खोदा पहाड़, निकला पहाड़

१९ जनवरी २०११

विपक्ष द्वारा लगभग ठप की जा चुकी संसद के आने वाले बजट सत्र के पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल में किए गए परिवर्तनों से किसे फायदा और नुकसान हुआ होगा, इसे पकड़ पाना उतना ही मुश्किल है जितना डॉ. मनमोहन सिंह के चेहरे के पीछे छुपी पीड़ा या प्रसन्नता को पढ़ पाना। परिवर्तनों से अगर देश ने उम्मीद की थी कि उसे भ्रष्टाचार और महंगाई के साथ उसके संघर्ष में एक नए मंत्रिमंडल का चेहरा साथ देने को मिल जाएगा तो उसे निराशा ही हुई है। जनता को ऐसा भी नहीं महसूस होने दिया गया कि अच्छा काम करने वालों को पुरस्कृत और जो कुछ कर नहीं पाए या जो दागी हैं उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया गया है। राहुल गांधी के नेतृत्व में आकार लेने वाली भविष्य की कांग्रेस का कोई युवा स्वरूप भी हिम्मत के साथ जनता के सामने नहीं पेश किया गया है। ऐसा मानकर अवश्य संतोष किया जा सकता है कि बुधवार की कार्रवाई कांग्रेस पार्टी और यूपीए गठबंधन के अंदरूनी इलाकों में कोई संदेश रवाना करने के इरादे से पूरी की गई है और जनता को खुश करने के लिए कसरत बजट सत्र (अगर वह ठीक से चल पाया तो) के बाद की जाएगी। पार्टी और गठबंधन के हिसाब से की गई कार्रवाई के बारे में कहा जा सकता है कि मंत्रिमंडल में द्रमुक और तृणमूल के नफे-नुकसान को तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल से चुनाव परिणाम प्राप्त होने तक मुल्तवी कर दिया गया है। दर्द महसूस भी नहीं होने दिया गया है और शरद पवार की पार्टी के कद को बढ़ा हुआ दिखाते हुए छोटा कर दिया गया है। केरल में चुनावों को देखते हुए चार लोगों को महत्वपूर्ण विभागों (नागर विमानन, ऊर्जा, विदेश तथा खाद्य और जन वितरण) से तथा अगले साल उत्तर प्रदेश की तैयारी में जायसवाल व खुर्शीद के प्रमोशन केे साथ बेनी प्रसाद वर्मा को स्थान दिया गया है। तीन-चार बड़े लोगों के विभागों का वजन कम करके केवल उन्हें दुखी होने के लिए कोपभवनों में छोड़ दिया गया है, उन्हें मंत्रि-पद की सुविधाओं से वंचित नहीं किया है। पूछा जा सकता है कि तमाम अटकलों और शोर-शराबे के बाद हुए इस बहु प्रतीक्षित फेर-बदल के बाद प्याज और टमाटर के दाम कम होंगे या नहीं और कि किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याएं क्या रुक जाएंगी। यूपीए-दो के सरकार में आने के बीस महीने बाद किए गए इस आंशिक फेर-बदल और तीन वर्ष बाद वर्ष 2014 में लोकसभा चुनावों का सामना करने से पहले तक होने वाले तमाम मंत्रि-मंडलीय परिवर्तनों का तब तक कोई असर नहीं होगा जब तक कि देश पर हुकूमत के लिए प्रधानमंत्री अपनी स्वयं की मजबूत राजनीतिक इच्छा-शक्ति का प्रदर्शन नहीं करते। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक सशक्त राजनेता के रूप में डॉ. मनमोहन सिंह की जो छवि है वह केवल ‘आन गांव का सिद्ध’ होकर ही खतम नहीं हो जानी चाहिए। प्रधानमंत्री के जो सहयोगी पहले काम नहीं कर रहे थे वे अपने विभाग बदल जाने के बाद काम करने लगेंगे या टोकरे बदल दिए जाने के बाद फल दागदार नहीं रहेेंगे, ऐसा संभव नहीं। मंत्रिमंडलीय कसरत के बाद जनता और विपक्षी दलों की नजरें कांग्रेस के संगठनात्मक परिवर्तनों पर रहेंगी। प्रधानमंत्री अगर सरकार की सारी बीमारियों का इलाज प्राकृतिक चिकित्सा के जरिए ही करना चाहेंगे तो अंत में उपवास भी उन्हें ही झेलना पड़ेगा। देश की जनता डॉ. मनमोहन सिंह से शल्य चिकित्सा की उम्मीद कर रही थी और उसे निराश होना पड़ा। शरद पवार के लिए अवश्य ही खुश होने का कारण बन सकता है कि ‘देर आयद, दुरुस्त आयद’ की तर्ज पर प्रधानमंत्री भी अब उन्हीं की भाषा में जवाब देने लगे हैं। इस लिहाज से सोचें तो डॉ. सिंह थोड़ा-थोड़ा बदलने लगे हैं और आक्रामकता भी दिखाने लग गए हैं।