जनतंत्र की प्रयोगशाला में जन-गण

महिला मुक्केबाज मैरीकॉम जब अपनी तमाम व्यक्तिगत मेहनत, अपने परिवार और दो छोटे-छोटे बच्चों की उम्मीदों और उत्तर-पूर्र्व के छोटे-से राज्य मणिपुर की जनता की आशाओं को लंदन ओलिंपिक मुकाबलों में पूरा नहीं कर पाईं, तो उन्होंने अपने आपको जिस तरह से व्यक्त किया, वह देश के करोड़ों-करोड़ लोगों का दिल जीतने के लिए काफी था। दरअसल मैरीकॉम ने अपनी विनम्र अभिव्यक्ति के माध्यम से जो कुछ हासिल कर लिया, वह ओलिंपिक के किसी भी स्वर्ण पदक से कहीं ज्यादा कीमती था। उम्मीदों के विपरीत कांस्य से संतोष करने की बाध्यता के बाद मैरीकॉम ने देश की जनता से इस बात के लिए क्षमा माँगी कि वे अपने इस आश्वासन को पूरा करने में नाकामयाब रहीं कि वे स्वर्ण पदक जीतकर ही लौटेंगी।
ईमानदारी की बात तो यह है कि न तो देश ने मैरीकॉम से किसी आश्वासन की माँग की थी और न मैरीकॉम ने ही ऐसा कोई आश्वासन दिया था। स्वर्ण पदक जीतने का भरोसा तो मैरीकॉम ने अपने आप को दिया था, क्योंकि वे अपने आपको देश मानती थीं। मैरीकॉम को लग रहा था कि देश की जनता की ओर से उन्होंने जो जिम्मेदारी अपने ऊपर ली थी, उसे नहीं निभा सकीं, इसलिए उन्हें क्षमा मांगनी चाहिए।

संसद, विधानसभाओं और स्थानीय निकायों में देश की जनता पिछले छह दशकों से अपने प्रतिनिधियों को चुन-चुनकर भेज रही है। ये ही वे नुमाइंदे हैं, जिनका पंद्रह अगस्त 1947 को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जनता के सेवक के रूप में परिचय करवाया था। आज सच्चाई यह है कि हजारों-लाखों की संख्या में चुने जाने वाले ‘जनसेवकों” की ताकत वे झूठे आश्वासन बन गए हैं, जो कभी भी पूरे नहीं होने के लिए वे जनता को देते रहते हैं। उम्मीदें पूरी होने की अंतहीन प्रतीक्षा में अगर लोकतंत्र लगातार कमजोर हो रहा है, संवैधानिक संस्थाएँ ध्वस्त हो रही हैं, हमारी ‘क्रेडिट” और ‘क्रेडिट रेटिंग” दोनों गिर रही हैं तो इन प्रतिनिधियों को उसकी कोई चिंता नहीं है। देश की जनता से किसी भी तरह की क्षमा मांगने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता।

इस स्थिति का कारण शायद यह रहा है कि इन प्रतिनिधियों से उनके कामकाज को लेकर सार्वजनिक रूप से पूछताछ की न तो कभी कोई प्रक्रिया स्वत: ईजाद हुई और न ही ऐसा होने देने को जनता की किसी प्रयोगशाला में प्रोत्साहित किया गया। सही पूछा जाए तो देश के सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ वर्तमान में सड़कों पर उठ रही आवाजों का संबंध चुने हुए प्रतिनिधियों की जनता के प्रति अकाउंटेबिलिटी या जवाबदेही तय करने से ही है। जन लोकपाल की स्थापना को लेकर चला सिविल सोसायटी का बड़ा आंदोलन अगर अपने चरम पर पहुँचने के पहले ही राजनीति की बलि चढ़ गया तो इन कारणों को समझना जरूरी है कि जनप्रतिनिधियों के स्तर पर सक्रिय निहित स्वार्थों के एक बड़े समूह के साथ-साथ जनता के स्तर पर काम कर रहीं अदृश्य शक्तियां भी ऐसे किसी प्रयोग को सफल नहीं होने देना चाहती थीं। प्रयोग की सफलता का अर्थ यही होता कि राजनीतिक नेतृत्व के समानांतर लोकशक्ति की चुनौती को देश के भविष्य के साथ न सिर्फ नत्थी होने देना, बल्कि इस भ्रम का खुलासा होते हुए भी देखना कि पैरों के नीचे से जमीन के खिसकने को नागरिकों की दौड़ माना जा रहा था। हकीकत जबकि यही है कि आबादी का एक बड़ा हिस्सा अपनी जगहों से हिल तक नहीं पाया है।

अण्णा, बाबा रामदेव और भविष्य के गर्भ में छुपे उनके जैसे और भी प्रयोगों को खारिज करना अब इसलिए असंभव हो सकेगा कि इनकी शुरुआत जनता के द्वारा उसी व्यवस्था के खिलाफ हुई है, जिसे कि जनता द्वारा ही स्थापित किया गया है। व्यवस्था पर काबिज निहित स्वार्थों का समूह यह मानकर चल रहा है कि सड़कों पर उमड़ रहा विद्रोह केवल उसी के खिलाफ है, जबकि सच्चाई यह है कि जनता ने तो अब स्वयं के विवेक के प्रति भी संदेह व्यक्त करना शुरू कर दिया है, जो कि और भी ज्यादा खतरनाक है। व्यवस्था के प्रति विद्रोह पर तो राज्य की हिंसा के जरिए काबू पाया जा सकता है, पर जनता के स्वयं के प्रति विद्रोह के साथ निपटना आसान नहीं है। राज्य को इसकी आदत नहीं है। वर्तमान के आंदोलनों से निपटने की रणनीति को लेकर व्यवस्था में व्याप्त भ्रम की स्थिति इसी का संकेत है। पर यह भ्रम भी ज्यादा लंबे समय तक टिकने वाला नहीं है। व्यवस्था में हिस्सेदारी बंटा रहे सभी तत्वों को आगे या पीछे सामने आकर हिसाब तो देना ही पड़ेगा कि उन आश्वासनों का अंतत: क्या हुआ, जो वे जनता को अब तक देते रहे हैं और कभी पूरे नहीं किए गए। यह स्वाधीनता दिवस इन मायनों में निश्चित ही अलग है कि पिछले बारह महीनों के दौरान देश की आत्मा को जिस प्रकार से मथा गया है, वैसा पहले नहीं हुआ। न सिर्फ कुछ बदल ही रहा है, लोग इस बदलने को महसूस भी कर रहे हैं। जनता ने स्वयं के खिलाफ जो लड़ाई इस बार छेड़ी है, निश्चित ही उसके सकारात्मक परिणाम भी प्राप्त होंगे। अगला स्वाधीनता दिवस हो सकता है और भी अलग हो। मुमकिन है मैरीकॉम जब रियो ओलिंपिक से भाग लेकर लौटें तो उनकी झोली में स्वर्ण पदक हो और इस विलंब के लिए व्यवस्था उनसे क्षमायाचना करे।