न्याय मिला, पर निर्भया के जख्मों की टीस कायम

[dc]दे[/dc]श के राष्ट्रीय स्वाभिमान की प्रतीक नई दिल्ली में पिछले साल 16 दिसंबर को एक चलती बस में 23 वर्षीय बहादुर युवती ‘निर्भया’ के साथ हुए बर्बरतापूर्ण कृत्य के अभियुक्तों को मौत की सजा सुना दी गई है। न्यायालय ने आरोपियों द्वारा खौफनाक तरीके से अंजाम दिए गए कुकृत्य को ‘दुर्लभ में दुर्लभतम’ (रेयरेस्ट ऑफ रेयर) माना है। निश्चित ही फांसी का फंदा दरिंदों की गर्दनों तक उतनी आसानी से नहीं पहुंच पाएगा जितनी निश्चिंतता और बेरहमी के साथ पहले अपराध किया गया फिर पीड़िता और उसके मित्र को सड़क पर दम तोड़ने के लिए फेंक दिया गया था। तालिबानी हुकूमतों और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के बीच फर्क बस इसी मुकाम पर पहुंचकर व्यक्त होता है। गौर किया जाए कि भारत ने तमाम प्रकार के अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद अपने आपको उन मुल्कों की बिरादरी में शामिल नहीं होने दिया है जहां फांसी की सजा या मृत्युदंड को समाप्त कर दिया गया है। हमारे यहां ऐसा होना इसलिए मुश्किल है, कि जिस तरह के समाज में हम सांस ले रहे हैं उसमें जघन्य अपराधों के प्रति भी व्यवस्था का आतंक इतना नपुंसक और पक्षपातपूर्ण हो गया है कि पीड़ित व्यक्ति अपने लिए न्याय की मांग की शुरुआत ही अपराधियों के लिए फांसी के फंदे की जरूरत से करता है। 16 दिसंबर की घटना के बाद जब पांच दिनों तक भी दिल्ली में व्यवस्था की नींद नहीं टूटी तो फिर गुस्से से भरी जनता ने राष्ट्रपति भवन के दरवाजों को भी हिलाकर रख दिया। इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन तक राजपथ को हजारों छात्र-छात्राओं ने अपने आक्रोश से छलनी कर दिया। सुरक्षा बलों की लाठियां, अश्रु गैस के गोले और पानी की तेज बौछारें भी युवाओं के क्रोध को शांत नहीं कर सकी। सभी अभियुक्तों के लिए जनता के एक बड़े वर्ग द्वारा मौत की सजा की मांग का संबंध ‘निर्भया’ को न्याय उपलब्ध करवाने के साथ केवल सांकेतिक माना जाना चाहिए। इसका संबंध इस सच्चाई से ज्यादा है कि इस तरह की घटनाओं के प्रति आम जनता का बढ़ता असंतोष स्वयं के द्वारा कुछ कर न पाने की आत्मग्लानि और कबीलाई प्रतिशोध में तब्दील होता जा रहा है। अत: जैसे-जैसे 16 दिसंबर जैसे अपराधों की संख्या बढ़ती जाएगी, फांसी की सजा की मांग और उसकी पूर्ति भी कम-ज्यादा अनुपात में नजर होती आने लगेगी। उस डरावने क्षण की कल्पना करके अभी से सिहरा जा सकता है जब ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ श्रेणी के अपराधों के पहाड़ अदालतों के दरवाजों पर जमा होते जाएंगे। अत: निर्भया कांड से उपजे सम्मिलित गुस्से को ‘जो चल रहा है और जैसे चल रहा है’ के खिलाफ ही जनता द्वारा मृत्युदंड की मांग मानना चाहिए। मौजूदा व्यवस्था में जब तक परिवर्तन नहीं होता, निर्भया कांड की पुनरावृत्ति को रोका नहीं जा सकेगा। दिल्ली की फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा दरिंदों को मौत की सजा सुनाए जाने को न्याय प्राप्ति की बड़ी उपलब्धि में शामिल करने के बजाय ‘निर्भया’ के उन दुखों में गिनना चाहिए जो किसी भी देश के लिए राष्ट्रीय शर्म का कारण हो सकते हैं।

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