दुर्गा की शक्ति ने उतारी नकाबें

दुर्गा शक्ति नागपाल का अगर निलंबन नहीं होता तो उस उत्तर प्रदेश की राजनीति का वह गंदा चेहरा प्रकट नहीं हुआ होता जो देश की राजधानी दिल्ली में प्रधानमंत्रियों की कुर्सी का कार्यकाल निर्धारित करता है। दुर्गा शक्ति के एक “प्रशासनिक” बलिदान से उत्तर प्रदेश की अस्सी लोकसभा सीटों के लिए मचने वाले घमासान के तमाम समीकरण पलक झपकते ही बदल गए। भविष्य के चुनावी गठबंधनों का एक ऐसा नया अध्याय अचानक प्रकट हो गया जिसके कि लिए समाजवादी पार्टी एकदम तैयार नहीं थी और कांग्रेस पूरी तरह से तैयार थी। उत्तर प्रदेश में नरेंद्र मोदी के हिन्दू राष्ट्रवादी कार्ड की काट के लिए सोनिया गांधी और मायावती को दुर्गा की शक्ति की अखिल भारतीय सेवाओं के मुकाबले ज्यादा जरूरत थी। अखिलेश यादव के साथ अगर कुछ बुद्धिमान आईएएस अफसरों की टीम जुटी होती तो एक प्रशासनिक जख्म से राजनीतिक मवाद इस तरह से नहीं फूटता। अब उत्तर प्रदेश में समूची लड़ाई “यादवी स्वाभिमान” वर्सेस “शेष भारत” में तब्दील हो गई है या कर दी गई है। और ऐसा कब और कैसे हो गया, प्रधानमंत्री पद के आकांक्षी और राजनीति के चतुर खिलाड़ी मुलायम सिंह यादव भी समझ नहीं पाए। दुर्गा शक्ति नागपाल के लिए आरोप पत्र जारी कर दिया गया है। और अब इस आरोप पत्र को ही समाजवादी पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र भी माना जाना चाहिए। वह इस मायने में कि राजनीतिक रूप से मुलायम सिंह यादव के साथ अब कोई दूसरा राष्ट्रीय दल अपना भाग्य नहीं नत्थी करेगा। समाजवादी पार्टी को भी अब न तो किसी राष्ट्रीय राजनीतिक दल की जरूरत बची है और न ही अखिल भारतीय सेवाओं के अफसरों की। अखिलेश यादव ने देश को दिखला दिया है कि वे देश के सबसे बड़े राज्य के एक “युवा” मुख्यमंत्री के रूप में क्या “चमत्कार” कर सकते हैं। एक “युवा नेता” के रूप में अब डिलीवरी दिखाने को लेकर राहुल गांधी के सामने चुनौतियां बढ़ गई हैं। जो कुछ घट रहा है वह इस मामले में हाल-फिलहाल के लिए सांत्वना देने वाला नजर आता है कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच चल रहा चोरी-छुपे का हनीमून भी अब समाप्त हो गया है और केंद्रीय जांच ब्यूरो को आगे या पीछे फिर से सक्रिय माना जा सकता है। इसे महज संयोग नहीं माना जाना चाहिए कि एक अति जूनियर आईएएस अधिकारी के अधिकारों की रक्षा के लिए कांग्रेस समाजवादी पार्टी के साथ अपनी मित्रता को दांव पर लगा दे। कांग्रेस का ऐसा कोई ज्ञात इतिहास भी नहीं रहा है। हरियाणा और राजस्थान में अधिकारियों के साथ हुई घटनाएं इसके ताजा उदाहरण हैं। पर तात्कालिक परिस्थितियों में उत्तर प्रदेश की राजनीतिक जरूरतें अलग हैं। यह भी महज संयोग नहीं है कि दुर्गा शक्ति के मामले में मायावती और कांग्रेस एक ही जुबान में बातें कर रही हैं। यह सब आगे आने वाले उस राजनीतिक तूफान के संकेत हैं जिसके निशाने पर सपा और भाजपा दोनों को लिए जाने की रणनीति आकार ले सकती है। सही पूछा जाए तो दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन से उपजी ऊर्जा का इस्तेमाल उत्तर प्रदेश में सक्रिय सभी राजनीतिक दल अपनी यथा शक्ति करना चाहते हैं। इन सबका युवा अफसर के भविष्य के साथ कोई लेना-देना नहीं है। मीडिया को भी अण्णा और अरविंद के बाद किसी दुर्गा शक्ति की जरूरत थी। अखिलेश यादव अगर बुद्धिमानी का इस्तेमाल करके दुर्गा शक्ति नागपाल के पक्ष में अब भी कोई फैसला लेने की कोशिश करना चाहेंगे तो उन्हें ऐसा नहीं करने दिया जाएगा। तालियां बजाना चाहिए कि दुर्गा शक्ति नागपाल ने राजनीतिक दलों के चेहरों से नकाबें उतारकर चुनावों का एजेंडा बदल दिया है, बशर्ते मौजूदा लड़ाई को आठ महीने और जारी रखा जा सके।