“नायकों” और “पुतलों” का फर्क

क ऐसे वक्त जब समूचे देश में “कौन बनेगा प्रधानमंत्री” को लेकर एक जी-घबराऊ बहस चल रही हो, सुखद लगता है कि मीडिया के दबे-छुपे कोनों में ऐसे दो नायकों को लेकर भी थोड़ी-बहुत चर्चा चल रही है, जिनके बारे में अलग-अलग कारणों से लोगों को ज्यादा जानने और समझने का या तो अवसर प्राप्त नहीं हुआ या ऐसा होने नहीं दिया गया। इन दो नायकों में पहले हैं लातिन अमेरिकी देश वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज, जिनका हाल ही में निधन हुआ है और दूसरे हैं हमारे ही उत्तर-पूर्वी राज्य त्रिपुरा के नव-निर्वाचित मुख्यमंत्री मानिक सरकार। शावेज और “मानिक दा” के बीच और बहुत सारी समानताओं के अतिरिक्त जो विशेषता है, वह यह कि दोनों ही उस साम्यवादी विचारधारा से जुड़े रहे हैं, जिसका कि सारी दुनिया में धीरे-धीरे अवसान हो रहा है। शावेज के बारे में उनके निधन के बाद से लगातार ही लिखा जा रहा है। बताया जा रहा है कि एक नेता की शारीरिक अनुपस्थिति एक राष्ट्र के अस्तित्व पर कितना बड़ा और गंभीर फर्क डाल सकती है! एक अकेला योद्धा दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत अमेरिका से कैसे लोहा ले सकता है! शावेज का यूं चले जाना वेनेजुएला जैसे मुल्क की गरीब जनता के साथ-साथ समूचे दक्षिण अमेरिका के लिए कैसे नेतृत्व का संकट खड़ा कर सकता है! पर हम यहां शावेज के साथ-साथ बात अपने मानिक सरकार की करना चाहते हैं, जिनकी देश के सुदूर उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में उपस्थिति दिल्ली के राजनीतिक मंचों और राजनीतिक चर्चाओं में हलचल पैदा नहीं करती। त्रिपुरा साम्यवादियों का एकमात्र गढ़ बचा है, जहां उनकी साझा सरकार है। पश्चिम बंगाल और केरल के बाद साम्यवादियों की “सरकार” में नाक ऊंची रखने के लिए मानिक दा ही बचे हैं।

देश के सबसे बड़े विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी की पिछले दिनों नई दिल्ली में संपन्न् हुई राष्ट्रीय परिषद में नरेंद्र मोदी का इसलिए भी सम्मान किया गया कि वे तीसरी बार गुजरात के मुख्यमंत्री चुने गए। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों का आह्वान किया कि वे भी नरेंद्र मोदी की तरह हैट्रिक बनाकर दिखाएं और ऐसा ही “स्टैंडिंग ओवेशन” प्राप्त करें। चौंसठ वर्षीय मानिक सरकार ने त्रिपुरा में लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री पद की हाल ही में शपथ ली है। लगभग चालीस लाख की आबादी वाले इस छोटे-से राज्य के मुख्यमंत्री के पास अपना कोई घर नहीं है, कोई निजी कार नहीं है। कोई उल्लेख करने लायक बैंक बैलेंस नहीं है। मानिक सरकार मोबाइल फोन का उपयोग नहीं करते और न ही उनकी सरकारी कार पर किसी लालबत्ती का उपयोग होता है। साधारण मध्यम-वर्ग से निकलकर शीर्ष पर पहुंचने वाले त्रिपुरा के इस मुख्यमंत्री की एक और विशेषता यह है कि वे हर सुबह अपने कपड़े स्वयं धोते हैं। न तो उनका कोई फैशन डिजाइनर है और न ही वे कोई “डिजाइनर क्लॉथ” पहनते हैं। मानिक सरकार के पूर्व केवल ज्योति बसु ने माकपा और भाकपा की गठबंधन सरकारों का सबसे लंबे समय तक (जून 1977 से नवंबर 2000) पश्चिम बंगाल में नेतृत्व किया था। जैसा कि आरोप लगाया जाता है, बसु को उनकी ही पार्टी के एक तबके ने कोलकाता से नई दिल्ली नहीं पहुंचने दिया अत: अगर मानिक सरकार की भी कोई चर्चा नहीं होती और न ही दिल्ली के मंचों पर अन्य राजनेताओं की तरह सम्मान, तो समझा जा सकता है।

