‘दरबार’ हॉलों में परिवर्तन की बयार

राहुल गाँधी ने घोषणा कर दी है कि माँ सोनिया गाँधी और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहनसिंह की सलाह से पार्टी या सरकार में वे अब कोई बड़ी भूमिका अदा करने जा रहे हैं। राहुल गाँधी के साथ जुड़ी जय-जयकारियों की जमात के लिए यही वह ऐतिहासिक क्षण है जिसकी कि वह साँस रोककर प्रतीक्षा कर रही थी। सही पूछा जाए तो कांग्रेस से जुड़ी राजनीति में भी यही वह अंतिम रहस्य है जो अब खुलने जा रहा है। राहुल द्वारा अपनी भविष्य की भूमिका को लेकर दिए गए संकेत का मतलब यही है कि पार्टी और सरकार के निर्णयों को लेकर जो कुछ भी वे अभी तक परदे के पीछे से कहते या करते रहे हैं वह सब कुछ अब सार्वजनिक बनने वाला है। इसका यह मतलब भी निकाला जा सकता है कि श्रीमती सोनिया गाँधी आने वाले दिनों में परदे के पीछे वाली उस भूमिका को प्राप्त कर लेंगी जिसे कि राहुल गाँधी ने हाल-फिलहाल ओढ़ रखा है। राहुल गाँधी की घोषणा का संबंध वास्तव में स्वयं की सक्रियता को बढ़ाने से कम और इस बात से ज्यादा है कि पार्टी और सरकार को सोनिया गाँधी की उपलब्धता अब लगातार कम होने जा रही है। अगर ऐसा होता है तो उसका असर कांग्रेस के दरबार हॉल में बरसों से जमी हुई कुर्सी-टेबलों पर भी पड़ेगा। दिग्विजयसिंह और सलमान खुर्शीद जैसे नेताओं के चेहरों पर इस बात की चमक पढ़ी भी जा सकती है कि पार्टी और सरकार में अब परिवर्तनों का वह तूफान पैदा होने जा रहा है जिसकी कि वे काफी अरसे से वकालात कर रहे थे, खासकर श्रीमती गाँधी की इलाज के लिए अमेरिका यात्रा के बाद से। आलोचकों का यह तर्क भी अपनी जगह कायम रहने वाला है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों में ही वैसे भी सारे फैसलें ‘परिवार” ही लेता आया है।

राहुल की घोषणा में चाहे ज्योतिषियों का कोई रोल नहीं रहा हो फिर भी उनके राजनीतिक पदारोहण के लिए इससे बेहतर समय कोई नहीं हो सकता था। केंद्रीय मंत्रिमंडल में प्रधानमंत्री पद के एक सक्षम दावेदार को राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल की शोभा बढ़ाने के लिए रवाना किया ही जा चुका है। विपक्ष इस समय अपनी दुरावस्था के चरम पर है। राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के चुनावों के लिए सर्वसम्मत और प्रभावी उम्मीदवारों के चयन को लेकर विपक्ष की फटे-हाल गरीबी उजागर हो चुकी है। प्रणब मुखर्जी की उम्मीदवारी को समर्थन के मुद्दे पर पहले माया-मुलायम और फिर ममता ने जिस तरह से यूपीए के समक्ष अपनी कमर झुकाई यह साबित करने के लिए काफी है कि इन सभी को राहुल गाँधी का नेतृत्व भी मंजूर है और युवा नेता के हाथों में लोकसभा चुनावों की कमान भी सौंपी जा सकती है। शरद पवार मंत्रिमंडल में नंबर-दो की गिनती में भी नहीं रखे गए हैं। राहुल गाँधी के अश्वमेध यज्ञ की भूमिका बनाते हुए कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने एक साक्षात्कार में चिंता व्यक्त की थी कि कांग्रेस पार्टी ‘दिशाहीन” हो गई है क्योंकि उसे युवा महासचिव की ओर से कोई वैचारिक मार्गदर्शन नहीं मिल रहा है। खुर्शीद के साक्षात्कार को तब अपनी ही पार्टी नेतृत्व की आलोचना समझने की भूल की गई थी। राजनीति के समझदारों का तब भी यही मानना था कि पार्टी की ‘दिशाहीनता” को समाप्त करने की ‘चिंता” वास्तव में ‘चापलूसी” का ही एक उपक्रम है। वैसे अभी यह तय नहीं है कि राहुल अपना करिश्मा पार्टी में दिखाने वाले हैं या कि सरकार में पर इससे देश के आम आदमी को कोई फर्क नहीं पड़ता। अत:कांग्रेस पार्टी की ‘राहुल उपलब्धि” को देश की भी उपलब्धि करार देने में किसी भी तरह की जल्दबाजी नहीं की जानी चाहिए।