चुनावों के पहले ‘आप’ की छोटी-सी अंगड़ाई

रविंद केजरीवाल के लिए दिल्ली में काम पूरा हो गया है। वे ‘आंशिक’ रूप से जीत गए हैं। धरना खत्म हो गया है। मुंबइया फिल्म ‘नायक’ में अभिनेता अनिल कपूर से खलनायक अमरीश पुरी की शर्त लगवाई जाती है। उसके बाद अनिल कपूर को एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बनवाया जाता है। और फिर चौबीस घंटे के अंदर ‘नायक’ (फिल्म में) भ्रष्टाचार और निरंकुश शासन के खिलाफ देखने लायक तबाही मचा देता है। और जब फिल्म खत्म होती है, दर्शक तालियां बजाते हुए घर लौटता है। दिल्ली में हुए ‘आम आदमी पार्टी’ के धरने में कुछ कार्यकर्ताओं के हाथों में ‘नायक’ के ऐसे प्लेकार्ड थे, जिनमें अनिल कपूर की जगह अरविंद केजरीवाल का चेहरा चिपका हुआ था। अरविंद केजरीवाल ने तो फिर फिल्मी अनिल कपूर के एक दिन के मुकाबले पच्चीस दिन पूरे कर लिए हैं। और इन पच्चीस दिनों में उन्होंने और सोमनाथ भारती सहित उनके सभी मंत्रियों ने ढेर सारा काम भी कर लिया है। ‘आम आदमी पार्टी’ के पास अब ज्यादा कुछ करने को नहीं बचा है। सभी लोग सड़कों को फिर से अपना डेरा बनाने के लिए बेचैन हैं। दफ्तरों या कारों में बैठकर फाइलें निपटाने में उनकी रुचि खत्म हो गई है। दिल्ली के आम आदमी की बिजली और पानी की समस्या भी लगभग खत्म कर दी गई है। अब देश की समस्याएं खत्म करना हैं, और इसके लिए कांग्रेस का सपोर्ट जरूरी है। सपोर्ट यह कि वह अपना समर्थन वापस लेकर ‘आम आदमी पार्टी’ सरकार को गिरा दे। पर कांग्रेस ऐसा नहीं करने वाली।

कांग्रेस आलाकमान की जान तब सांसत में पहुंच गई, जब एक मुख्यमंत्री उसकी नाक के नीचे सड़क पर धरने पर बैठ गया। पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। ‘अराजकता’ की स्थिति पैदा हो गई। देश पर लगातार तीसरी बार राज करने का ‘दम’ भरने वाली कांग्रेस सरकार का एक छोटी-सी पार्टी से निपट पाने में ‘दम’ फूल गया। अरविंद केजरीवाल जब दिल्ली में घोषणा कर रहे थे कि ‘हां, मैं अराजकतावादी हूं,’ तब कांग्रेस के चुनाव अभियान प्रमुख और गुप्त रूप से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार राहुल गांधी एक भाजपाई प्रदेश की राजधानी भोपाल में महिलाओं को अपनी दादी इंदिरा गांधी के बारे में बता रहे थे और पार्टी कार्यकर्ताओं को यह नई जानकारी दे रहे थे कि ‘कांग्रेस ही कांग्रेस को हराती है।’ राहुल गांधी को बिलकुल नहीं लग रहा था कि एक मुख्यमंत्री ने दिल्ली की सड़कों पर कोई संवैधानिक संकट उत्पन्न् कर दिया है। जैसे कि उन्हें इस बात की पहले से जानकारी हो कि अंत में क्या होने वाला है। ‘आम आदमी पार्टी’ चाहती थी कि मेट्रो बंद नहीं की जाएं, बैरिकेड्स नहीं लगाए जाएं, लोगों की भीड़ को आंदोलन के लिए उमड़ने दिया जाए और कांग्रेस चाहती थी कि सबकुछ निपट भी जाए और केजरीवाल को उसका समर्थन जारी भी रहे। कांग्रेस का डर साफ था कि समर्थन वापस लेते ही देश की जनता उसके और खिलाफ हो जाएगी और उसकी सीटें और कम हो जाएंगी। भाजपा भी केवल बयानों के कुल्ले करती रही कि केजरीवाल के आंदोलन से अराजकता फैल गई है। भाजपा भी ‘आम आदमी पार्टी’ का खुलेआम विरोध करने से घबरा रही थी। अरविंद केजरीवाल दोनों पार्टियों को सफलतापूर्वक ब्लैकमेल करते रहे।

