दिल्ली की सीख अन्य राज्यों में भी पहुंचेगी

[dc]चुनाव[/dc] दिल्ली में हुए हैं और जश्न पटना, लखनऊ और कोलकाता में मनाये जा रहे हैं. मुख्यमंत्री पद पर अरविंद केजरीवाल काबिज होनेवाले हैं, पर पटना में राज्यपाल के आमंत्रण की प्रतीक्षा नीतीश कुमार कर रहे हैं. दिल्ली चुनाव के परिणामों से उत्पन्न हो रहे इस घटनाक्रम पर कोई आश्चर्य भी व्यक्त नहीं किया जाना चाहिए.
[dc] दिल्ली[/dc] के चुनाव पर देश-दुनिया के तमाम हिंदुस्तानियों, राजनेताओं और तमाम विपक्षी दलों की नजरें लगी थीं. भाजपा ने तो अपना सबकुछ ही दावं पर लगा दिया था. दिल्ली के परिणाम अगर उलटे पड़ जाते और भाजपा की सरकार बन जाती, तो पटना में मांझी की तकदीर भी बदल सकती थी. भाजपा अब मांझी के साथ अपने भाग्य को नहीं जोड़ सकती. राज्यपाल को भी अब फैसले बदली हुई परिस्थितियों के अनुसार लेना पड़ सकता है.
[dc] कुछ[/dc] संयोग हुआ है कि दिल्ली और बिहार में भाजपा का भाग्य परिवर्तन उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं हुआ. नीतीश कुमार और लालू यादव ही नहीं, सभी विपक्षी दलों में जैसे कि नयी जान आ गयी है. भाजपा इसी बात से खुश है कि दिल्ली अब कांग्रेस मुक्त हो गयी है. कांग्रेस इस बात से प्रसन्न है कि भाजपा की दिल्ली में सरकार नहीं बनेगी. निश्चित ही दिल्ली के चुनाव देश की राजनीति बदलने की शुरुआत करनेवाले साबित हो सकते हैं. कहा जा रहा है कि भाजपा और कांग्रेस, दोनों ही पार्टियां अपने अनियंत्रित अहंकार की शिकार हो गयीं. अपनी जीत के बाद अरविंद केजरीवाल ने कार्यकर्ताओं को अहंकार से बचने की ही सलाह दी. निश्चित ही केजरीवाल की सलाह का असर बिहार की राजनीति पर भी पड़ेगा. कार्यप्रणाली को लेकर नीतीश कुमार पर भी टिप्पणियां होती रही हैं.
[dc]दिल्ली[/dc] के चुनाव परिणाम भाजपा में कमजोर होते जा रहे आंतरिक लोकतंत्र की वापसी और ज्यादा लोकतांत्रीकरण की जरूरत के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से दबाव डालेगी. भाजपा में उस तरह के तत्व कमजोर होंगे, जिनकी अनावश्यक नारेबाजी के खिलाफ प्रधानमंत्री अपनी ताकत का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे थे और सार्वजनिक रूप से मौन बांधे रहते थे. दिल्ली विधानसभा में आम आदमी पार्टी के मुकाबले विपक्ष की वैसी ही स्थिति बन गयी है, जैसी कि लोकसभा के भीतर एनडीए के मुकाबले अन्य दलों की हैं. एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए दोनों ही स्थितियां अच्छी नहीं मानी जा सकती. दिल्ली में भाजपा की हार का एक बड़ा कारण यही बना कि पार्टी को लोकसभा में प्रचंड बहुमत के साथ दिल्ली की सभी सातों सीटों पर विजय मिलने के बाद, विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान वह एक अतिरंजित आत्मविश्वास से ग्रसित हो गयी. इसकी परिणति किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद के लिए उम्मीदवार घोषित करने में हुई. किरण बेदी का चुनाव में हार जाना भाजपा के लिए किसी बड़े सदमे से कम नहीं कहा जा सकता.
[dc] दिल्ली[/dc] के चुनावों में भाजपा ने आप के खिलाफ उसी तरह की नकारात्मक प्रचार शैली का प्रयोग किया, जो उसने लोकसभा और विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के खिलाफ किया था. वर्ष 1989 में राजीव गांधी के नेतृत्ववाली कांग्रेस ने विश्वनाथ प्रताप सिंह के खिलाफ भी वैसी ही चुनाव प्रचार की शैली अपनायी थी, जैसी कि भाजपा ने अरविंद केजरीवाल के मुकाबले के लिए अपनायी. श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रचंड बहुमत से सत्ता में आये राजीव गांधी को 1989 में इस कारण से सत्ता छोड़नी पड़ी.
[dc] दिल्ली[/dc] के चुनाव को लेकर विपक्षी दल अगर इतने ज्यादा उत्साहित हैं, तो उसके पीछे के कारणों को समझा जा सकता है. दिल्ली चुनाव को मोदी सरकार के अबतक के कामकाज के प्रति जनमत संग्रह नहीं माना जाये, तब भी इतना तो तय है कि प्रधानमंत्री और भाजपा को अपने कामकाज के तरीके में परिवर्तन करना पड़ेगा और शायद उसकी शुरुआत हो चुकी है. दिल्ली के अनुभवों की सीख पटना, लखनऊ और कोलकाता तक भी आगे-पीछे अवश्य ही पहुंचेगी.

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