देश को किधर ले जाएगा बिहार

देश उत्सुकता के साथ इसकी प्रतीक्षा कर रहा है कि बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार की शपथ के साथ शुरू हुआ विपक्षी राजनीतिक दलों का शक्ति-प्रदर्शन क्या आने वाले दिनों में किसी राष्ट्रीय महागठबंधन में तब्दील होगा या फिर संसद के एक और हंगामेदार सत्र के बाद अपने-अपने कुनबों और कबीलों में वापस सिमट जाएगा? पिछले साल दिसंबर में दिल्ली में हुई आम आदमी पार्टी की ‘अहंकारी ‘ जीत ने लोकसभा चुनावों के बाद से सुन्न और सुस्त पड़े विपक्ष की राष्ट्रीय आकांक्षाओं को पुनर्जीवित कर दिया था। अरविंद केजरीवाल का उदय नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के केवल सात महीनों में हो गया था। तब अनुमान लगाए गए थे कि अन्ना हजारे के आंदोलन की कोख से जन्मा यह नेतृत्व ही आगे चलकर देश के विपक्ष की भी अगुआई करने वाला है। दिल्ली के बाद दस महीनों के भीतर नीतीश कुमार के रूप में एक और राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा का उदय हो गया। इसी के साथ अरविंद केजरीवाल नेपथ्य में चले गए। बीस नवंबर को पटना के गांधी मैदान में मंच पर नीतीश कुमार भी थे और अरविंद केजरीवाल भी। अभूतपूर्व नजारा था कि अपने आंदोलन ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन ‘ के दौरान लालू प्रसाद यादव को भ्रष्ट बताने वाले अरविंद केजरीवाल राजद नेता के साथ गले मिल रहे थे। लालू यादव से गले मिलने पर सवाल उठे तो केजरीवाल ने सफाई में कहा कि उन्होंने तो लालू यादव की तरफ केवल हाथ बढाया था, लेकिन राजद नेता ने उन्हें खींच कर गले से लगा लिया।

बहरहाल मुद्दा यह है कि बिहार में सफल हुआ तीन प्रमुख दलों के महागठबंधन का प्रयोग अब उन पंद्रह राजनीतिक दलों को एकजुट करने में सफल हो सकेगा या नहीं जिनके नेता नीतीश कुमार को शुभकामनाएं प्रेषित करने के लिए पटना में उपस्थित थे? इन दलों की सिर्फ वैचारिक प्रतिबद्धताएं ही अलग-अलग नहीं हैं, क्षेत्रीय जरूरतें और आकांक्षाएं भी बंटी हुई हैं। पंजाब में अकाली दल और कांग्रेस के बीच चल रही लड़ाई इसका प्रमाण है। बिहार के चुनाव परिणाम आगे चलकर देश की राजनीति को किस तरह प्रभावित करने वाले साबित हो सकते हैं उस पर गौर किया जाना जरूरी है। पहला तो यह कि बिहार में गठबंधन की जीत का एक बड़ा कारण नीतीश कुमार द्वारा भाजपा के खिलाफ पडऩे वाले मतों के विभाजन को सफलतापूर्वक रोक पाना रहा। बिहार की जमीन से ही इस तरह का पहला बड़ा प्रयोग जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में 1974 में हुआ था। इसी प्रयोग की परिणति 1977 के चुनावों में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस की केंद्र से बेदखली से हुई थी। उस समय लालू यादव, नीतीश कुमार, सुशील मोदी, रामविलास पासवान आदि सब साथ-साथ थे। उस समय निशाने पर इंदिरा गांधी थीं। कोई चार दशकों के अंतराल के बाद ऐसा हुआ है कि चुनाव एक व्यक्ति विशेष के विरोध का मुद्दा बनाकर लड़ा गया।

