गुजरात : बड़ी जीत कि छोटी जीत?

मोदी के तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने को लेकर उनके सभी तरह के विरोधियों के बीच कोई मतभेद नहीं है। मतभेद का विष्ाय यही है कि उनकी सीटें बढ़ेंगी या कम होंगी। गुजरात चुनावों के परिणाम अगर चौंकाने वाले आएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। क्या पता गुजरात की जनता नरेंद्र भाई को राज्य से बाहर न जाने देने का ही फैसला कर ले!
चार नवंबर को नरेंद्र मोदी रायपुर की यात्रा पर थे। छत्तीसगढ़ के राज्योत्सव में सभा को संबोधित करते हुए मोदी ने मुख्यमंत्री रमन सिंह की जमकर तारीफ की, पर साथ ही जो कुछ कहा, वह कम चौंकाने वाला नहीं था। मोदी ने छत्तीसगढ़ की जनता को सलाह दी कि वह इस बार भी रमन सिंह को कहीं और जाने न दे, क्योंकि जब तक वह रमन सिंह का विश्वास करती रहेगी, तब तक राज्य तरक्की करता रहेगा। छत्तीसगढ़ में चुनाव अगले साल होने हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों के लिए मोदी के कहे का यह मतलब लगाना आसान था कि रमन सिंह सहित अन्य भाजपा राज्यों के मुख्यमंत्री अपने आपको प्रदेश की राजनीति तक ही सीमित रखें और यह भी कि मोदी स्वयं गुजरात से बाहर निकलने यानी दिल्ली पहुंचने का इरादा रखते हैं। कोई बीस दिन बाद 28 नवंबर को चुनाव प्रचार के लिए राजकोट पहुंचे रमन सिंह ने गुजरात की जनता से इतना भर ही कहा कि मोदी इस बार हैट्रिक बनाएंगे। उन्होंने यह नहीं कहा कि गुजरात की जनता मोदी को कहीं और नहीं जाने दे। रमन सिंह, और शिवराज सिंह भी, अच्छे से जानते हैं कि गुजरात चुनावों के जरिए मोदी सिद्ध क्या करना चाहते हैं और आगे कहां जाना चाहते हैं। इसीलिए अगर गुजरात के चुनावों पर समूचे देश की नजरें लगी हुई हैं तो उसके पीछे वाजिब कारण हैं। मोदी को मिलने वाली सीटों की संख्या भाजपा और संघ के गलियारों में बहुत सारे फैसलों का कारण बनने वाली है। शायद इसीलिए वर्ष 2007 के विधानसभा चुनावों के मुकाबले मोदी को एक ऐसे राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ रहा है, जो इस बार केवल कांग्रेस तक ही सीमित नहीं है। संगठनात्मक रूप से कमजोर कांग्रेस को चुनाव में अपनी ताकत से ज्यादा भरोसा भाजपा, संघ और विहिप से जुड़े मोदी विरोधियों के साथ-साथ गुजरात परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष और भाजपा के पूर्व वरिष्ठ नेता केशुभाई पटेल की ताकत पर है।

विधानसभा चुनावों के परिणामों को लेकर किसी भी तरह का अंदाज लगाने से पहले कुछ तथ्यों पर गौर करना जरूरी है। वर्ष 2002 के चुनावों में भाजपा को 127 सीटें और कुल मतों (10194353) का 49.85 प्रतिशत प्राप्त हुआ था। कांग्रेस को प्राप्त सीटों की संख्या 51 थी। 2007 के चुनावों में मोदी अपनी ताकत और राजनीतिक सामर्थ्य के शिखर पर थे। इस चुनाव तक कुल मतों की संख्या तो बढ़कर 10739972 हो गई, पर मोदी की सीटों की संख्या घटकर 117 और प्राप्त मतों का प्रतिशत भी कम होकर 49.12 रह गया। दूसरी ओर मतों का प्रतिशत कम होने के बावजूद कांग्रेस की सीटें 51 से बढ़कर 59 हो गईं। वर्ष 2002 में भाजपा के केवल एक उम्मीदवार की जमानत जब्त हुई थी। वर्ष 2007 में दो उम्मीदवारों की। कांग्रेस के केवल एक उम्मीदवार ने जमानत खोई। गौर करने लायक दूसरा तथ्य यह है कि अहमदाबाद क्षेत्र (कुल 19 सीटें) और सेंट्रल गुजरात (कुल 43 सीटें) में 2002 के चुनावों के मुकाबले 2007 में कांग्रेस ने बीस सीटों का इजाफा किया। इसके विपरीत दक्षिण गुजरात (29), कच्छ-सौराष्ट्र (58) और उत्तरी गुजरात (33 सीटों) में कांग्रेस को नुकसान केवल 12 सीटों का हुआ। इस बार दक्षिण गुजरात और कच्छ-सौराष्ट्र में केशुभाई की पार्टी भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगा सकती है। केशुभाई के खौफ का अगर जिक्र किया जाए तो बुधवार तक घोषित 177 उम्मीदवारों में 56 टिकट केवल पटेल समुदाय के प्रत्याशियों को मोदी ने दिए हैं, जो कि कुल सीटों (182) का 32 प्रतिशत है।

