क्‍यों बनाएं मोदी को प्रधानमंत्री?

गुजरात के मुख्यमंत्री जिस क्षण भी स्वयं को अपनी स्वआरोपित आत्ममुग्धता से मुक्त कर लेंगे, वे उन राष्ट्रनायकों की कतार में अपने आपको पाएंगे, जिनके नेतृत्व की देश को उत्सुकता और उत्कटता से प्रतीक्षा है। उस अद्भुत क्षण का अवतरण होना अभी बाकी है। तब तक के लिए मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी मुल्तवी कर देना चाहिए।)

ब्रिटेन की प्रसिद्ध अंग्रेजी पत्रिका ‘द इकोनॉमिस्ट” की इस भविष्यवाणी पर यकीन नहीं करना हो कि कांग्रेस की ओर से पी. चिदंबरम प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में हो सकते हैं तो भी पंडित जवाहरलाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नायकों की पंक्ति में बैठाने के लिए देश के एक सौ बीस करोड़ लोगों के पास जो च्वॉइस नजर आ रही है, उसे लेकर चिंता व्यक्त करना जरूरी हो गया है। प्रधानमंत्री पद के लिए जो नाम सामने आ रहे हैं, हाल-फिलहाल उनमें चार प्रमुख हैं। ये हैं : राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी, मुलायम सिंह यादव और सुश्री मायावती। उच्च पद की दौड़ में कुछ छुपे हुए चेहरे भी हो सकते हैं, जो बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने की स्थिति में प्रकट हो सकते हैं। देश में ऐसे छींके अतीत में टूट चुके हैं।

स्थिति चाहे जो भी बने, एक बात तो साफ है और वह यह कि देश के अगले प्रधानमंत्री का चेहरा ऊपर गिनाए गए चार नेताओं जैसा ही आक्रामक और कठोर होगा। नेहरू, शास्त्री, अटलजी के व्यक्तित्वों की कोमलता और चमत्कारिक गुणों से अब हमारे भावी नेताओं का दूर तक भी कोई संबंध नहीं रहने वाला है। एक अन्य हकीकत जो जाहिर है, वह यह कि कांग्रेस को एक बार फिर से नेतृत्व का मौका देने वाली कोई भी सरकार मुलायम सिंह/मायावती के अंदरूनी समर्थन के बगैर नहीं बन सकती है। यह भी सभी को खुलेआम पता है कि सपा और बसपा दोनों के प्रमुख नेता भी इस उच्च पद के उम्मीदवार और दावेदार हैं। इसी प्रकार भाजपा का भी कोई उम्मीदवार एनडीए के घटक दलों, जिनमें कि जद(यू) प्रमुख है, के अंदरूनी समर्थन के बगैर प्रधानमंत्री पद नहीं पा सकेगा। आखिरी बात यह कि गैर-भाजपा विपक्ष का भी कोई उम्मीदवार भाजपा के समर्थन के बिना प्रधानमंत्री नहीं बन सकता।

रिटेल में एफडीआई के मुद्दे पर यूपीए के मैनेजरों ने संसद में जिस तरह से मनमोहन सिंह सरकार की लाज बचाई, उसे देखते हुए कांग्रेस के भविष्य के गेमप्लान को लेकर कोई भी अनुमान आने वाले समय के लिए टाला जा सकता है। कांग्रेस द्वारा चरण सिंह और चंद्रशेखर की सरकारों को समर्थन देकर वापस लेने के किस्से देश की जानकारी में हैं। हम यहां उस एक उम्मीदवार की चर्चा करना चाहते हैं, जो भाजपा के पास हाल-फिलहाल उपलब्ध है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मोदी-विरोध को अगर गैर-महत्वपूर्ण और गैर-जरूरी मान लिया जाए तो भारतीय जनता पार्टी के जिम्मेदार नेताओं ने अनौपचारिक रूप से गुजरात के मुख्यमंत्री को ही पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार लगभग-लगभग घोषित कर रखा है। बहुत मुमकिन है कि संघ और भाजपा का ही एक वर्ग इसमें भी राजनीति ढूंढता हो कि मोदी के समर्थन के बिना तो पार्टी का कोई दूसरा उम्मीदवार (यहां अरुण जेटली, सुषमा स्वराज व अन्य पढ़ें) भी प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदारी नहीं पेश कर सकेगा, चाहे फिर एनडीए के अन्य घटक दल उसके नाम पर कितने ही सहमत क्यों न हों। क्योंकि एक बात तय है कि अगर गुजरात चुनाव में मोदी को वर्तमान की 117 से कम या बहुत कम सीटें मिलती हैं तो प्रधानमंत्री पद के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री की दावेदारी बहुत हद तक उखड़ जाएगी। प्रधानमंत्री पद के सभी उम्मीदवारों की आंखें इसीलिए गुजरात चुनाव के परिणामों पर टिकी हुई हैं। कांग्रेस की स्ट्रेटेजिक रुचि इस बात में होना चाहिए कि मोदी पहले के मुकाबले और ज्यादा पॉवरफुल होकर उभरें, जिससे कि भाजपा, संघ, एनडीए और इस तरह समूचा विपक्ष ज्यादा बिखर जाए। क्या पता, प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस का परंपरागत अल्पसंख्यक कार्ड मोदी के ज्यादा फायदे के लिए ही खेला हो।

