद को अंजाम देने के लिए इस्लामाबाद की सड़कों पर तहरीक मिन्हाज-उल-कुरान के मुल्ला ताहिर-उल-कादरी और लाखों समर्थकों को खुला छोड़ दिया है।

पाकिस्तान में यह लोकतंत्र के खात्मे और खून-खराबे की शुरुआत है। मुल्ला पुलिस के जवानों और अर्ध सैनिक बलों को अपने अफसरों की अवज्ञा के लिए भड़का रहे हैं। निश्चित ही सारे संयोग बगैर किसी बड़े षड्‌यंत्र के एक साथ नहीं मिल सकते थे। भारतीय सैनिक का सिर काटने की कार्रवाई पाकिस्तान सेना के इस व्यापक षड्‌यंत्र का हिस्सा थी कि इस्लामाबाद में निर्वाचित सत्ता का वर्चस्व समाप्त होने जा रहा है और कि राष्ट्रपति जरदारी तथा प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ अब फैसले लेने की हालत में नहीं बचे हैं। इस्लामाबाद के ताजा हालातों से निकलने वाले सारे संकेत यही बनाते हैं कि पाकिस्तानी सेना भारत को युद्ध के लिए ललकारना और उकसाना चाहती है। नियंत्रण रेखा पर उसके द्वारा लगातार किया जा रहा संघर्ष विराम का उल्लंघन इसका प्रमाण है। पाकिस्तान में जो कुछ हो रहा है वह कोई “जन क्रांति” नहीं बल्कि “इस्लामिक अपराइजिंग” है जिसके कि सारे सूत्र सेना के हाथों में हैं और उसका कथित लोकतांत्रिक मुखौटा मुल्ला कादरी है जो केवल सेना और न्यायपालिका को ही मुस्लिम देश की अंतिम उम्मीद मानता है।

ब सवाल केवल यही बचे रहते हैं कि (१) क्या सेना और सरकार को पाकिस्तानी सेना द्वारा बिछाए जा रहे युद्ध के जाल में अपने आपको आसानी से फंस जाने देना चाहिए और आर-पार की लड़ाई में देश को झोंक देना चाहिए, या (२) कम से कम कुछ वक्त के लिए ही सही पाकिस्तान को अपने ही अंदरूनी दर्द से कराहने के लिए छोड़कर वहां की उस जनता की ओर से लोकतंत्र की बहाली के लिए की जा सकने वाली कार्रवाई का इंतजार करना चाहिए जो सेना की हरकतों का समर्थन नहीं करती और भारतीय लोकतंत्र की ओर उम्मीदों और हसरतों से देखती है। भारत के साथ इस मौके का इस्तेमाल पाकिस्तान को कारगिल, संसद पर हमले और २६/११ सहित तमाम हरकतों के लिए अंतिम रूप से सजा देने के लिए भी हो सकता है और साथ ही यह तय करने के लिए भी कि हम पाकिस्तान के लिए अपने दरवाजे और खिड़कियां अब हमेशा के लिए बंद करने को तैयार हैं। निश्चित ही इस बार की लड़ाई कारगिल से बहुत अलग रहने वाली है। भारत के खिलाफ इस्लामाबाद में जो तत्व षड्‌यंत्र कर रहे हैं, उन्हें सबक सिखाने के सभी विकल्पों का इस्तेमाल करने के लिए सरकार हमेशा की ही तरह मौजूदा संकट में भी स्वतंत्र है और देश की जनता का समर्थन भी उसे उपलब्ध है। देखना यही है कि उपलब्ध विकल्पों और जनता के समर्थन का उपयोग हमारी सरकार किस तरह से करती है।