दावेदारी दिल्ली की, दांव पर एनडीए

गुजरात के चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि उसके परिणाम न सिर्फ एनडीए बल्कि भाजपा को भी तोड़ने की क्षमता रखते हैं। जैसे-जैसे गुजरात में मतदान की तारीखें नजदीक आती जाएंगी, भाजपा ढीली पड़ती जाएगी और नरेंद्र मोदी के तेवर और तीखे होते जाएंगे।

रेंद्र मोदी भारतीय जनता पार्टी में प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी को मजबूत करने की कोशिशों में गुजरात चुनावों का हथियार के रूप में इस्तेमाल करने में जुटे हुए हैं और इधर एनडीए में गुजरात के मुख्यमंत्री के दिल्ली कूच को रोकने की तैयारियां भी शक्ल लेने लगी हैं। तीन दिन पूर्व जब बिहार प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष ने यह घोषणा की कि भाजपा प्रदेश की सभी चालीस सीटों पर अकेले ही लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है तो बहुत ज्यादा आश्चर्य व्यक्त नहीं किया गया। संकेत स्पष्ट था कि एनडीए के सबसे बड़े दल के पास प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए नरेंद्र मोदी के अलावा कोई दूसरा उम्मीदवार नहीं है। और यह भी कि चूंकि बिहार के महत्वाकांक्षी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सार्वजनिक रूप से नरेंद्र मोदी के प्रति अपना विरोध जाहिर कर चुके हैं, भाजपा-जद (यू) गठबंधन का बिहार में टूटना उसका एक अनिवार्य परिणाम बनने वाला है। भाजपा अगर बिहार में अकेले ही चुनाव लड़ने के अपने इरादे को अंजाम दे देती है तो फिर चुनाव प्रचार हेतु नरेंद्र मोदी को आमंत्रित करने के लिए उसे नीतीश कुमार की स्वीकृति की भी जरूरत नहीं बचेगी।

स बात में कोई शक नहीं कि भाजपा की ओर से नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवारी एनडीए को सिर्फ बिहार में ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर भी पूरी तरह से विभाजित कर देगी। न सिर्फ भाजपा-जद (यू) गठबंधन ही टूट जाएगा, एनडीए के अन्य घटक भी उससे अलग हो सकते हैं।बिहार में संघर्ष चतुष्कोणीय हो जाएगा। भाजपा, जद (यू) के अलावा कांग्रेस और लालू की पार्टी भी मैदान में होगी। नीतीश कुमार की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को तब जबरदस्त धक्का पहुंच सकता है।

दूसरी ओर, लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी के बीच बढ़ी हुई दूरियों को लेकर हाल-फिलहाल केवल कयास ही लगाए जा सकते हैं। भारतीय जनता पार्टी में भी एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को लेकर बेचैनी महसूस करता है और गुजरात के मुख्यमंत्री के प्रति दिग्विजय सिंह के विचारों से सार्वजनिक रूप से सहमति व्यक्त करने में खौफ खाता है। सच्चाई यह भी है कि गुजरात में विधानसभा का चुनाव भारतीय जनता पार्टी नहीं, बल्कि नरेंद्र मोदी लड़ रहे हैं। यह उनकी अपने ही अहंकार से उपजी विनम्रता है कि नरेंद्र मोदी स्वयं को पार्टी का एक साधारण कार्यकर्ता ही निरूपित करते हैं।

श्चर्य व्यक्त किया जा सकता है कि नरेंद्र मोदी की बढ़ती हुई ताकत को लेकर सभी राजनीतिक दलों में अलग-अलग तरह से चिंताएं व्याप्त हैं। कांग्रेस और उसके सहयोगी दल भी इसमें शामिल हैं। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे “सामना” में प्रकाशित इंटरव्यू में प्रधानमंत्री पद के लिए सुषमा स्वराज के नाम पर पहले से मोहर लगा चुके हैं। उक्त परिस्थितियों के चलते नरेंद्र मोदी इस बात को बहुत अच्छे से जानते हैं कि गुजरात में चुनाव परिणामों पर इस बार दांव पर उनका मुख्यमंत्रित्व नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री पद की दावेदारी लगी हुई है। अतः उनके लिए जरूरी है कि वे २००७ की ११७ सीटों के मुकाबले अपनी जीत का आंकड़ा बढ़ाकर दिखाएं। नरेंद्र मोदी की एक भी सीट का कम या ज्यादा होना राष्ट्रीय राजनीति में सौ गुना परिवर्तन की लहरें पैदा कर देगा।

