जूते और थप्पड़ के बीच का फर्क?

रविंद केजरीवाल को इस तरह के सोच में पड़ने की जरूरत नहीं कि उन्हें थप्पड़ क्यों मारे जा रहे हैं, उन पर स्याही और अंडे क्यों फेंके जा रहे हैं। उन्हें पूछने का हक है कि जो कुछ भी उनके साथ हो रहा है, वैसा किसी और नेता के साथ क्यों नहीं हो रहा! मसलन क्या किसी की भी हिम्मत हो सकती है कि सोनिया गांधी, नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी या ममता, मुलायम और जयललिता की रैलियों या सभाओं में ‘जिंदाबाद’ के अलावा और कोई आवाज भी निकाल सके! ‘अनुभवी’ कांग्रेसी और भाजपाई नेताओं का कहना है कि केजरीवाल ने जनता को धोखा दिया है, इसलिए उनके साथ ऐसा हो रहा है। ये नेता यह भी कह रहे हैं कि मीडिया में बने रहने के लिए केजरीवाल स्वयं थप्पड़ लगवा रहे हैं। अमित शाह, वसुंधरा राजे, इमरान मसूद, बेनी प्रसाद और आजम खान जिस तरह की भाषा और धमकियों का इस समय इस्तेमाल कर रहे हैं, उसके चलते तो केजरीवाल को मान लेना चाहिए कि वे सस्ते में छूट रहे हैं। हरियाणा के साथ दिल्ली की सातों लोकसभा सीटों के लिए कल (गुरुवार को) वोट पड़ने हैं, इसलिए केजरीवाल के साथ जो कुछ भी हो रहा है, उसे आम आदमी पार्टी के मतदान-पूर्व की तैयारियों का ही हिस्सा समझ लिया जाना चाहिए। दिल्ली में मोदी, राहुल गांधी और केजरीवाल तीनों की नाक दांव पर लगी है। आम आदमी पार्टी का तो समूचा भविष्य दिल्ली के परिणामों पर टिका है। केजरीवाल पर होने वाले हमलों का अगर किसी षड्यंत्र से संबंध नहीं है तो आम आदमी पार्टी के नेता को मान लेना चाहिए कि अपनी नाराजगी व्यक्त करने के लिए जनता इस तरह के प्रयोग आगे भी करती रहेगी। मसलन 1984 के दंगों के दोषियों को सजा मिलने में हो रहे विलंब को लेकर जब पत्रकार जरनैल सिंह ने तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम पर जूता फेंका था, तब केजरीवाल ने कल्पना भी नहीं की होगी कि आने वाले वक्त में वे कोई राजनीतिक पार्टी भी बनाएंगे और जरनैल सिंह को अपनी आम आदमी पार्टी का टिकट देकर दिल्ली से लोकसभा का चुनाव लड़वाएंगे। पी. चिदंबरम इस बार लोकसभा चुनाव नहीं लड़ रहे हैं और जरनैल सिंह जीतने की तैयारी में हैं।

केजरीवाल राजघाट पहुंचकर उन पर बार-बार होने वाले हमलों के पीछे के ‘मास्टरमाइंड’ का पता लगाना चाहते हैं। पर इसका पता चलना उतना ही मुश्किल है, जितना इस बात का अंदाजा लग पाना कि केजरीवाल इस तरह के हमलों के बाद कितने विचलित होते हैं। हो यह गया है कि अण्णा हों या अरविंद केजरीवाल, जनता अब किसी भी नेता के बापू की समाधि पर बैठकर चिंतन करने से प्रभावित नहीं होती। आम आदमी पार्टी अगर लोकसभा चुनावों में कोई बड़ा उलटफेर करने में कामयाब हो जाती है तो आरोपों-प्रत्यारोपों की भाषा भी बदल जाएगी और हमलों के सरगना की तलाश भी ठंडी पड़ जाएगी।