पूरा मामला इतना सिंपल नहीं है कि 15 जनवरी की आधी रात को दिल्ली स्थित खिड़की गांव में एक घर पर छापा मारने के बाद ‘आम आदमी पार्टी’ के कानून मंत्री सोमनाथ भारती की पुलिसकर्मियों से झड़प हो गई थी। या कि केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा ‘दोषी’ पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई से इनकार करने के बाद मुख्यमंत्री केजरीवाल ने सड़कों पर उतरने का फैसला कर लिया। सच्चाई यह है कि ताजा मामले का ‘सम्मानपूर्वक’ हल हो जाने के बावजूद ‘आम आदमी पार्टी’ के बड़े होते पेट की आग बुझने वाली नहीं है। कांग्रेस पार्टी चाहे तो दिल्ली की सड़कों पर जल्द ही कोई नया संघर्ष झेलने की तैयारी कर सकती है। ‘आम आदमी पार्टी’ के निशाने पर न सिर्फ दिल्ली की सातों लोकसभा सीटें हैं, वह देशभर में अपने उम्मीदवारों को खड़ा करके संसद में ‘तीसरी शक्ति’ के रूप में उभरना चाहती है। कांग्रेस पार्टी को इस काम में शायद उसकी परोक्ष रूप से मदद भी करना पड़े। समझने लायक मुद्दा यह है कि तमाम मतभेदों के बावजूद अगर दिल्ली में ‘आम आदमी पार्टी’ और कांग्रेस के बीच गठबंधन कायम रह सकता है तो फिर ऐसी व्यवस्था तो आगे चलकर लोकसभा में भी काम कर सकती है। कांग्रेस के लिए नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने की दिशा में हर तरह की मोर्चाबंदी और गठबंधन जरूरी है। वक्त काफी कम बचा है और राहुल और केजरीवाल दोनों को लंबा सफर तय करना है। दोनों ही महत्वाकांक्षी हैं। जिस तरह की ‘अराजकता’ दिल्ली में पैदा हुई, वैसी अगर भारतीय जनता पार्टी की सरकार होने की स्थिति में बनी होती तो केंद्र सरकार उससे कैसे निपटती, इसकी कल्पना की जा सकती है। दिल्ली के पुलिसवाले जनता से पैसे की वसूली करके शिंदे तक पहुंचाते हैं – इस तरह का आरोप केजरीवाल द्वारा सार्वजनिक रूप से लगाए जाने के बावजूद न तो देश के गृहमंत्री ने इस्तीफा दिया और न ही दिल्ली के मुख्यमंत्री के खिलाफ कोई मानहानि का प्रकरण दर्ज हुआ। अगर इंदिरा गांधी की हुकूमत होती और कोई ‘आप’ नेता पुलिस और सुरक्षा जवानों से आह्वान करता कि वे अपनी वर्दी उतारकर फेंक दें, तो दिल्ली में आपातकाल लगा दिया जाता। पर न तो मनमोहन सिंह कोई इंदिरा गांधी हैं और न ही अरविंद केजरीवाल कोई जयप्रकाश नारायण। रेसकोर्स रोड, कौशाम्बी और कदमकुआ के बीच फासला भी बहुत है।

देश के लिए यह काफी सुकून की बात है कि नई दिल्ली में रेल भवन के आसपास का इलाका ‘तहरीर चौक’ में नहीं तब्दील हुआ और केंद्रीय राजधानी की ‘अराजकता’ देश के दूसरे हिस्सों तक नहीं पहुंची। जरा-सी असुविधा होने पर बेचैन हो जाने वाला दिल्ली का एक बड़ा तबका ‘आम आदमी पार्टी’ को लेकर करवटें बदलने की तैयारी में था और ‘आम आदमी पार्टी’ को इसका अहसास हो चला था। इसलिए दोनों ही पक्षों के लिए किसी ‘सुविधाजनक’ समझौते पर सहमत होना जरूरी हो गया था। दोनों ही पक्ष जानते हैं कि जो कुछ भी दो दिनों में हुआ है, वह तो चुनावों के पहले की छोटी-सी अंगड़ाई है। आगे अभी बहुत कुछ बाकी है।