जश्न के बहाने ढूंढ़ता सरकार का पहला साल

२१ मई २०१०

यूपीए की सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल का पहला साल पूरा कर लिया है। अगले मई में उसका दूसरा और फिर तीसरा और इस तरह पांच साल पूरे हो जाएंगे। यूपीए के पहले कार्यकाल (२००४-२००९) के दौरान डॉ. मनमोहन सिंह सरकार द्वारा अपना पहला साल पूरा करने के बाद जिस तरह का उत्साह और उत्तेजना देश की राजनीति में दिखती थी, निश्चित ही वह आज अनुपस्थित है। सरकार के पास भी व्यक्त करने के लिए ऐसा कुछ नहीं है कि वह केक काटकर अपनी वर्षगांठ का जश्न मनाए। कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं कि जनता के स्तर पर भी अपनी सरकार को लेकर सिवाय इस बात के और कोई दिलचस्पी नहीं बची है कि अब किस मंत्री द्वारा अपने किस मंत्रिमंडलीय सहयोगी के बारे में देश या विदेश में क्या टिप्पणी की गई है और कि प्रधानमंत्री कार्यालय या आलाकमान उस पर क्या कार्रवाई करने वाला है। समूची सरकार के कामकाज को लेकर रिपोर्ट कार्ड जैसी कोई बात अब नहीं बची। मंत्रियों की जनता के बीच व्यक्तिगत रेटिंग के जरिए सरकार के कामकाज की समीक्षा होने लगी है। टीवी सीरियलों की तरह। यूपीए के पिछले कार्यकाल में ऐसा कतई नहीं था। यूपीए के पिछले कार्यकाल में लालू यादव और रामविलास पासवान जैसे महत्वाकांक्षी और वाचाल मंत्रियों की मौजूदगी और वामपंथियों की बैसाखियों पर उसके टिके होने के बावजूद सरकार कभी भी इस तरह के अंतद्र्वंद्वों से घिरी और अपने घरेलू झगड़ों को लेकर हर वक्त सफाई देती कभी नजर नहीं आई जैसी कि स्थिति पिछले एक साल में उजागर हुई है। हकीकत यह भी है कि आपस में बंधे हुए पैरों के साथ ही उसे चार साल की बाधा दौड़ को जीतना अभी बाकी है। वैसे कहा तो यह भी जा सकता है कि यूपीए के दूसरे अवतार में कांग्रेस पार्टी में आंतरिक प्रजातंत्र उच्चतम शिखरों पर पहुंच गया है अथवा अब किसी का किसी पर कोई भय या अनुशासन नहीं रह गया है। चूंकि पार्टी में आंतरिक प्रजातंत्र को प्रोत्साहित करने की दिशा में कांग्रेस सहित देश के सभी राजनीतिक दलों का रिकार्ड कभी भी स्तुति करने लायक नहीं रहा है, पिछले एक साल के दौरान नीतिगत विषयों को लेकर पनपे व्यक्तिगत मतभेदों को जिस तरह से सार्वजनिक धोबीघाट बनाया गया, उससे इन शंकाओं को भी बल मिलता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय अपने आपको जान-बूझकर कमजोर होने दे रहा है। राजनीतिक क्षमताओंं के मंदी काल का दूसरे मुल्कों के लिए ईष्र्या पैदा करने वाले आर्थिक विकास की दर के आंकड़ों के साथ ‘बार्टर’ नहीं किया जा सकता। माओवादियों की हिंसा से निपटने के सवाल अथवा गृहमंत्रालय के कामकाज को लेकर कांग्रेस पार्टी के ही लोगों ने गृहमंत्री पर जिस तरह से हमले किए वह यह बताने के लिए काफी है कि शिवराज पाटील का कमजोर दिखाई पड़ते रहना सत्तारूढ़ दल की सेहत के लिए शायद ज्यादा फायदेमंद था। पर ऐसा मानने के लिए भी कोई कारण नहीं कि यूपीए सरकार राजनीतिक रूप से कमजोर हो गई है। सरकार के एक साल के कार्यकाल के उपलक्ष्य में कुछ टीवी चैनलों/ समाचार पत्रों द्वारा करवाए गए सर्वेक्षणों में जनता के गले उतारा जा रहा है कि अगर तत्काल चुनाव करवा लिए जाएं तो यूपीए को वर्ष 2009 के मुकाबले संसद में ज्यादा सीटें मिलेंगी। इस उपलब्धि को यूपीए सरकार द्वारा पिछले एक साल के दौरान किए गए अच्छे कार्यों के साथ भी जोडक़र देखा जा सकता है और इस तथ्य के साथ जोडक़र भी कि तथाकथित विपक्ष के रूप में देश में उपस्थित राजनीतिक दलों का जितना कमजोर और निराशाजनक प्रदर्शन पिछले तीन सौ पैसठ दिनों में देखना पड़ा वैसा पहले कभी नहीं देखा गया। नेतृत्व परिवर्तन की पूरी प्रक्रिया के दौरान देश का प्रमुख विपक्षी दल कितना बोगस साबित हुआ है, उसे गिनाने की भी जरूरत नहीं बची है। हम इस उपलब्धि से भी खुश हो सकते हैं कि अपनी तमाम कमजोरियों के बावजूद दुनिया में तो हमारी प्रगति की तारीफ ही हो रही है।