थरूर, देश की “राष्ट्रीय चिंता” नहीं हैं

१७ अप्रैल २०१०

देश में अगर सर्वेक्षण करवाया जाए कि शशि थरूर को मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल से हटा देने से यूपीए सरकार को क्या नुकसान पहुंचेगा तो बहुत मुमकिन है एक बड़ी संख्या में लोग जवाब देने से ही इंकार कर दें। देश की जनता के लिए थरूर अपनी हैसियत को एक “आकर्षक विवादास्पद व्यक्तित्व” से ऊपर नहीं उठा पाए हैं। सौ करोड़ से अधिक की आबादी और असंख्य समस्याओं से घिरे हुए राष्ट्र के विदेश राज्यमंत्री के रूप में थरूर ने विवादों में पडऩे के अलावा कोई योगदान नहीं दिया है। थरूर काफी पढ़ेे- लिखे और समझदार व्यक्ति हैं और विदेशों में दी गई अपनी सेवाओं के कारण विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा के मुकाबले शायद ज्यादा रसूख भी रखते होंगे पर उनकी गिनती मंत्रिमंडलों में आमतौर पर शामिल रहने वाले ऐसे दो –तिहाई लोगों में करने का खतरा मोल लिया जा सकता है जिनके असली योगदान के बारे में देश को कभी कोई जानकारी नहीं हो पाती। सरकारों का कार्यकाल समाप्त हो जाने के बाद तक भी। अत: ताजा आईपीएल विवाद के चलते अगर प्रधानमंत्री हिम्मत दिखाते हुए थरूर से इस्तीफा मांग लेते हैं तो उससे सरकार की ही इज्जत बढ़ेगी। इसे देश का दुर्भाग्य माना जाना चाहिए कि कुछ अति महत्वपूर्ण लोग निहायत ही गैर- जरूरी विवादों में जनता को उलझा देने में लगातार कामयाब होते जाते हैं। तब आई.पी.एल जैसा एक व्यावसायिक शगल भी राष्ट्रीय चिंता में तब्दील हो जाता है। संसद में बैठकर जनता की उम्मीदों को धता बताने वाले उन जन- प्रतिनिधियों की इस प्रतिभा की भी दाद दी जा सकती है कि जितनी गंभीरता से वे दंतेवाड़ा की घटना पर बहस में भाग ले लेते हैं उतनी ही आक्रामकता के साथ थरूर विवाद पर भी संसद का कीमती वक्त खर्च करने को तैयार हो जाते हैं और सरकार भी इसमें सहयोग प्रदान करती नजर आती है। चंूकि लोगों की याददाश्त काफी कमजोर हो गई है, सरकारें इसका फायदा उठाकर विवादों और विवादास्पद व्यक्तित्वों को विक्रम और बेताल की कहानियों की तरह कार्यकाल को पूरा करने तक अपनी पीठ पर ढोती रहती हैं। इसका एक लाभ उन्हें यह भी मिल जाता है कि तात्कालिक समस्याओं की तरफ से जनता का ध्यान हटा दिया जाता है। मसलन सारी चिंताएं अगर इसी सवाल पर पहुंचकर खत्म होने लगें कि थरूर मंत्रिमंडल में बने रहेंगे या नहीं तो फिर प्रधानमंत्री से यह कौन पूछेगा कि बराक ओबामा से वे क्या हांसिल करके लौटे हैं और डॉ. मनमोहन सिंह भी किसे इस तरह के सवालों के जवाब देना चाहेंगे? दंतेवाड़ा की घटना के बाद पी. चिदम्बरम द्वारा मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देने की पेशकश और आई.पी.एल. जैसे विवादों में लगातार घिरे रहने के बाद भी थरूर द्वारा सरकार में बने रहने की कोशिशों के बीच कोई फर्क तो निश्चित ही स्थापित होना चाहिए। अगर थरूर स्वयं आगे बढक़र इस काम में सरकार की मदद नहीं करते हैं तो साहस डॉ. मनमोहन सिंह को दिखाना चाहिए। १८ नवंबर २०१० राजाधर्म या फिर राजधर्म? श्रवण गर्ग हमारे राजनीतिक नेतृत्व ने देश को भ्रष्टाचार के कितने गहरे बोरवेल में डाल दिया है, टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले को लेकर मच रही सरकार की थू-थू इसका उदाहरण है। मुंबई की आदर्श सोसायटी और कॉमनवेल्थ गेम्स घोटालों से उपजी शर्म ही शायद हमारे सिर नीचे करने के लिए पर्याप्त नहीं थी। सत्ता के शीर्ष पर सवार लोगों का दबंगता के साथ इतना बड़ा भ्रष्टाचार कर लेना और फिर उनके खिलाफ बिना न्यायिक एवं जन-दबाव के कार्रवाई का न हो पाना दर्शाता है कि व्यवस्था में कितनी सड़ांध आ गई है। जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि संसद में प्रश्न पूछने के लिए रिश्वत खा लेते हैं, सांसद निधि में घोटाला कर लेते हैं, कबूतरबाजी करके धन कमा लेते हैं और अपने लिए बेहतर सुविधाओं की मांग करने में कोई संकोच नहीं करते। ऐसे में आश्चर्य नहीं अगर देश को 1.76 लाख करोड़ रुपए का चूना लगाकार टू-जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस केवल दस हजार आठ सौ करोड़ रुपए में बांट दिए गए, वे भी उन आवेदकों को जिनमें बहुमत अयोग्य कंपनियों का था। सारा भ्रष्टाचार अत्यंत बहादुरी के साथ डंके की चोट पर निपटाया गया क्योंकि दांव पर देश की जनता का धन और सम्मान नहीं बल्कि सरकार का बहुमत टिका हुआ था। सवाल उठना चाहिए कि अगर प्रधानमंत्री को पता था कि टू-जी स्पेक्ट्रम मामले में इतना बड़ा घोटाला हुआ है तो ए. राजा के खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई उन्होंने क्यों नहीं की? अगर उन्हें पता नहीं था तो फिर सरकार को सत्ता में बने रहने का क्या अधिकार है? प्रधानमंत्री जनता के सवालों को लेकर अपनी मौन-मुद्रा बनाए रख सकते हैं पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा की जा रही पूछताछ के मामले में ऐसा नहीं कर पाएंगे। देश की जनता मांग करना चाहेगी कि टू-जी स्पेक्ट्रम के तहत आवंटित किए गए सभी लाइसेंस रद्द किए जाएं और उनकी उसी तरह से नीलामी हो जैसी कि थ्री-जी के मामले में हुई है। ऐसी ही किसी पारदर्शी प्रक्रिया के जरिए पता चल पाएगा कि सरकार को वास्तव में कितनी धनराशि प्राप्त होनी थी और कितने राजस्व की क्षति हुई है। पर ऐसा कर पाना सरकार के लिए आसान काम नहीं होगा। सरकार के निर्णय को अदालत में चुनौती दी जा सकती है, क्योंंकि ऐसा होने से उन बिचौलियों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है जिन्होंने लाइसेंस प्राप्त करने के लिए भारी धनराशि का लेन-देन किया है। साथ ही जांच एजेंसियों की साख को और धक्का पहुंच सकता है। और इस सबसे भी अधिक यह कि ऐसा करके सरकार स्वयं ही अपने एक महत्वपूर्ण मंत्रालय की संपूर्ण व्यवस्था को भ्रष्ट करार दे देगी। राजनीतिक नफे-नुकसान का गणित अपनी जगह कायम है। महत्वपूर्ण यह भी कि प्रधानमंत्री जिस नौ प्रतिशत की वार्षिक विकास दर को हासिल करने की बात कर रहे हैं उसमें अस्थायी तौर पर रुकावट आ सकती है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बाधित हो सकता है। पर प्रधानमंत्री अगर साहस दिखाएं तो टू-जी स्पेक्ट्रम सहित हाल में उजागर हुए तमाम घोटालों को हथियार बनाकर व्यवस्था से भ्रष्टाचार की सफाई का काम हाथ में ले सकते हैं। जनता और देशी-विदेशी निवेशकों को संदेश दे सकते हैं कि सरकारी व्यवस्था में बिना रिश्वत के भी काम हो सकते हैं, गलत चीजों को रोका जा सकता है। पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी ईमानदार छवि के जरिए प्रशंसा बटोरने वाले डॉ. मनमोहन सिंह ऐसा कर पाएंगे उसमें शक इसलिए है कि कड़े राजनीतिक फैसले लेने की इच्छा-शक्ति का उन्होंने अभी तक प्रदर्शन नहीं किया है। और फिर भ्रष्टाचार से निपटने का मामला तो उस पूरी व्यवस्था को एक खुली जेल में तब्दील करने का है, जिसके दम पर भारत को एक महाशक्ति बनने का प्रधानमंत्री साहस बनाए हुए हैं। चूंकि सरकार के असली राजा प्रधानमंत्री ही हैं, उन्हें निश्चित ही पता रहा होगा कि ए.राजा ने क्या कुछ किया है। इसके बावजूद अगर उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की तो उनकी कुछ मजबूरी रही होगी जो उजागर होनी चाहिए। जिस पैमाने का भ्रष्टाचार उजागर हुआ है वह आजाद भारत का शायद सबसे बड़ा कलंक है। देश उसे ऐसे ही स्वीकार नहीं कर लेगा?