दिल्ली को पूरा देश न समझे ‘आप’

अरविंद केजरीवाल के बेंगलुरू से स्व स्था होकर वापस दिल्लीक लौटने के साथ ही आम आदमी पार्टी की महत्वाजकांक्षाओं ने अखिल भारतीय स्व्रूप को प्राप्त् करने की अंगड़ाइयां लेना शुरू कर दिया है। इसमें अनुचित भी कुछ नहीं है। एक प्रभावशाली पार्टी के रूप में कांग्रेस पार्टी के समाप्त़प्राय हालातों में पहुंच जाने के बाद एक मजबूत विपक्ष के नाम पर देश में लगभग सन्नारटा-सा व्यााप्तय है। कोई दल ऐसी स्थिति में नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी को उस तरह से चुनौती दे सके, जैसी कि आम आदमी पार्टी ने दिल्लीं विधानसभा के लिए हुए चुनावों में दी थी। पर सवाल यह है कि क्यात आम आदमी पार्टी अपने आपको दिल्लील की घोर स्था नीयता के उन संस्काीरों से मुक्तय कर पाएगी, जो वास्तपव में उसकी ताकत और कमजोरी दोनों के रूपों में व्यकक्ती हो चुके हैं। एक समय था, जब केजरीवाल आम आदमी पार्टी को दिल्लीर तक ही सीमित रखना चाहते थे। पर दिल्लीस विधानसभा के चुनावों में प्राप्तर हुई ‘अहंकारी’ विजय ने आम आदमी पार्टी के स्थाापित चरित्र को ही बदलकर रख दिया। अब पार्टी अन्य् राज्योंज से भी चुनाव लड़ने का इरादा रखती है। प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव के साथ जिस तरह का व्यटवहार किया गया और उसके कारण अखिल भारतीय स्ततर पर पार्टी की छवि को क्षति पहुंची, उससे अरविंद केजरीवाल शायद चिंतित नजर आते हैं। हकीकत तो यह है कि आम आदमी पार्टी उन अवसरों को पहले ही गंवा चुकी है, जब वह भ्रष्टाहचार के खिलाफ लड़ी गई अपनी लड़ाई के दम पर देशभर में उपजी सहानुभूति को एक बड़े और व्यारपक संगठन के रूप में बदल सकती थी। अपनी-अपनी हथेलियों में मोमबत्तियां थामे हुए देश का युवा वर्ग बड़ी उम्मीखदों के साथ ‘इंडिया अगेंस्टन करप्शेन’ से उपजी रोशनी की तरफ देख रहा था। पर वैसा नहीं हुआ। भ्रष्टाकचार के खिलाफ लड़ाई की कोख से पैदा हुआ एक साफ-सुथरा आंदोलन अपने ही द्वारा पैदा किए गए विरोधाभासों का शिकार हो गया। अब मांग की जा रही है कि पार्टी में आंतरिक प्रजातंत्र और फैसलों में पारदर्शिता कायम करने की जरूरत है। आम आदमी पार्टी राष्ट्री य स्ततर पर एक सशक्तस विकल्पं के रूप में उभर सकती है, पर उसके लिए जरूरी होगा कि अरविंद केजरीवाल पहले उसे अपनी ‘हिरासत’ से आजाद करें। उसे उस तरह की एकाधिकार वाली पार्टी में नहीं तब्दीहल होने दें, जैसी कि स्थिति आज अन्य दलों में व्यांप्तत है। अरविंद केजरीवाल अगर दिल्ली् से बाहर नहीं निकलने के अपने फैसले को बदलने के लिए तैयार हुए हैं तो उसका एक बड़ा कारण यह भी हो सकता है कि प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को पीएसी से बाहर करने और ऑडियो टेप्सण के उजागर होने के बाद पार्टी में जिस तरह के असंतोष का विस्फो ट हुआ है, वह दिल्लीउ में सरकार चलाने में भी मुश्किलें पैदा कर सकता है। अरविंद केजरीवाल किन्हीं और संदर्भों में की गई अपनी इस घोषणा को शायद अपनी ही पार्टी में अंजाम देने लगे हैं कि : ‘हां, मैं अराजकतावादी हूं।’ राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को जानकारी दी थी कि : ‘कांग्रेस ही कांग्रेस को हराती है।’ आम आदमी पार्टी को अगर अरविंद केजरीवाल वास्तेव में राष्ट्रीसय स्तकर पर ले जाना चाहते हैं तो उन्हेंप उसे कांग्रेस की तरह बनने से बचाना होगा। जो लोग कांग्रेस के कमजोर होने का इतिहास जानते हैं, उन्हेंं पता है कि वहां भी शीर्ष नेतृत्व् चाटुकारों से घिरा रहा है और वहां भी ‘भूषण’ तथा ‘यादव’ जैसे लोगों को ‘नेताओं’ से मिलने का समय भी नहीं मिल पाया। प्रशांत भूषण ने केजरीवाल से एसएमएस के जरिये मिलने का समय मांगा था, पर ‘आम आदमी पार्टी’ के नेता ने स्वरयं मिलने के बजाय अपने नजदीकी सलाहकारों को उनसे मिलने के लिए रवाना कर दिया। यह सही है कि दिल्लीम भी देश है, पर अरविंद अगर देश को भी दिल्लीा ही समझ लेंगे तो फिर आम आदमी पार्टी सभी जगह अपना नुकसान कर लेगी।

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