चिंता जीतने की नहीं, जीतने नहीं देने की?

जो चीज साफ है और राजनीति को समझने वाले हर शख्स को अब नजर भी आ रही है, वह यही है कि राहुल गांधी ने अपने आपको नए अवतार में प्रकट करने में जरूरत से ज्यादा देरी कर दी। दूसरे यह कि जनता ही नहीं, कांग्रेस का आम कार्यकर्ता भी जानता है कि पार्टी में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के नाम कहां और किस तरह तय किए जाते हैं। अत: चुनावों के तीन महीने पहले इस तरह की घोषणा कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में नहीं, बल्कि पार्टी के प्रचार अभियान प्रमुख के तौर पर जनता का सामना करेंगे, ज्यादा यकीन करने लायक नहीं बचती। यह केवल आगे चलकर गले पड़ने वाली बदनामी से बचने की ऐसी संकरी गली ही दिखाई पड़ती है, जिसमें से केवल राहुल गांधी के ही बचकर निकल सकने की गुंजाइश बनाई गई है, कांग्रेस जैसी भारी-भरकम पार्टी के लिए नहीं। चुनावों के नतीजे चाहे जैसे भी वोटिंग मशीनों से बाहर आएं, हार-जीत के सेहरे तो राहुल के सिर पर ही बंधने वाले हैं। डॉ. मनमोहन सिंह अपनी सरकार की तमाम विफलताओं के बावजूद साफ-साफ बचकर निकल गए हैं। अब सारा ठीकरा राहुल गांधी के सिर पर ही फूटने वाला है। श्रीमती सोनिया गांधी की नई रणनीति का मतलब यह भी निकलता है कि कांग्रेस पार्टी सत्ता से अपनी रवानगी के कलेजे के साथ नरेंद्र मोदी का चुनावों में मुकाबला करना चाहती है। कांग्रेस की रणनीति इन मायनों में अद्भुत है कि राहुल गांधी अरविंद केजरीवाल को सरकार बनाने में समर्थन भी देते हैं और तालियों की गड़गड़ाहट के बीच तालकटोरा स्टेडियम में ‘आम आदमी पार्टी’ की बारह भी बजा देते हैं। कांग्रेस ने किसी समय राजीव गांधी के नेतृत्व में चंद्रशेखर सरकार के साथ भी ऐसा ही करिश्मा किया था।

खिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में शुक्रवार को जो ध्वनियां प्रकट हुईं, उनका केवल एक ही संदेश है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनें या नहीं बनें, कांग्रेस नरेंद्र मोदी को तो सत्ता में नहीं आने देगी। यानी कि चिंता अपने जीतने की उतनी नहीं बची है, जितनी कि मोदी को हराने की है। भाजपा चाहती थी कि चुनावी संघर्ष मोदी बनाम राहुल बन जाए, पर कांग्रेस ने अपने पार्टी उपाध्यक्ष को यह मानकर सुरक्षित कर लिया कि लड़ाई आगे लंबी चलने वाली है। डॉ. लोहिया की भाषा में अगर कांग्रेस कहना चाहे तो ‘जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं।’ यानी कि चुनाव अब जल्दी-जल्दी होंगे और राहुल गांधी के लिए भी आगे वैसे ही अवसर आएंगे, जैसे उनकी दादी के लिए 1980 में उपस्थित हुए थे। पर अगर पार्टी में आंतरिक प्रजातंत्र कायम करने का कांग्रेस का भरोसा ईमानदारी से भरा हुआ होता तो उसकी कार्यसमिति के लिए भी बाकायदा चुनाव होते। देश को पता है कि कार्यसमिति में जब भी चुनाव होते हैं तो क्या होता है! तिरुपति में क्या हुआ था? कांग्रेस, भाजपा और ‘आप’ में जो फर्क साफ-साफ दिखाई दे रहा है, वह यह है कि : ‘आप’ युवाओं की ताकत के रूप में उभर रही है, भाजपा में मोदी बूढ़ों की गिन-गिनकर मार्किंग कर रहे हैं और कांग्रेस में राहुल गांधी से उम्मीद की जा रही है कि वे बूढ़ों की फौज के साथ जवानों की लड़ाई लड़ें। इसीलिए कांग्रेस पार्टी में अंत में सारा मामला रसोई गैस के सिलेंडरों की गिनती को नौ से बारह करने पर पहुंचकर ही खत्म हो जाता है। चुनाव में सीटों की संख्या जैसे-जैसे कम होती जाएगी, राज्यसभा में भर्ती के लिए कांग्रेस पार्टी में मारा-मारी भी उतनी ही बढ़ती जाएगी, जो कि शुरू भी हो गई है। सही पूछा जाए तो जिन-जिन दलों में सत्ता और पार्टी का पद ही कार्यकर्ताओं के लिए रोजगार का सबसे बड़ा साधन बन गया है, वहां साधारण चुनाव भी कुरुक्षेत्र में बदल जाते हैं। अत: तीन महीने बाद जो कुछ भी होने जा रहा है, उसमें सबकुछ होना संभव है। जब राहुल गांधी हुंकार भरते हैं कि ‘मिट गए हमें मिटाने वाले’, तब उनके कथन का अर्थ यही निकाला जाना चाहिए कि सवा सौ साल से अधिक की कांग्रेस अपने अस्तित्व की सबसे गंभीर लड़ाई लड़ने जा रही है, और रसद का इंतजाम आखिरी वक्त पर किया जा रहा है। इसमें दो मत नहीं कि राहुल गांधी का जो आक्रामक रूप इस बार व्यक्त हुआ है, उससे विधानसभा चुनावों के सदमे में डूबी कांग्रेस में थोड़ी-सी जान आई है। निश्चित ही नरेंद्र मोदी को अब अपने हमलों के लिए नए निशाने और परिवार तलाश करने पड़ेंगे। पर तमाम नारेबाजियों के बाद अंत में पूछने के लिए सवाल बच ही जाता है कि कांग्रेस को कुल-मिलाकर कितनी सीटें मिलेंगी?