पश्‍चाताप

कंठाली किराने वाले की
दुकान पर सुबह से शाम
बैठे हुए जब तुम
बुनते रहते थे सपने मेरे बारे में –
बहुत दूर तक भी नहीं
नज़दीक होने दिया मैंने तुम्‍हें
अपने ख़यालों में,
खोया रहा अपने ही सपनों में, बनाई हुई
दुनिया में अपनी,
जो थी दूर बहुत अलग तुमसे।

भूलकर भी आया नहीं ख़याल कभी –
पूछूं तुमसे तुम्‍हारा जन्‍मदिन
या कि तलाशूं किसी से कहीं –
कोई बचपन बिताया भी कि नहीं
कभी तुमने कहीं।

या फिर तुम हमेशा से थे
वैसे ही देखा जैसा मैंने तुम्‍हें –
लादे हुए पीठ पर अपनी
बोरियां गेहूं और सामान की
और चढ़ते हुए बड़ी-बड़ी
चालीस सीढि़यां घर की, दिन में चार बार।

सही बात तो है यह भी कि
देख ही पाया नहीं, ठीक से मैं तुम्‍हें कभी
जी भरके, ठीक वैसे ही जैसे
देखता रहा अपने आप को मैं
कभी आईने में, कभी आंखों में अपनी ही।

नज़र ही आया नहीं मुझे कभी
कब टूट गई होगी
फ्रेम चश्‍मे की तुम्‍हारे
लटका लिया होगा कैसे तुमने उसे
अपने मुरझाए-से कानों पर
डोर के सहारे पतले-से धागे की
पर नहीं आने दिया आड़े कभी
आंखों के मोतियाबिंद को अपने
लिखी होंगी जब चिट्ठियां मुझे
दो-चार जितनी तुमने
पर था तो मैं अभागा, नहीं पढ़ पाया कभी
हर दूसरी चिट्ठी में हरफ़ों के
किनारे टूट रहे हैं कितनी तेज़ी से
और अंधेरे में बैठे हुए तुम कहीं
चला रहे हो अपना काम
बनाकर मुझे
रोशनी आंखों की अपनी।