छुटि्टयों में इस बार

उदास हैं बच्‍चे –
नहीं जा पाएंगे छुट्टियों में
पहाड़ों पर इस बार।

होता है कई मर्तबा ऐसा भी
बदल देता है यात्राओं का मुंह
तेज़ हवा का एक तेज़ झोंका भी।

कांपने लगते हैं जब हाथ
ठिठुर जाते हैं पैर घर के भीतर ही।
समझ नहीं पाते बच्‍चे।

क्‍यों गिर जाती है अलमारी घर की
दादी मां की बूढ़ी पीठ पर
ठीक ऐन वक्‍़त पर।

क्‍यों दिखने लगते हैं पिता
पलक झपकते ही बूढ़े-बड़े-से
टूट पड़ा हो जैसे कोई
पहाड़ मुसीबतों का
घर के ही आंगन में।