खतरों की मुनादियों में छुपे खतरे

१ दिसंबर २०१०

आतंकवादी हमलों की आशंकाओं को लेकर समूचे देश या कुछ संवेदनशील शहरों में सुरक्षा अलर्ट समय-समय पर जारी होते रहना अब नागरिकों की दैनंदिनी आदत का हिस्सा बन रहा है। ऐसा होना भी चाहिए। जिस तरह के माहौल में हम आज जी रहे हैं उसमें दुर्घटनाओं, अपराधों और आतंकवादी घटनाओं से अब लगातार जूझते रहना पड़ेगा। दुर्घटनाओं और अपराधों के संबंध में तो सुरक्षा एजेंसियां किसी तरह के अलर्ट नहीं जारी कर सकतीं। आतंकवादी घटनाओं को लेकर की जाने वाली सुरक्षात्मक कार्रवाइयां अपनी जगह, अब तो उस पर सत्ता की राजनीति भी की जाने लगी है। आतंकवाद को रंगों में बांटकर राजनीति को और ज्यादा हिंसक और असुरक्षित बनाया जा रहा है। बहस का मुद्दा यहां यह है कि आतंकी घटनाओं को लेकर समय-समय पर जारी की जाने वाली चेतावनियों और उनसे उत्पन्न होने वाले खतरों को लेकर किसी भी स्तर पर चिंता का व्यक्त न होना और जो व्यवस्था के शीर्ष पर हैं उनके हाथों में नागरिक द्वारा अपने स्वयं के अधिकार सौंपते जाना एक तरह की अधिनायकवादी व्यवस्था में प्रवेश करने जैसा बन सकता है। और ऐसी स्थितियां दुनिया के कई मुल्कों में बनती जा रही हैं। आतंकवादी घटनाओं का कैसे सामना किया जाए- इस बारे में नागरिकों को शिक्षित और प्रशिक्षित करना एक अलग और सकारात्मक प्रक्रिया है। पर अपनी जनता के मन में आतंकवाद का भय पैदा कर उसके जरिए सामान्य शांति-व्यवस्था को भी कायम रखने के प्रयोग भी करते रहना एक छद्म कौशल ही करार दिया जा सकता है। एक ऐसा कौशल जिस पर कि एक स्थिति के बाद लोग यकीन करना ही बंद कर दें। या फिर उसकी सच्चाई पर इस हद तक विश्वास करना छोड़ दें कि दुर्भाग्य से कभी ऐसी कोई चौंका देने वाली घटना से उनका सामना हो जाए तो उससे निपटने के लिए वे अपने आपको पूरी तरह से नि:सहाय पाएं। पिछले दिनों जर्मनी में सरकारी अधिकारियों पर आरोप लगाया गया कि आतंकवादी खतरों का दुरुपयोग नागरिक स्तर पर बदहवासी पैदा करने के लिए किया जा रहा है। जर्मन नागरिकों ने आतंकवादी खतरों की चेतावनियों को हास्यास्पद और उपेक्षा करने योग्य भी निरूपित किया। बताया गया कि नवंबर मध्य में आतंकवादी खतरों की तीन अलग-अलग चेतावनियां सार्वजनिक की गई थीं जो कि बाद में मजाक साबित हुईं। ‘भेडिय़ा आया, भेडिय़ा आया’ की चेतावनियों को लेकर जर्मन नागरिकों के मन में सरकार के इरादों को लेकर अब शंकाएं उत्पन्न होने लगी हैं। आतंकवाद की घटनाएं जैसे-जैसे दुनिया भर में बढ़ रही हैं, सरकारें उनसे निपटने के अलग-अलग तरीके भी अख्तियार कर रही हैं। इन तरीकों में इस तरह के प्रयोग भी शामिल हैं कि नागरिकों को अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा की चिंताओं में इतना व्यस्त कर दिया जाए कि वे अपनी अन्य मूलभूत आवश्यकताओं को लेकर सरकारों के दायित्वों के संबंध में किसी भी तरह की पूछताछ करने अथवा राष्ट्रीय हितों के नाम पर होने वाले मानवाधिकारों के उल्लंंघनों को लेकर किसी भी तरह की शिकायतें दर्ज कराने का साहस ही नहीं जुटा सकें। तानाशाही व्यवस्थाओं में तो इन मुद्दों पर कभी चर्चा हो ही नहीं सकती पर प्रजातांत्रिक राष्ट्रों में इस बात पर बहस आरंभ हुई है कि इस तरह की चेतावनियों के जारी होने और अधिकांश मामलों में उनके निरर्थक साबित होने के बीच के घटनाक्रम के प्रति नागरिकों का शिक्षित होना और उन्हें विश्वास में लिया जाना निहायत जरूरी है। ऐसा दो कारणों से