तीसरा महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वर्ष 2007 के विधानसभा चुनावों में 25 प्रतिशत सीटें (46) ऐसी थीं, जहां जीत का अंतर पांच हजार मतों से कम का था। इनमें अधिकतर सीटें सौराष्ट्र, दक्षिण गुजरात, सेंट्रल गुजरात और अहमदाबाद क्षेत्रों की थीं, जहां इस बार मोदी-विरोधी ताकतें ज्यादा सक्रिय हैं। अत: हार-जीत का अंतर इस बार और भी कम हो सकता है और वर्ष 2007 के मुकाबले ज्यादा सीटों को प्रभावित कर सकता है।

विश्लेषण का अंतिम पॉइंट यह है कि मध्यप्रदेश की सीमा से जुड़े पांच जिलों की 40 सीटों में से केवल 19 ही भाजपा को पिछली बार मिली थीं। वड़ोदरा, आणंद, खेड़ा, दाहोद और पंचमहल जिलों की आदिवासी पट्टी संघ के कार्यकर्ताओं के प्रभाव वाली भी है और कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक भी। इस बार देखना होगा कि मोदी को फिर से प्रभावशाली सिद्ध करने में संघ की कितनी रुचि बनती है और कांग्रेस के वोट बैंक में मप्र के भाजपा कार्यकर्ताओं की ताकत कितनी सेंध लगा पाती है।

मोदी के पक्ष में कहा जा रहा है कि 2012 के चुनावों के लिए किए गए परिसीमन (डी-लिमिटेशन) ने लगभग सीटों के चरित्र को बदल दिया है और जाति समीकरण इस तरह के बन गए हैं कि मोदी को ज्यादा लाभ होगा। यह भी प्रचारित है कि 2007 के बाद गुजरात में विकास का जबर्दस्त काम हुआ है, जिसकी कि अन्य प्रदेशों में भी काफी सराहना हुई है। दो वर्ष पूर्व हुए स्थानीय निकायों के चुनावों में भी भाजपा को जबर्दस्त सफलता मिली थी। गुजरात में देशी और विदेशी पूंजी निवेश एक ऐसा उदाहरण बन गया है, जिसकी कोई तुलना नहीं है। पश्चिमी देशों में 2002 की घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में नरेंद्र मोदी को लेकर कायम पूर्वग्रह बदले हैं। ब्रिटेन ने हाल ही में गुजरात के प्रति जो उदारता दिखाई है, वह इसका प्रमाण है। देश का कॉर्पोरेट वर्ल्ड तो पूरी तरह से मोदी के साथ है और उन्हें प्रधानमंत्री पद पर देखना चाहता है।

मोदी के प्रभाव और गुजरात के विकास को लेकर जो कुछ भी प्रचारित किया जा रहा है, वह अपनी जगह, पर जिस तरह के संकेत नजर आ रहे हैं, वे यही दर्शाते हैं कि चीजें उतनी आसान भी नहीं हैं। लड़ाई एक-एक सीट और एक-एक वोट को लेकर होने वाली है। ‘विकास पुरुष” के तौर पर मोदी चाहे जितने मजबूत नजर आते हों, राजनीतिक रूप से वे कमजोर हुए हैं और ऐसा होने में उनकी ही पार्टी के पूर्व व वर्तमान साथियों की भूमिका भी रही है। कांग्रेस पिछले चुनाव के मुकाबले ज्यादा आश्वस्त है इसलिए उसने अपने तीन सांसदों को भी विधानसभा चुनावों में उम्मीदवार बना दिया है। टिकटों के वितरण को लेकर वैसे तो दोनों ही प्रमुख दलों में असंतोष है, पर उसका खामियाजा मोदी को ज्यादा भुगतना पड़ सकता है। और एक प्रमुख बात यह कि गुजरात में मोदी के खिलाफ खुलेआम बोलने वालों की संख्या अब बढ़ गई है। मोदी अपने बहुप्रचारित ‘सद्भावना मिशन” के परिणामों के प्रति कितने आश्वस्त हैं, यह इस बात से पता चलता है कि एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को भाजपा का टिकट नहीं दिया गया है! भाजपा यही मानकर चलना चाहती है कि गुजरात के मुस्लिम चुनावों में मोदी का विरोध ही करेंगे।

ही बात तो यह है कि मोदी के तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने को लेकर उनके सभी तरह के विरोधियों के बीच कोई मतभेद नहीं है। मतभेद का विष्ाय केवल यही है कि उनकी सीटें बढ़ेंगी या कम होंगी। गुजरात में इस समय पूरी लड़ाई का मुद्दा यही है कि मोदी अपनी सीटें बढ़ाना चाहते हैं और उनके विरोधी घटाना। मुख्यमंत्री के सारे विरोधी इसी काम में जुटे भी हुए हैं। गुजरात चुनावों के परिणाम अगर चौंकाने वाले आएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। क्या पता गुजरात की जनता नरेंद्र भाई को राज्य से बाहर न जाने देने का ही फैसला कर ले!