धार्मिक यात्रा का राजनीतिक महात्म्य

विश्व हिंदू परिषद की चौरासी कोसी परिक्रमा यात्रा के 25 अगस्त को अपेक्षाकृत अंदाज में शुरू नहीं हो पाने या कथित तौर पर ‘फ्लॉप’ हो जाने को उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की चुनावी संभावनाओं के साथ जोड़कर देखे जाने की गलती नहीं की जानी चाहिए। यात्रा को विश्व हिंदू परिषद का एक ऐसा शक्ति-परीक्षण मानते हुए खारिज भी किया जा सकता है, जिसमें सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी को पर्याप्त तैयारी कर उसका सार्वजनिक प्रदर्शन भी करने का पूरा अवसर प्राप्त हो गया। सही पूछा जाए तो विश्व हिंदू परिषद की कोशिश से जो संदेश हाल-फिलहाल गया है, वह यही है कि इस परिक्रमा यात्रा को भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्पष्ट समर्थन प्राप्त नहीं था। अगर होता तो अयोध्या और लखनऊ का परिदृश्य ही शायद कुछ और होता। लगभग बीस करोड़ की आबादी वाले एक ऐसे राज्य, जिसमें कि 82 प्रतिशत संख्या हिंदुओं की हो, में केवल डेढ़-दो हजार साधु-संत और परिषद के कार्यकर्ता ही अपनी गिरफ्तारियां देने के लिए उपलब्ध हो सकें, सामान्य राजनैतिक समझ से बाहर माना जाना चाहिए। वे तमाम राजनैतिक विश्लेषक, जो नरेंद्र मोदी के दिमाग और उनकी चुनावी रणनीति का लोहा मानते हैं, यह जानते हैं कि उत्तर प्रदेश की मूल्यवान अस्सी सीटों को लेकर गुजरात के मुख्यमंत्री इतने अनियोजित ढंग से अपनी प्रधानमंत्री पद की आकांक्षा को दांव पर नहीं लगा सकते थे। गुजराती भाषी अमित शाह को हिंदी भाषी उत्तर प्रदेश की बागडोर अगर मोदी ने सौंपी है तो वह प्रवीण भाई तोगड़िया की विश्व हिंदू परिषद की चौरासी कोसी यात्रा को किसी भी कीमत पर संपन्न् कराने के लिए तो निश्चित ही नहीं हो सकती थी। जो लोग गुजरात की राजनीति पर नजर रखते आए हैं, वे जानते हैं कि विश्व हिंदू परिषद के कार्यकारी अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष और अहमदाबाद के ही रहवासी तोगड़िया का मोदी के साथ हमेशा से ही छत्तीस का आंकड़ा रहा है। अत: बहुत मुमकिन है कि रविवार को हुए प्रयोग को मोदी समर्थक भाजपा को समाजवादी पार्टी के मुकाबले कमजोर साबित करने की कार्रवाई मानते हुए अब उत्तर प्रदेश में नए सिरे से जोर लगाने की रणनीति बनाएं। परिक्रमा यात्रा को लेकर अखिलेश यादव के पक्ष में माहौल यही बन गया था कि एक बार फिर बीस साल पहले जैसी परिस्थितियां उत्पन्न् होने जा रही हैं और प्रदेश सरकार उससे निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार है। न तो अखिलेश यादव को और न ही कांग्रेस को ही ऐसी उम्मीद रही होगी कि भाजपा समूचे उपक्रम से अपनी ‘शारीरिक’ दूरी बनाए रखेगी और समर्थन के जुबानी जमाखर्च से ही अपना काम चला लेगी। निश्चित ही नरेंद्र मोदी और राजनाथ सिंह सहित दूसरे नेता परिक्रमा यात्रा की सफलता/असफलता के लिए भाजपा की ओर से कोई प्रत्यक्ष योगदान देकर राजनैतिक जोखिम उठाने की स्थिति में नहीं थे।

