चुनाव राष्ट्रपति का, लड़ाई प्रधानमंत्री पद की

समाचार विश्लेषण

आम जनता के विश्वास के साथ खुलेआम धोखाधड़ी का और कोई उदाहरण नहीं हो सकता कि चुनाव राष्ट्रपति पद के लिए योग्य उम्मीदवार का किया जाना है और लड़ाई अब इस बात पर छिड़ गई है कि लोकसभा के लिए दो साल बाद होने वाले चुनावों में प्रधानमंत्री पद के लिए विपक्ष की ओर से किसे चेहरा बनाकर पेश किया जाना चाहिए। जाहिर है प्रधानमंत्री के जैसी हस्ती के पद को लेकर सारी खींचतान हमेशा विपक्षी दलों के बीच ही होती रहती है। कांग्रेस में चोरी-छुपे भी उक्त पद पर किसी की उम्मीदवारी या संभावित उम्मीदवारों को लेकर बातचीत नहीं की जा सकती। राष्ट्रपति पद के लिए होने जा रहे चुनावों की पूर्व संध्या पर प्रधानमंत्री पद के लिए विपक्षी चेहरे का सवाल बिहार के मुख्यमंत्री नीतीशकुमार ने बहुत ही नाप-तौलकर उठाया है। नीतीशकुमार उक्त सवाल को उठाने वाले हैं, इसका संकेत उनकी पार्टी के राज्यसभा सांसद शिवानंद तिवारी ने एनडीए की औपचारिक बैठक के काफी पहले ही यह कहकर दे दिया था कि उनकी निजी राय में प्रणब मुखर्जी ही राष्ट्रपति पद के लिए सबसे उपयुक्त उम्मीदवार हैं। भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के टूटने की तरफ जद (यू) के नेता शिवानंद तिवारी का यह इशारा प्रभावी था।

नीतीशकुमार ने सवाल खड़ा कर दिया है कि प्रधानमंत्री पद के लिए राजग को अपने ऐसे किसी उम्मीदवार की घोषणा काफी पहले से कर देनी चाहिए जो धर्मनिरपेक्ष हो। उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनावों में अपनी पार्टी के सफाए के पहले अल्पसंख्यकों के लिए विशेष आरक्षण की व्यवस्था का झंडा उठाने वाले कांग्रेस के विधि मंत्री सलमान खुर्शीद ने भी नीतीशकुमार के सुझाव का स्वागत किया है। ऐसा करने से खुर्शीद को रोका भी नहीं जा सकता।
सही पूछा जाए तो असली धर्मनिरपेक्षता को लेकर कोई भी लड़ाई देश में नहीं लड़ी जा रही है। इस समय सारी पार्टियाँ या तो साम्प्रदायिक या घोर जातिवादी हो गई हंै और सभी अपने आपको सेक्यूलर भी घोषित करना चाह रही हैं। जातिवाद के आधार पर चुनाव बिहार में भी लड़े गए और उत्तरप्रदेश में भी। देश की जनता को मूर्ख बनाया जा रहा है कि ‘साम्प्रदायिकता” और ‘जातिवाद” अलग-अलग चीजें हैं। कहा जा रहा है कि धर्म के नाम पर राजनीति करना ‘कम्यूनलिज्म” है और जाति के नाम पर सत्ता हथियाना ‘सेक्यूलरिज्म”।

नीतीशकुमार की परेशानी की समीक्षा करना इसलिए जरूरी हो गया है कि गुजरात के मुख्यमंत्री की छबि को मुद्दा बनाकर एनडीए को तोड़ने की तैयारी की जा रही है। यह कोई रेत पर लिखी हुई इबारत नहीं है कि नरेंद्र मोदी भारतीय जनता पार्टी में अपनी हैसियत लगातार बढ़ा रहे हैं। मुंबई में हाल ही में संपन्ना हुई पार्टी की बैठक में उनका जो रुतबा प्रकट हुआ और संजय जोशी की जिस तरह से बिदाई हुई, वह प्रमाण है कि भाजपा के नेतृत्व पर नरेंद्र मोदी का वर्चस्व हावी हो रहा है। बहुत मुमकिन है आगे आने वाले समय में पार्टी की नीतियाँ और प्रमुख पदों के लिए उम्मीदवार उनकी ही सहमति से तय होने लगें। गुजरात के मुख्यमंत्री के आलोचकों की भाषा में अगर बात करें तो नरेंद्र मोदी ने भाजपा को अपहृत कर लिया है और पार्टी को अपनी रिहाई के लिए फिरौती में उन्हें प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी देना पड़ सकती है।

