गठबंधन की जरूरतों का रेल बजट?

२५ फरवरी २०११

आम आदमी के लिए रेल बजट की परिभाषा को ममता बनर्जी ने इस उद्देश्य तक सीमित कर दिया है कि अगर यात्री किराए और माल भाड़े में कोई वृद्धि नहीं की जाए तो जनता तो उनके लिए तालियां बजाने को तैयार है ही, पर एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भी उनकी तारीफ करने से नहीं चूकेंगे। डॉ. सिंह ने वैसा किया भी। ममता बनर्जी जानती थीं कि रेल बजट में किसी खास किस्म की वित्तीय बाजीगरी दिखाने से उन्हें कोई राजनीतिक लाभ होने वाला नहीं है। अत: उनकी पिछले साल की प्रस्तुति और इस साल के प्रस्तावों के गणित में जो कुछ भी खासतौर पर शामिल रहा वह इतना भर था कि पश्चिम बंगाल में होने जा रहे विधानसभा चुनावों के लिए अपनी पार्टी के पक्ष में सहानुभूति बटोरी जाए और उस वाचाल तबके का मुंह बंद रखा जाए जो रेलमंत्री के रूप में उनकी आलोचना कर सकता था। इसीलिए लाभ पाने वालों में चुनावों का सामना करने जा रहे राज्यों के अलावा सीनियर सिटिजंस और पत्रकारों के साथ-साथ मुंबई, चेन्नई, तिरुवनंतपुरम, अहमदाबाद जैसे महानगर शामिल रहे। वित्तीय संसाधन जुटाने के मामले में दिशाहीन दिखाई पड़ते रेल बजट में न तो इस बात की कोई सफाई दी गई है कि पिछले बजट में की गई बड़ी-बड़ी घोषणाओं का क्या हुआ और न ही यह बताया गया है कि इस बार किए गए वायदे कैसे पूरे होंगे, जबकि रेल मंत्री ने स्वयं स्वीकार किया है कि रेलवे को इस समय गंभीर वित्तीय संकट का सामना करना पड़ रहा है। ममता जानती हैं कि पश्चिम बंगाल में होने जा रहे विधानसभा चुनावों में तृणमूल-कांग्रेस गठबंधन को बहुमत मिलने की स्थिति में वे मुख्यमंत्री का पद संभालना ज्यादा पसंद करेंगी। और इस तरह माना जा सकता है कि तमाम तरह की आलोचनाएं सहते हुए रेल मंत्री के रूप में उनका यह अंतिम बजट था। रेल मंत्री के रूप में उन्होंने जो घोषणाएं की हैं उन्हें पूरा करने का सिरदर्द उनके उत्तराधिकारी को ही भुगतना पड़ेगा। आश्चर्य की बात यह है कि प्रधानमंत्री और योजना आयोग जिस तरह की ऊंची विकास दर के सपने देश को दिखा रहे हैं और आर्थिक सर्वेक्षण में जिस नौ प्रतिशत विकास दर की बात की गई है, उसकी कोई झलक रेल बजट में नहीं दिखती। हालांकि ममता बनर्जी दावा जरूर करती हैं कि रेलवे की विकास दर को देश की विकास दर के साथ जोड़ दिया गया है। ममता बनर्जी के पास निश्चित ही कोई अदृश्य जादू की छड़ी होनी चाहिए कि रेलवे के इतने विशाल नेटवर्क को वे कोलकाता में बैठकर सक्षमतापूर्वक चलाने की क्षमता भी रखती हैं और रेलवे की आय में वृद्धि करने का माद्दा भी है। २-जी स्पेक्ट्रम के बंटवारे में ए.राजा के नेतृत्व में हुए घोटाले के बाद प्रधानमंत्री ने तमाम अनियमितताओं का ठीकरा गठबंधन की मजबूरियों के सिर पर फोड़ दिया था। पर तृणमूल कांग्रेस को गठबंधन में बनाए रखना यूपीए के लिए कितनी मजबूरी या फायदे का सौदा रहा है, यह शायद रेल मंत्री के रूप में ममता बनर्जी की सफलताओं-असफलताओं के बजाए पश्चिम बंगाल में सीटों के बंटवारे और चुनावी परिणामों से ही ज्यादा सिद्ध होगा। अत: ममता बनर्जी द्वारा पेश किए गए प्रस्तावों को गठबंधन की जरूरतों का रेल बजट भी निरूपित किया जा सकता है।