चौरासी कोसी परिक्रमा यात्रा का मैच केवल इसी मायने में ‘फिक्स’ माना जा सकता है कि मोदी के नेतृत्व को भारतीय जनता पार्टी से ही जुड़े कुछ हलकों की ओर से परोक्ष रूप से चुनौती मिल सकती है, जिसका कि लाभ कांग्रेस-बसपा को कम और समाजवादी पार्टी को ज्यादा प्राप्त हो सकता है। इस बात का खुलासा होना अभी बाकी है कि विश्व हिंदू परिषद और संतों की जमात द्वारा चौरासी कोसी परिक्रमा यात्रा के आयोजन का फैसला लेते वक्त या विहिप नेताओं द्वारा 17 अगस्त को मुलायम सिंह और अखिलेश के साथ लंबी मुलाकात से पहले मोदी और अन्य भाजपा नेताओं को विश्वास में लिया गया था या नहीं! या फिर ऐसा करने की कोई जरूरत ही नहीं समझी गई? चौरासी कोसी परिक्रमा यात्रा के समूचे घटनाक्रम से मोदी समर्थकों के साथ-साथ कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी के चिंतित होने में आश्चर्यजनक कुछ भी नहीं माना जाना चाहिए।

विश्व हिंदू परिषद की कार्रवाई पर इस दृष्टि से भी विचार किए जाने की जरूरत है कि क्या नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को वास्तव में ही इतने आक्रामक तरीके से उठाना चाहती है कि समूची मुस्लिम आबादी को अपने खिलाफ कर ले? मोदी इस बात को अब बखूबी समझते हैं कि हिंदू और अल्पसंख्यक मतदाताओं का ध्रुवीकरण करके किसी राज्य विशेष का मुख्यमंत्री तो बना जा सकता है पर भारत देश का प्रधानमंत्री पद प्राप्त करने के लिए समाज के सभी वर्गों की सहमति और सहानुभूति उन्हें बटोरनी होगी। गुजरात में वर्ष 2002 में हुए दंगों की आग से एक दशक बाद भी झुलस रहे नरेंद्र मोदी निश्चित ही राम मंदिर के निर्माण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करते हुए भी किसी तरह की आक्रामक अभिव्यक्ति को अपने राजनैतिक भविष्य के साथ नत्थी नहीं करना चाहेंगे। गौर किया जाए कि 25 अगस्त को हुए परिक्रमा प्रदर्शन के एक सप्ताह पहले ही मोदी ने पार्टी कार्यकर्ताओं का आह्वान किया था कि वे मुसलमानों सहित समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचें। मोदी साथ ही यह दावा करना भी नहीं भूले कि गुजरात में बीस से पच्चीस प्रतिशत मुस्लिमों ने उन्हें वोट दिया है। इस परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण करें तो मोदी और विश्व हिंदू परिषद की रणनीति परस्पर विरोधी नजर आती है। संदेह उत्पन्न् होता है कि मुस्लिम मतदाताओं के एकतरफा ध्रुवीकरण की राजनीति पर काम कर रही समाजवादी पार्टी को परिक्रमा यात्रा के प्रयोग से कुछ भी मदद नहीं पहुंची होगी। विश्व हिंदू परिषद को कोई पांच दशकों के बाद अचानक से चौरासी कोसी यात्रा का स्मरण हो आना और आम तौर पर चैत्र माह में होने वाले अनुष्ठान को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की मनाही के बावजूद भादो में संपादित करना कहीं न कहीं से भारतीय जनता पार्टी में मोदी के नेतृत्व को लेकर बनते-बिगड़ते समीकरणों से भी जोड़ता है। चौरासी कोसी यात्रा के विहिप के प्रयोग से दूसरा बड़ा संकेत यह भी निकलता है कि आने वाले चुनाव में भाजपा विकास और उससे जुड़े मुद्दों को ही अपना हथियार बनाना चाहती है, धार्मिक उन्माद को नहीं। अगर वास्तव में भी ऐसा ही होता है तो विश्व हिंदू परिषद की चौरासी कोसी परिक्रमा यात्रा को प्रकारांतर से देश की जनता के हित में सफलतापूर्वक संपन्न् हुआ आयोजन माना जाना चाहिए। और फिर परिक्रमा यात्रा की इस रिहर्सल से भाजपा को इतना ज्ञान तो प्राप्त हुआ ही है कि जनता अब ज्यादा समझदार हो गई है और वह किसी धार्मिक मुद्दे के शोर-शराबे में सत्ता-परिवर्तन करने का जोखिम उठाने को तैयार नहीं है।