खेल खतम, पैसा हजम!

१४ अक्टूबर २०१०

शंका-कुशंकाओं और आधी-अधूरी तैयारियों के साये में प्रारंभ हुआ राष्ट्रमंडल खेलों का तमाशा गुरुवार को रंगारंग तरीके से समाप्त हो गया। शुक्रवार से नई दिल्ली की आत्मा अपने पुराने शरीर में फिर से प्रवेश भी कर जाएगी और उसकी चाल-ढाल भी पहले जैसी हो जाएगी। खेलों के सफलतापूर्वक आयोजन को लेकर श्रेय की दावेदारी का संघर्ष प्रारंभ हो चुका है जो आगे कई दिनों तक चलेगा। आरोपों- प्रत्यारोपों के गंदे अंतरवस्त्रों की सार्वजनिक रूप से धुलाई भी होगी और उन्हें टांगने के लिए राजनीतिक खूंटियां भी तलाशी जाएंगी। सवाल फिर भी अनुत्तरित रह जाएगा कि पैंतीस हजार करोड़ रुपए या उससे भी कहीं कई गुणा ज्यादा की राशि का जो प्रदर्शन नई दिल्ली में हुआ है उसकी तहों में छुपे भ्रष्टाचार की खाल उधेडऩे का काम कोई करेगा या नहीं? या फिर सब कुछ जुबानी जमा खर्च से ही बराबर हो जाएगा? ऊपर से चलने वाला एक रुपया देश के गांवों में नीचे पहुंचते-पहुंचते कितने पैसे का रह जाता है उसे लेकर स्व. राजीव गांधी ने सबसे पहले कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन में अपनी चिंता जताई थी। दो दशकों के बाद राहुल गांधी भी उसी की चर्चा कर रहे हैं। स्थितियों के फर्क की बातचीत करें तो राष्ट्रमंडल खेलों को लेकर हुआ सारा भ्रष्टाचार ठीक सत्ता की नाक के नीचे नई दिल्ली में हुआ है। कोई गारंटी नहीं कि इस आदमकद भ्रष्टाचार को लेकर सत्ता के गलियारों में कोई जूं भी रेंगने वाली है। बहुत मुमकिन है देश की इज्जत के नाम पर सब कुछ जायज करार दिया जाए। पदकों की चमक-दमक के पीछे हर तरह के अपराध और भ्रष्टाचार की कालिख छुपा दी जाएगी। इज्जत के नाम पर जब देश में निरपराध लोगों की हत्याएं भी बर्दाश्त कर ली जाती हों, पैसों का भ्रष्टाचार तो मामूली बात है। सफलताओं के जश्न के दौरान इस तरह की चर्चाएं करना भी एक अपशगुन माना जाता है। राष्ट्रमंडल खेलों के समारोह स्थल जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम के समीप बनने वाले फुट ओवरब्रिज के गिर जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था: “इस देश में काम पूरा हुए बिना भुगतान कर दिया जाता है। नया ब्रिज ताश के पत्तों की तरह ढह गया। (खेलों के आयोजन में) सत्तर हजार करोड़ रुपए शामिल हैं। देश में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार व्याप्त है। हम आंखें मूंद कर नहीं रह सकते।” पर इस समय बहस में भ्रष्टाचार नहीं खेलों की सफलता को लेकर दावेदारियां हैं। दिल्ली के उप राज्यपाल तेजेन्द्र खन्ना ने प्रधानमंत्री से शिकायत की है कि खेल गांव के सफाई इंतजामों को लेकर सारा श्रेय मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ले रही हैं, जो कि गलत है। श्री खन्ना ने ही इसके पहले कहा था कि खेलगांव में साफ-सफाई व रखरखाव की जिम्मेवारी आयोजन समिति की है। कोई भी इस समय यह चर्चा नहीं करना चाहता कि करोड़ों की लागत से बनने वाले फुट ओवरब्रिज के गिर जाने के बाद सेना के जवानों ने किस तरह से केवल तीन दिनों में आधी से कम लागत में उसे तैयार कर पांचवे दिन आयोजन समिति को सौंप दिया था। राष्ट्रमंडल खेल अगर किसी एक कारण से भी विफल हो जाते तो उसकी जिम्मेदारी लेने के लिए