मुद्दा यहां यह है कि क्या गुजरात चुनाव के नतीजे आने से पहले नरेंद्र मोदी को यह घोषणा नहीं कर देना चाहिए कि वे प्रधानमंत्री पद की दौड़ में नहीं हैं? मोदी की ऐसी कोई भी घोषणा देश की राजनीति की चाल और ढाल बदल सकती है और पक्ष और विपक्ष के बीच कायम वर्तमान ध्रुवीकरण को बनाए रख सकती है। यह उपलब्धि इस बोनस के अतिरिक्त होगी कि भाजपा और संघ अंदरूनी तौर पर बिखरने से बच जाएंगे।

स हकीकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि प्रधानमंत्रियों के रूप में जिस तरह के ऋषि-राजपुरुषों का सौभाग्य देश को अभी तक प्राप्त हो चुका है, वैसा व्यक्तित्व हासिल करने के लिए मोदी को राजनीति के किसी बोधिवृक्ष के नीचे बैठकर तपस्या करना पड़ेगी। मोदी राजनीतिक अहंकार की ऐसी प्रतिमूर्ति के रूप में स्थापित किए जा चुके हैं, जो अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के प्रति हास्य, तिरस्कार, अवमानना भाव रखते ही नहीं, दर्शाते भी हैं। मोदी का व्यक्तित्व भय पैदा करता है कि प्रधानमंत्री के रूप में वे अपने विरोधियों को किस तरह से और किन विशेषणों के साथ संबोधित करेंगे। कांग्रेस के नेतृत्व में विकसित हुई छद्म धर्मनिरपेक्षता भी मोदी के प्रधानमंत्रित्व में समाप्त हो जाएगी और देश हिंदुत्व बनाम अन्य की शक्ल अख्तियार कर लेगा। पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी मुस्लिम देशों के लिए प्रधानमंत्री के रूप में मोदी किस तरह का ‘सद्भावना मिशन” चलाएंगे, कहा नहीं जा सकता। और उन यूरोपीय देशों तथा अमेरिका के साथ देश के संबंध कैसे बनेंगे, जो आज भी मोदी को अपना वीजा देने को तैयार नहीं हैं?

गर समूचा देश गुजरात नहीं है तो प्रधानमंत्री के रूप में भारत राष्ट्र में मोदी की स्वीकार्यता अभी पूरी तरह से स्थापित होना बाकी है। न तो भाजपा ने ही एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में और न ही स्वयं मोदी ने एक उम्मीदवार के रूप में इस दिशा में कोई ईमानदार प्रयास किया है। उनके चुनाव प्रचार की शैली की ही तरह मोदी का व्यक्तित्व भी ‘थ्री-डायमेंशनल” नजर आता है। मोदी के विरोधियों का इस बात में निहित स्वार्थ भी हो सकता है कि गुजरात के मुख्यमंत्री अपनी ‘लार्जर दैन लाइफ” छवि से कभी मुक्त नहीं हो पाएं और ‘विकास पुरुष” के रूप में उनकी अतिरंजित नेतृत्व क्षमताओं को लेकर भ्रम की स्थिति इसी प्रकार बनी रहे। गुजरात के मुख्यमंत्री जिस क्षण भी स्वयं को अपनी स्वआरोपित आत्ममुग्धता से मुक्त कर लेंगे, वे उन राष्ट्रनायकों की कतार में अपने आपको पाएंगे, जिनके नेतृत्व की देश को उत्सुकता और उत्कटता से प्रतीक्षा है। उस अद्भुत क्षण का अवतरण होना अभी बाकी है। तब तक के लिए मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी मुल्तवी कर देना चाहिए। और फिर अभी तो लालकृष्ण आडवाणी ने भी घोषणा नहीं की है कि वे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं हैं।