जमीनी सवाल, आसमानी जवाब

पनी ही आंखों से देखना और सुनना काफी आश्वस्त करने वाला अनुभव था कि कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी से उनकी आंखों में झांकते हुए सीधे सवाल भी किए जा सकते हैं। और यह भी कि राहुल गांधी किस तरह से असली सवालों को अपने खूबसूरत भोलेपन की आड़ लेकर चतुराई के साथ टाल जाते हैं। सवालों द्वारा बार-बार पीछा किए जाने के बावजूद वे उत्तेजित नहीं होते, आपा नहीं खोते और कोई कागज नहीं फाड़ते। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि अंग्रेजी न्यूज चैनल ‘टाइम्स नाऊ’ के साथ इंटरव्यू के दौरान राहुल के हाथों में कागज थे ही नहीं। सारे कागज अर्नब गोस्वामी के हाथों में ही थे। राहुल गांधी ने हर सवाल का शांत भाव से सामना किया पर ज्यादातर का सीधे-सीधे जवाब नहीं दिया। तमाम तीखे सवालों को उन्होंने अपने जवाबों में जलेबी बना दिया। आमतौर पर अपने चैनल पर आमंत्रित मेहमानों का आक्रामक तरीके से उनके घर के दरवाजों तक पीछा करने वाले अर्नब गोस्वामी राहुल को बार-बार मूल प्रश्न पर लाते पर कांग्रेस उपाध्यक्ष उन्हें चतुराई से टाल देते। राहुल गांधी और उनके सलाहकारों की टीम ने इंटरव्यू के अवसर को जान-बूझकर ही चुना होगा। चैनल के चयन में भी समझदारी बरती गई होगी, यह जताने के लिए कि राहुल गांधी हर तरह के सवालों का मुकाबला करने को तैयार हैं, जो कि उन्होंने अंतत: नहीं किया। जिन सवालों के जवाब दिए भी, उन्हें लेकर अब बखेड़ा खड़ा हो गया है। हमेशा की तरह कांग्रेस पार्टी को राहुल के बचाव में खड़ा होना पड़ गया है। ऐसा हर बार होता है कि कांग्रेस पार्टी में नेताओं का ज्यादातर समय स्वयं का या एक-दूसरे का बचाव करने में ही खर्च होता है। राहुल गांधी के पास एक अवसर था अपने आपको व्यक्त करने का, देश की जनता के साथ खुद को जोड़ने का, उन तमाम सवालों के साथ सीधे टक्कर लेने का, जो नरेंद्र मोदी के साथ प्रधानमंत्री पद के लिए मुकाबले में उनके लिए बाधक बन रहे हैं। पर उन्होंने बड़ी मुश्किल के साथ उपस्थित हुए अवसर को भी स्व-आरोपित विनम्रता के साथ गंवा दिया।