भी शायद टेंडर जारी करना पड़ते। इस मुद्दे पर तो शायद अब कोई बहस भी नहीं छेडऩा चाहेगा कि पैंतीस या सत्तर हजार करोड़ रुपए देश के कितने गांवों की तकदीर बदल सकते थे? कितने स्कूल या कितनी सडक़ें बना सकते थे? कितनी महिलाओं को कितनी दूरी से पीने का पानी ढोकर लाने की जिल्लत से निजात दिला सकते थे? या कितने किसानों को आत्महत्या करने से रोक सकते थे। देश को कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए अगर आने वाले वर्षों में हम सुरेश कलमाडी और ललित मोदी के कई क्लोन तैयार करने में सफल हो जाएं और ये ही लोग सफलता के प्रतीक पुरुष बन जाएं। ओलिम्पिक खेलों की मेजबानी करने के हौंसले अब वैसे ही बुलंद हो गए हैं। राष्ट्रमंडल खेलों
के आयोजन को लेकर चलने वाली तैयारियों के दौरान जिस तरह की शर्म का राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को सामना करना पड़ा और प्रधानमंत्री को जिस तरह व्यक्तिगत रूप से अपनी निजी क्षमता को दांव पर लगाकर हस्तक्षेप करना पड़ा अगर उसे भी भ्रष्टाचार की तरह ही हजम नहीं करना चाहें तो सीखने के लिए ऐसा बहुत कुछ हाथ लगा है जो देश में खेलों और खिलाडिय़ों का भविष्य संवार सकता है। पर हम जानते हैं ऐसा होगा नहीं। खेल संगठनों पर कब्जा जमाए हुए बूढ़े राजनीतिज्ञ और भ्रष्ट नौकरशाह ऐसा संभव होने नहीं देंगे। देश के खेल संगठन और उनके मार्फत मिलने वाला सुख राजभवनों के आनंद से कम नहीं है। राजभवनों में स्थापना के लिए जिस तरह के व्यक्तित्वों की आमतौर पर तलाश की जाती है वे कोई अप्रतिम नहीं होते। राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों के दौरान मचे घमासान को हम अपने राष्ट्रीय मिजाज से अलग करके नहीं देख सकते। आखिरी वक्त में / तक सारी तैयारियों में जुटे रहना और फिर उसके लिए हर तरह की बाधा दौड़ ‘‘ किसी भी कीमत पर’’ जीतने का जज्बा ही हमारा सबसे बड़ा आपदा प्रबंधन है और हम उस पर व्यक्तिगत से लगाकर राष्ट्रीय स्तर तक गर्व करने में संकोच नहीं करते। देश में कुछ सुगबुगाहट जरूर है कि चीजें बदलने का नाम लेने लगी हैं। बताया जा रहा है कि आने वाले वर्षों में राजनीति में नेतृत्व का हस्तांतरण युवाओं के हक में होने जा रहा है। कुछ नए और ईमानदार चेहरे देश की नई इबारत लिखने जा रहे हैं। जैसा कि खेलों के दौरान देखा गया। छुपे हुए और गुमनाम चेहरों ने अंधेरों से निकल कर पदकों का आकाश चूम लिया और अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों को राष्ट्र के सामूहिक गौरव में तब्दील कर दिया। अगर ऐसा होता है तो उम्मीद की जा सकती है कि खेलों और उनकी तैयारियों की तस्वीर भी बदलेगी। पर तब तक के लिए हम इस पदकतालिका के साथ तरक्की की ओर आगे बढ़ते रह सकते हैं कि राष्ट्रमंडल के सभी देशों के बीच औसत से कम वजन के बच्चों की संख्या के मामले में भारत सबसे ऊपर है। बच्चों के अधिकारों से जुड़ी एक स्वयंसेवी संस्था की रिपोर्ट में किया गया खुलासा चौंकाने वाला हो सकता है कि भारत में 43 प्रतिशत बच्चे औसत से कम वजन के हैं। खेलों की तैयारियों से जुड़े असली मानकों की ओर तो वास्तव में किसी का ध्यान ही नहीं है। जिस तरफ ध्यान है वह यह कि : खेल खतम, पैसा हजम!

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