अगर लोकसभा चुनाव के पहले नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश नहीं किया जाता तो नीतीश कुमार को बिहार में भाजपा के साथ चलते रहने में कोई दिक्कत नहीं थी। आरक्षण के मुद्दे पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचार तब भी वैसे ही रहे होंगे जैसे कि आज हैं। कांग्रेस को भी आज कोई परेशानी नहीं है कि वह अपने ‘मोदी हटाओ ‘अभियान में उन राजनीतिक दलों और नेताओं के साथ खडी दिखाई दे जो किसी समय ‘इंदिरा हटाओ ‘आंदोलन चलाते हुए आपातकाल की ज्यादतियों के शिकार हुए थे और जेलों में भर दिए गए थे। बिहार की जीत के नायक के रूप में उभरे नीतीश कुमार की पहली कोशिश यही हो सकती है कि भाजपा के खिलाफ विपक्षी दलों के बीच के मत विभाजन को रोक पाएं, खासकर उत्तर प्रदेश में। पश्चिम बंगाल में इसकी संभावना नहीं ही रहेगी।

अब यह साफ है कि बिहार के चुनाव अगर एक संग्राम के रूप में लड़े गए थे तो उत्तर प्रदेश में वे ‘महासंग्राम ‘ साबित होने वाले हैं। नीतीश कुमार ने अपने काम की शुरुआत भी कर दी है। अपने चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को नीतीश कुमार ने वहां कांग्रेस की झोली में डाल दिया है। मुलायम सिंह यादव ने अपने आपको बिहार के महागठबंधन से अलग करके नीतीश कुमार को सत्ता से वंचित रखने की असफल कोशिश की थी। नीतीश कुमार ने हिसाब बराबर करते हुए मुलायम सिंह को बता दिया है कि उत्तर प्रदेश में वे (और लालू यादव भी) कांग्रेस के साथ हैं। सपा चाहे तो भाजपा के साथ गठबंधन कर सकती है। बिहार के चुनावी परिणाम राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ कोई महागठबंधन नहीं बना पाए तब भी आने वाले चुनाव राज्यसभा में विपक्षी दलों की ताकत को और मजबूती प्रदान कर सकते हैं। वर्तमान में भी उन राजनीतिक दलों की सम्मिलित शक्ति भाजपा से कहीं ज्यादा है जो या तो उसके राजनीतिक विरोधी हैं या फिर केंद्र और राज्यों में उसके सहयोगियों के तौर पर सत्ता में शामिल हैं। उत्तर प्रदेश के चुनाव इस लिहाज से राज्यसभा और 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव, दोनों में ही भाजपा के गणित को गड़बड़ा सकते हैं। यह निश्चित है कि इस राजनीतिक उथल-पुथल का सबसे बड़ा शिकार प्रधानमंत्री का विकास का एजेंडा ही बनेगा। विपक्षी दल चाहेंगे भी यही कि वे नरेंद्र मोदी को असफल करके दिखाएं।

बिहार के चुनाव परिणाम देश की भावी राजनीति को इस तरीके से भी प्रभावित कर सकते हैं कि मतदाताओं को अगड़ों और पिछड़ों में बिहार की तर्ज पर आपस में बांट दिया जाए। भाजपा के खिलाफ बिहार में यही प्रचार किया गया कि वह किसानों, दलितों और पिछड़ों के हितों के साथ नहीं हैं। दूसरी ओर भाजपा के कुछ अति उत्साही और वैचारिक रूप से अतिवादी नेताओं ने विपक्ष को मौका दे दिया कि वह असहिष्णुता और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण जैसे मुद्दों को उठाकर मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को भाजपा के प्रति आशंकित कर दे। उत्तर प्रदेश में मायावती और कांग्रेस बिहार के प्रयोग को ही दोहराते हुए चुनाव लड़ सकते हैं। बहुत मुमकिन है कि आगे चलकर मतदाताओं को इसी तरह देश भर में भी बांटने की कोशिशें हों और जाति-संघर्ष के साथ-साथ वर्ग संघर्ष की आशंकाएं आकार लेने लगें। पटना के शपथ ग्रहण समारोह में पहुंचे विभिन्न दलों के नेता निश्चित ही अपने लिए चुनाव जीतने के कुछ नए गुर लेकर ही वापस लौटे होंगे। भाजपा के लिए यह समय अपने अंदर झांकने और नई चुनौतियों के मुताबिक परिवर्तन करने का है, बशर्ते वह ऐसा करना चाहे।