दिक्कत यह है कि प्रधानमंत्री पद के लिए नीतीशकुमार स्वयं भी उम्मीदवार हैं और नरेंद्र मोदी को लेकर उनके क्या विचार है उसकी यहाँ पुनरावृत्ति अनावश्यक है। अत: नीतीशकुमार को ऐसी किसी भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में बने रहना मंजूर नहीं हो सकता जिसकी कि कमान आगे चलकर नरेंद्र मोदी के हाथों में पहुँचने वाली हो। अत: राष्ट्रपति पद के चुनावों के ठीक पहले ‘धर्मनिरपेक्षता” की घंटी बजाकर एनडीए के सभी घटकों के साथ ही भाजपा में मौन संघर्ष कर रहे नरेंद्र मोदी विरोधियों को जागृत करना नीतीशकुमार के लिए जरूरी हो गया था। अब भाजपा अगर चाहती है कि नीतीशकुमार एनडीए में बने रहें तो उसे दो काम करने होंगे। एक तो तात्कालिक रूप से नीतीशकुमार की ‘हाँ में हाँ” मिलानी होगी कि चूँकि कलाम ने चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया है अत: प्रणब मुखर्जी के तो नाम का समर्थन कर दिया जाए। दूसरे यह कि नरेंद्र मोदी को देश का ‘पोस्टर ब्वाय” बनाने के मुद्दे पर भाजपा फिर से विचार करे। मोदी के प्रति विरोधी भाव रखने वाले आडवाणी सहित कई नेता उक्त दोनों सुझावों के प्रति प्रसन्नातापूर्वक सहमति जता सकते हैं। इतिहास की परतें जब भी खुलें, ‘शायद” खुलासा हो कि कलाम ने चुनाव न लड़ने का फैसला पटना में नीतीशकुमार से मुलाकात के बाद किया हो। राजनीति में जो दिखता है केवल वही वास्तविकता में अलग होता है। नीतीशकुमार को जानकारी है कि एक पार्टी के रूप में भाजपा इस समय सबसे कमजोर विकेट पर है। कांग्रेस के लिए प्रसन्ना होने के भी इस समय पर्याप्त कारण हैं। राष्ट्रपति चुनाव ने ममता और एनडीए दोनों के साथ ही अन्य विपक्षी दलों की ताकत को भी पूरी तरह से उधेड़ कर रख दिया है।

देश की जनता के लिए चल रहे घटनाक्रम के सबक क्या हैं? पहला तो यह कि एक सौ बीस करोड़ की आबादी वाले देश में राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवारों का जबरदस्त टोटा है। प्रणब मुखर्जी अगर किसी कारण चुनाव लड़ने से मना कर दें तो देश में जबरदस्त राष्ट्रीय संकट खड़ा हो जाएगा। बहुत संभव है पाँच साल बाद ऐसी ही स्थिति बने। दूसरे यह कि अगले लोकसभा चुनावों के बाद संभावित प्रधानमंत्रियों के रूप में अब किस क्षमता के नायकों को स्वीकार करना होगा उसकी तैयारी हमें अभी से शुरू कर देना चाहिए। वर्ष 2012 में जून महीने की राष्ट्रपति पद के चुनाव की हलचल देश की राजनीति का टर्निंग पॉइंट भी बन सकती है। वैसे भी जून का देश की राजनीति में ऐतिहासिक महत्व है।