रेंद्र मोदी के लिए गुजरात ठीक वैसा ही है, जैसा कि किसी समय ज्योति बसु के लिए पश्चिम बंगाल था। बसु के होते हुए किसी और के मुख्यमंत्री बनने की कल्पना नहीं की जा सकती थी। वैसी ही स्थिति आज गुजरात में भी है। बसु की इच्छा भी प्रधानमंत्री पद पर बैठने की थी और उनकी ही पार्टी ने तब ऐसा नहीं होने दिया। मोदी भी प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं और बहुत मुमकिन है अंतिम वक्त पर पार्टी ही उनके आड़े आ जाए। और जो सत्य है वह यह भी कि माकपा यह समझती थी कि पश्चिम बंगाल में उसका राज है, पर हकीकत यह थी कि रायटर्स बिल्डिंग, कोलकाता में ज्योति बसु की हुकूमत थी। गुजरात में भी हूबहू यही स्थिति है। भाजपा मानती है कि गुजरात में उसकी सरकार है, जबकि हकीकत में सरकार मोदी की है।ज्योति बसु के जाते ही माकपा पश्चिम बंगाल में टिक नहीं पाई थी। ज्योति बाबू के बाद गद्दी संभालने के लिए बुद्धदेव भट्टाचार्य थे, पर गुजरात में एक से दस तक केवल नरेंद्र मोदी ही हैं। वे ही मुख्यमंत्री हैं, असली पार्टी अध्यक्ष हैं और भाजपा हैं। भाजपा का आलाकमान जानता है कि येदियुरप्पा की धमकियों और नरेंद्र मोदी के तेवरों को एक ही तराजू में नहीं तौेला जा सकता है।

गुजरात के चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि उसके परिणाम न सिर्फ एनडीए बल्कि भाजपा को भी तोड़ने की क्षमता रखते हैं। इस दृष्टि से एनडीए के कुछ महत्वपूर्ण नेताओं की यह फुसफुसाहट काफी मायने रखती है कि अगले लोकसभा चुनावों में लालकृष्ण आडवाणी ही एनडीए को सबसे कुशल नेतृत्व प्रदान कर सकते हैं। गौर करने लायक होगा कि जैसे-जैसे गुजरात में मतदान की तारीखें नजदीक आती जाएंगी, भाजपा ढीली पड़ती जाएगी और नरेंद्र मोदी के तेवर और तीखे होते जाएंगे। संभावनाएं व्यक्त की जा सकती हैं कि गुजरात चुनावों के बाद एक नई भारतीय जनता पार्टी आकार ले सकती है।

ह निर्विवाद है कि कांग्रेस के पास गुजरात में कोई नेता नहीं है। सोनिया गांधी की राजकोट यात्रा भी मात्र एक औपचारिकता बनकर रह गई है। कांग्रेस गुजरात में चुनाव जीतने के लिए नहीं, बल्कि नरेंद्र मोदी को कमजोर साबित करने के लिए संघर्ष कर रही है।

स बात में कोई शक नहीं बचा है कि आर्थिक सुधारों की ओर तेज रफ्तार के बीच देश एक गहरे राजनीतिक संकट में प्रवेश कर रहा है। इस संकट का अंतिम लाभ किस गठबंधन को मिलेगा, यह इस बात से तय होगा कि विपक्ष के नाम पर चुनावों के पहले तक क्या कुछ बच पाता है। इस लिहाज से नरेंद्र मोदी की भूमिका निश्चित ही महत्वपूर्ण बनने वाली है। गुजरात चुनावों को लेकर अगर इतना हल्ला मच रहा है, तो उसमें अतिरंजित कुछ भी नहीं है।