देश और भाजपा हित में अच्छे नतीजे

उपचुनावों के नतीजों पर प्राप्त हो रही प्रतिक्रियाओं का रुख लगभग सही दिशा में ही है। योगी आदित्यनाथ के तेवर ठंडे पड़ गए हैं और उद्धव ठाकरे के चेहरे पर मुस्कराहट है। पर, प्राप्त परिणामों से इस आशय के कयास भी नहीं लगाए जाने चाहिए कि सरकार के सौ दिन पूरे होते ही विपक्ष के अच्छे दिन आ गए हैं। कुल जमा बत्तीस सीटों में से बीस पर भाजपा की हार का प्रारंभिक संकेत यही है कि विपक्ष वेंटीलेटर से उठकर आईसीयू में पहुंच गया है। भारतीय राजनीति के लिए यह एक शुभ संकेत है कि विपक्षी पार्टियां अपने को अभी लड़ाई के मैदान में कायम रखना चाह रही हैं। पिछले चुनाव में लालू और नीतीश ने एक सर्वथा असंभावित गठबंधन को साकार कर भाजपा के लोकसभाई ‘अहंकार’ को नियंत्रित किया था। इस उपचुनाव में मायावती की बहुजन समाज पार्टी ने अपने को मैदान से बाहर रखकर समाजवादी पार्टी को कुल ग्यारह में से आठ सीटों पर जीत प्राप्त करने में मदद कर दी। विपरीत ध्रुवों वाले विपक्षी दलों के बीच अप्रत्याशित गठबंधनों की पहल के नतीजे सामने हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार भारतीय जनता पार्टी के सपनों के साम्राज्य हैं। लोकसभा चुनावों में भी इन दोनों राज्यों से ही सबसे ज्यादा चौंकाने वाले नतीजे प्राप्त हुए थे। ताजा परिणाम हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभाओं के लिए अक्टूबर में होने वाले चुनावों को किस हद तक प्रभावित कर पाते हैं, देखना इसलिए दिलचस्प होगा कि अब सभी पक्ष अपनी समूची ताकत उनमें झोंकने वाले हैं। उपचुनावों के नतीजे इन मायनों में हितकारी साबित हो सकते हैं कि इनसे भारतीय जनता पार्टी को अपने सहयोगी दलों के प्रति ज्यादा उदारता बरतने में मदद मिलेगी। और शायद यह भी कि सत्तारूढ़ दल अपनी कार्यप्रणाली को और ज्यादा प्रजातांत्रिक बनाएगा।

देश की जनता ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को पांच वर्षों तक शासन करने का अधिकार दिया है। अत: यह मानने की भूल नहीं की जानी चाहिए कि जनता का सरकार से मोहभंग हो गया है या कि होने जा रहा है। ऐसा बिलकुल नहीं है। पर यह जरूर सिद्ध हुआ है कि, खासकर उत्तर प्रदेश में, भारतीय जनता पार्टी की चुनावी ‘रणनीति’ विफल हो गई। वह रणनीति अगर ‘हिंदुत्व’ के मुद्दे के आधार पर प्रदेश का ध्रुवीकरण कर ज्यादा सीटें जीतने तक ही सीमित थी तो उसका विफल होना व्यापक संदर्भों में स्वागतयोग्य भी है। राष्ट्रीय क्षितिज पर नरेंद्र मोदी का ‘अवतरण’ एक ऐसे विकास-पुरुष के रूप में हुआ था, जिसने गुजरात में समृद्धि का एक मॉडल खड़ा किया है। और कि उस मॉडल को देशभर में दोहराया जा सकता है। उपचुनावों के नतीजे अगर भाजपा को उसके विकास के एजेंडे पर लौटने के लिए मजबूर करते हैं तो उसे इन उपचुनावों की बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है। लोकसभा चुनावों में मिले प्रचंड बहुमत के बाद अगर इन विधानसभा उपचुनावों में भी भाजपा को वैसा ही समर्थन प्राप्त हो जाता तो हमारे नए शासक जनता से और ज्यादा दूर निकल जाते। ताजा मेंडेट जनता के स्तर पर तो ध्रुवीकरण की कोशिशों पर लगाम कसेगा ही, भाजपा के अंदर भी वैचारिक विभाजन को मजबूती नहीं पकड़ने देगा। अत: भारतीय जनता पार्टी को तो चुनाव परिणामों का देश और पार्टी हित में स्वागत ही करना चाहिए। वैसे अब उत्तर प्रदेश में ज्यादा शांति की उम्मीदें की जा सकती हैं।