आवश्यक है। पहला तो यह कि आतंकवादी खतरों को लेकर जारी होने वाली मुनादियों के प्रति नागरिक पूरी तरह से उदासीन नहीं हो जाएं यानी कि जब भेडिय़ा वास्तव में ही आ जाए तो वे सोए हुए नहीं पाए जाएं। और दूसरा यह कि इस तरह के खतरों की चेतावनियों का इस्तेमाल सत्तारूढ़ दल या गठबंधन प्रशासन पर अपनी पकड़ को निरंकुश तरीकों से मजबूत करने अथवा किसी समुदाय विशेष का निर्बाध समर्थन अपने अस्तित्व को अचुनौतीपूर्ण बनाए रखने मेें नहीं कर सके। समाज में राजनीतिक अथवा सांप्रदायिक कारणों से जैसे-जैसे असहिष्णुता बढ़ेगी या विभिन्न समुदायों के बीच वैमनस्य बढ़ेगा, सत्तारूढ़ व्यवस्थाएं कानून और व्यवस्था बनाए रखने की अपनी कोशिशों के पर्दे में ‘हास्यास्पद’ या गलत भी साबित हो सकने वाले हमलों/खतरों का भय फैलाकर सडक़ों और बाजारों को कफ्र्यू जैसे सन्नाटों में बदलती रहेंगी। देश की आंतरिक सुरक्षा को खतरे से संबंधित चेतावनियां या अलर्ट एक ऐसा प्रयोग है जिसके तहत नागरिक अधिकारों को लेकर लड़ी जाने वाली तमाम प्रजातांत्रिक लड़ाइयों और संघर्षों को भी अगर व्यवस्थाएं चाहें तो अनिश्चित अवधियों के लिए सफलतापूर्वक स्थगित करवा सकती हैं और संविधानों में उल्लेखित मानवाधिकारों को ‘राष्ट्र की तात्कालिक जरूरत’ के मुताबिक इस तरह से संशोधित या सीमित कर सकती हैं कि अदालतों में चुनौती भी नहीं दी जा सके। वर्ष 2002 में सीरियाई मूल के कैनेडा की नागरिकता वाले एक व्यक्ति को अमेरिकी अधिकारियों ने न्यूयार्क के जॉन.एफ कैनेडी हवाई अड्डे पर इस शक में गिरफ्तार कर लिया कि उसके आतंकवादी संगठन अल-कायदा से संबंध हैं। गिरफ्तारी के बाद उसे सीरिया भेज दिया गया जहां कोई साढ़े दस महीने उसे ३3६3७ फुट के सैल में बंद रहना पड़ा। कैनेडियाई अधिकारियों ने जब पूरे मामले की तहकीकात की तो पता चला कि न तो वह आतंकवादी था और न ही उसके आतंकवादियों से संबंध थे। स्वीकार किया गया कि उसे अन्यायपूर्ण तरीके से बंद कर प्रताडि़त किया गया था। उससे क्षमा मांगी गई और मुआवजे के तौर पर कोई एक करोड़ डॉलर दिए गए। आतंकवादी खतरों को लेकर बढ़ती जा रही मुनादियों के पीछे छुपा हुआ खतरा यह भी है कि नागरिक असुरक्षा के माहौल को बिना किसी सार्वजनिक पूछताछ या लेखे-जोखे की गारंटी के बनाए रखना एक सीमा के बाद व्यवस्था और व्यवस्थापकों के लिए कब निहित स्वार्थ में तब्दील हो जाता है कभी पता ही नहीं चलता। आतंकवादी खतरों को लेकर जारी होने वाले सुरक्षा अलर्ट की खूबी रहती है कि उसमें नागरिकों के लिए सभी तरह की सूचनाएं रहती हैं मसलन आतंकवादियों की संख्या कितनी है, उनके नाम क्या हैं, वे कहां से आए हैं और किन शहरों में प्रवेश कर चुके हैं, कहां हमला कर सकते हैं, आदि-आदि। साथ ही कुछ आतंकियों के स्केच आदि भी जारी किए जाते हैं। किसी भी जिम्मेदार व्यवस्था में नागरिकों को इतनी सूक्ष्म जानकारियों से लैस करने की प्रक्रिया को एक ईमानदार कदम के रूप में देखा जाना चाहिए। पर ऐसा होता नहीं है। कारण यह भी हो सकता है कि नागरिक सुरक्षा के व्यवस्थापन में इस तरह की किसी पूछताछ या जवाबदेही की कोई गुंजाइश नहीं बनाई जाती कि अलर्ट के चलते जिन तथ्यों की जानकारी सार्वजनिक की जाती है उनका अंतिम हश्र क्या हुआ उसका पता चल सके और चेतावनियों का सत्यापन हो सके? और इस तरह की कार्रवाइयों को लेकर यहीं से व्यवस्था के मंतव्यों के प्रति संदेहों की शुरुआत होती है। प्रजातंत्र के लिए खतरों का प्रारंभ भी ऐसे ही होता है।