शावेज और मानिक सरकार जैसे नायक उस विश्वास के प्रतीक हैं कि अगर संस्कारों में राजनीतिक ईमानदारी है तो एक लंबे समय तक जनता के दिलों पर राज किया जा सकता है। घोर अमेरिकी विरोध के बावजूद शावेज अगर लगातार चौदह वर्षों तक वेनेजुएला के राष्ट्रपति बने रहे और मानिक सरकार अगर चौथी बार त्रिपुरा के मुख्यमंत्री चुन लिए जाते हैं तो यह किसी प्रतिबद्धता का ही परिणाम होना चाहिए, जो वर्तमान में समाप्त होती जा रही है। शावेज के निधन पर अगर वेनेजुएला की कोई तीन करोड़ की आबादी विलाप करती है और मानिक सरकार को चौथी बार सत्ता सौंपकर त्रिपुरा की चालीस लाख जनता गर्व महसूस करती है तो यह सभी राजनेताओं के लिए सीख लेने का अवसर है कि सत्ता की राजनीति करते हुए भी नायकत्व को कैसे प्राप्त किया जा सकता है। पर हम जानते हैं कि राजनीति की जिस अंधी सुरंग में जनता को केवल ‘मतदाता” समझकर धकेलने की प्रतिस्पर्द्धा चल रही है, उसमें प्रतिबद्धताओं के लिए कम जगहें और सीमित गुंजाइशें बची हैं। अतीत में हमारे यहां ऐसे नायकों की कतारबद्ध शृंखला रही है, जिनकी उपस्थिति मात्र से समूची जनता अपने आपको रोमांचित और उनकी अनुपस्थिति से अपने को अनाथ और असहाय महसूस करती थी।

वेनेजुएला की गरीब जनता के प्रति शावेज की प्रतिबद्धता के बहाने त्रिपुरा के मुख्यमंत्री का बखान इसलिए होना चाहिए कि घोर राजनीतिक निराशा के दौर में अगर उदासी को तोड़कर मुस्कराना हो तो कुछ ईमानदार दीयों का जलते हुए नजर आना जरूरी है। इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ना चाहिए कि वे दीये नई दिल्ली के राजपथ से कितनी दूरी पर किन कोनों को अपनी रोशनी दे रहे हैं। पर ईमानदारी की बात यह भी है कि हमारे अतीत के “नायक” वक्त के साथ कंप्यूटर के “आयकंस” में तब्दील हो गए हैं और उन्हें अंधेरों से निकालकर स्क्रींस पर चमकाने का ठेका बड़ी-बड़ी प्रचार और विज्ञापन एजेंसियों ने ले लिया है। बाजार की ताकतें इन कंप्यूटरी “आयकंस” को पहले पर्दों और मंचों पर स्थापित करती हैं और फिर उनके पुतलों को मोम में ढालकर संग्रहालयों में स्थापित करवाती हैं। लगभग समूचा दक्षिणी अमेरिका अगर ओबामा के चमकीले अमेरिका से या हमारा पूर्वोत्तर नई दिल्ली से कटा-कटा और अलग-थलग महसूस करता हो, तो उसके कारण हमें उन “आयकंस” की गाथाओं में ढूंढ़ना पड़ेंगे, जिन्हें मोम के पुतलों में ढालकर शिखरों पर स्थापित करने की तैयारियां की जा रही हैं और जो हमारी आत्माओं से जुड़े असली “नायकों” से भिन्न हैं।