देश का गृह मंत्री कैसा हो?

१२ सितंबर २०११

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के पश्चात केंद्र सरकार में अगर किसी अन्य व्यक्ति की प्रतिष्ठा दांव पर है तो वे गृह मंत्री पी. चिदंबरम हैं। उनको निशाने पर लाने वालों में उनकी ही पार्टी और सरकार के लोगों के साथ ही सिविल सोसाइटी के नुमाइंदे भी शामिल हैं। चार जून को दिल्ली के रामलीला मैदान की घटना के बाद से बाबा रामदेव और उनके समर्थक तो गृह मंत्री से नाराज थे ही, भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के नेतृत्व में सिविल सोसाइटी द्वारा चलाए गए आंदोलन के दौरान घटनाक्रम ने जिस तरह से मोड़ लिया उसने चिदंबरम के साथ ही अन्य मंत्रियों को भी जनता की नाराजगी के दायरे में ला खड़ा किया। बाकी बची कसर हाल में देश की राजधानी दिल्ली में हुए बम विस्फोट ने पूरी कर दी। दिल्ली पुलिस और एनआईए (नेशनल इंवेस्टीगेशन एजेंसी) सहित तमाम जांच दस्तों को दिल्ली उच्च न्यायालय के बाहर हुए विस्फोटों का अभी तक कोई पुख्ता सुराग हाथ नहीं लग पाया है। जिस तरह के धमकी भरे ई-मेल सामने आ रहे हैं, उनसे जांच एजेंसियों की चिंता और बढ़ गई है। ‘देश का नेता कैसा हो’ कि तर्ज पर सवाल हवा में उछाला जा सकता है कि देश का गृह मंत्री कैसा हो? पर मुद्दा यह भी है कि क्या केवल गृह मंंत्री को बदल दिए जाने से कांग्रेस पार्टी की परेशानियां कम हो जाएंगी और देश में सरकार की जय-जयकार होने लगेगी? या फिर मामला उस समूची व्यवस्था में परिवर्तन से जुड़ा है जिसकी चिदंबरम भी सवारी कर रहे हैं और उसकी खामियों के शिकार बनाए जा सकते हैंं। मुंबई हमले के बाद शिवराज पाटील को जिन आरोपों के चलते गृह मंत्री के पद से हटना पड़ा था वे अपनी जगह वाजिब भी हो सकते हैं, पर उस बदलाव के बाद सरकार की समूची व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन आ गया हो ऐसा नहीं कहा जा सकता। दूसरे यह भी कि क्या गृह मंत्री का पद संभालने के लिए ढेर सारे विकल्प मौजूद हैं? अत: अपने खिलाफ उठने वाली हर तरह की अंदरूनी और बाहरी आवाजों के बावजूद चिदंबरम को अपने पद पर बने भी रहना पड़ सकता है और समस्याओं से जूझते रहना भी। यह भी तय है कि गृह मंत्रालय की समस्याओं का जवाब गृह मंत्री और सरकार को ही ढूंढऩा है, किसी और को नहींं। जरा गौर किया जाए कि सरकार की मौजूदा व्यवस्था में क्या गृह मंत्री के पास इतना वक्त बच सकता है कि वे उन तमाम मुद्दों पर गहराई और इत्मिनान से गौर फरमा सके जिनकी कि देश चिदंबरम, शिवराज पाटील या किसी अन्य गृह मंत्री से उम्मीद कर सकता है। बिना इस विस्तार में जाए कि गृह मंत्रालय के कामकाज का संसार कितना व्यापक है, इस तथ्य में झांकना जरूरी है कि वर्तमान में गृह मंत्री को और किन-किन कामों में व्यस्त कर दिया गया है। प्रधानमंत्री ने सरकार के कामकाज को निपटाने अथवा फैसलों का विकेंद्रीकरण करने के लिए मंत्रिमंडल के अंदर ही छोटे-छोटे मंत्रिमंडल बना डाले हैं। इस प्रक्रिया ने प्रधानमंत्री के बोझ को तो हल्का कर दिया है पर वित्त मंत्री