ह सही है कि अर्नब गोस्वामी के जिन आरोपों का राहुल गांधी को सामना करना पड़ रहा था, उनके लिए पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की सीधी-सीधी जवाबदेही नहीं बनती थी। मसलन 1984 के दंगों के लिए माफी मांगने से संबंधित सवाल। या फिर वर्ष 2002 के दंगों के संबंध में प्रधानमंत्री द्वारा अपनी प्रेस कांफ्रेंस में दिए गए वक्तव्य पर मांगी गई राहुल की प्रतिक्रिया। चौरासी के दंगों के समय राहुल की उम्र लगभग चौदह साल की थी। गुजरात दंगों के कोई दो साल बाद ही राहुल गांधी ने कांग्रेस में कोई जिम्मेदारी लेते हुए राजनीति में प्रवेश की बात कही थी। राहुल और प्रियंका ने जनवरी 2004 में पहली बार मीडिया से चर्चा की थी। और मार्च 2004 में कांग्रेस ने पहली बार घोषणा की थी कि राहुल अमेठी से पार्टी के लोकसभा उम्मीदवार होंगे। पर चूंकि राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी थे और मां सोनिया गांधी हैं, सारे सवाल अब उन्हीं से पूछे जाएंगे और अपेक्षा भी की जाएगी कि वे उनके जवाब दें। उनके द्वारा इतना भर कह देने से काम नहीं चलने वाला कि वे किस परिवार में जन्म लें, यह तय करना उनके हाथ में नहीं था। “मैंने अपना परिवार नहीं चुना। मैंने नहीं कहा कि मुझे इसी परिवार में पैदा होना है। अब दो ही विकल्प हैं – या तो मैं सबकुछ छोड़कर हट जाऊं या फिर कुछ बदलने की कोशिश करूं।” यह तय है कि गांधी परिवार ने कांग्रेस पार्टी की कमान जिस हद तक अपने हाथों में ले रखी है, उसमें राहुल के लिए कभी भी संभव नहीं होगा कि वे सबकुछ छोड़कर बाहर हो सकें। चूंकि सोनिया गांधी ने अपने आसपास कांच की साउंडप्रूफ दीवार खड़ी कर रखी है और किसी अर्नब गोस्वामी के लिए संभव नहीं कि वह 1984 और 2002 के बारे में उनसे कोई सवाल कर सके, इसलिए कठघरे में हमेशा राहुल गांधी को ही खड़ा होना पड़ेगा। चूंकि भारत देश के सम्माननीय प्रधानमंत्री अपने दस वर्षों के कार्यकाल में हुए तमाम भ्रष्टाचार और 2जी, कोयला ब्लॉक आवंटन, आदर्श आदि घोटालों के लिए अपने आपको दोषी नहीं मानते, सारे प्रश्न राहुल से इसलिए किए जाएंगे कि सत्ता के सारे सूत्र तो 10 जनपथ पर ही केंद्रित हैं और सोनिया गांधी के बाद पार्टी उपाध्यक्ष के रूप में वे ही सबसे शक्तिशाली हैं। गौर यह भी किया जाए कि राहुल का मुकाबला किस तरह के अनुभव और उम्र वाले विपक्ष के नेताओं के साथ हो रहा है या फिर करवाया जा रहा है।

दिक्कत यह है कि राहुल गांधी ने अपने इर्द-गिर्द एक अविश्वसनीय कल्पनालोक खड़ा कर लिया है। वे उसमें से बाहर निकलना भी चाहते हैं और उसके साथ चिपके भी रहना चाहते हैं। उन्होंने लोकसभा में उपस्थित होते हुए भी अनुपस्थित दिखाई देते रहने का हुनर विकसित कर लिया है। वे वर्तमान की राजनीति को कोसते हुए भविष्य की राजनीति करना चाहते हैं। “मेरा एक उद्देश्य है। मेरा उद्देश्य दिमाग में साफ है। वह यह कि मैं जो भारतीय राजनीति में देखता हूं, उसे पसंद नहीं करता।” राहुल गांधी पूरी व्यवस्था को बदलना चाहते हैं। “मुझे इसके अलावा (अर्जुन की तरह) और कुछ नहीं दिखाई देता।” पर राहुल यह नहीं बता पाते कि व्यवस्था को बदलेंगे कैसे।

कांग्रेस पार्टी ने 128 साल पूरे कर लिए हैं। श्रीमती सोनिया गांधी अस्वस्थ भी रहती हैं और स्वेच्छापूर्वक अपने आपको बहुत सक्रिय होने से रोक भी रही हैं। ऐसी स्थिति में कांग्रेस पार्टी ने अपना सबकुछ राहुल गांधी के भरोसे दांव पर लगा रखा है। राहुल गांधी लगातार एनएसयूआई और युवा कांग्रेस में उनके द्वारा किए जा रहे क्रांतिकारी परिवर्तनों का हवाला देते हैं, पर कांग्रेस को दूर से छूने से भी घबराते हैं। जैसे कि कांग्रेस कोई ‘बर्र का छत्ता’ हो। यही कारण है कि दंगों, घोटालों या भ्रष्टाचार के मामलों में आरोपित कांग्रेस नेताओं के नामों के उल्लेख भर से भी राहुल चौंक जाते हैं। कार्रवाई के सवाल पर तो वे आंखें बंद करते हुए वापस अपने स्वनिर्मित कल्पनालोक में विचरण करने लगते हैं। राहुल गांधी के व्यवस्था-परिवर्तन के स्वप्न के प्रति शुभकामनाएं ही व्यक्त की जा सकती हैं।