के साथ ही गृह मंत्री के कामकाज को काफी बढ़ा दिया है। इन छोटे-छोटे या मिनी मंत्रिमंडलों को मंत्री-समूह (ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स-जीओएम) और अधिकारप्राप्त मंत्री-समूह (एम्पावर्ड ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स-ईजीओएम) निरूपित किया गया है। मंत्रिमंडल के जिम्मे के अधिकांश बड़े और महत्वपूर्ण काम इन्हीं दो समूहों के हवाले करके सरकार चलती है। प्रधानमंत्री की प्रशासनिक निश्चिंतता का एक बड़ा कारण इन दोनों समूहों का गठन भी हो सकता है। आंकड़ों में प्रवेश करें तो कुल 14 ईजीओएम में सेे सात में चिदंबरम सदस्य हैं और एक के प्रमुख हैं। प्रणब बाबू शेष तेरह के प्रमुख हैं। ईजीओएम के विषयों पर गौर करके गृह मंत्री की व्यस्तता के कारण ढूंढ़े जा सकते हैं। ये विषय हैं थ्री-जी स्पेक्ट्रम की नीलामी, अनाज की सरकारी खरीद, सार्वजनिक निकायों में सरकार के हिस्से के शेयरों की बिक्री का मूल्य निर्धारण, स्पेशल इकोनॉमिक जोन, आदि। इसी प्रकार 35 जीओएम में से दस के प्रमुख चिदंबरम हैं और ग्यारह में वे सदस्य हैं। इनके विषय हैं: खाद नीति, आसियान देशों से व्यापार, प्रशासनिक सुधार आयोग की रिपोट्र्स, नागरिक उड्डयन, प्रसार भारती, भोपाल गैस कांड, पेड-न्यूज आदि-आदि। विषयों का अध्ययन करने के बाद समझाने के लिए कहा जा सकता है कि प्रत्येक समस्या का अंत में संबंध लोगों के संतोष/असंतोष अथवा कानून-व्यवस्था बनाए रखने से ही होता है अत: देश के गृह मंत्री का हाथ देश की नब्ज पर पूरी तरह से होना चाहिए। संदेह है कि देश अपने गृह मंत्री की व्यस्तताओं के विषयों को हजम कर पाने को आसानी से तैयार हो सकेगा। बाबा रामदेव के आंदोलन और जन लोकपाल बिल को लेकर प्रकट हुई गृह मंत्री की गहन व्यस्तता और दिए गए कुल समय को उनके मंत्रालय के कामकाज से जोडक़र देखे जाने पर अलग से चर्चा की जा सकती है। आतंकवाद पर चर्चा की बहस मेें अक्सर दोहराया जाता है कि 11 सितंबर 2001 को बरपे कहर के बाद अमेरिका में व्यवस्था इतनी चाक-चौबंद कर दी गई कि वहां फिर से ऐसी कोई घटना नहीं हुई। कारणों की खोज की जानी चाहिए कि अमेरिका ने आखिर ऐसा क्या चमत्कार कर दिया कि दुनिया इस तरह से आश्चर्यचकित है। खबरों के मुताबिक, हमारी सरकार आतंकवाद पर सफलतापूर्वक काबू पाने वाले अमेरिका के यूएस डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्यूरिटी के मॉडल को भारत में अपनाने की इच्छा रखती है। इस अमेरिकी डिपार्टमेंट की स्थापना 11 सितंबर 2001 के हमले के बाद राष्ट्रपति बुश द्वारा की गई थी। अपनी आंतरिक सुरक्षा को लेकर किए गए सफल अमेरिकी प्रयोग और भारत के संदर्भ में हमारे गृह मंत्रालय की ‘आवश्यक-अनावश्यक’ व्यस्तताओं पर बहस होना इसलिए आवश्यक हो गया है कि कोई गृह मंत्री चाहे जितना भी सक्षम क्यों न हो व्यवस्था की खामियां और राजनीतिक मजबूरियां उसे असफल सिद्ध करती ही रहेंगी। कारण पूछे जा सकते हैं कि देश को अपने प्रधानमंत्रियों के ही नाम क्यों याद रहते हैं, गृह मंत्रियों के क्यों नहीं?