क्यों नहीं आता गुस्सा और फूटते हैं आंसू

श्याम बेनेगल की स्मरणीय कृति ‘अंकुर’ के अंतिम दृश्य में समाज के सबसे शोषित वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाला बच्च शोषक जमींदार की हवेली पर पत्थर उछालता है और इसी के साथ फिल्म का अंत हो जाता है। याददाश्त बहुत खराब हो तब भी अंकुर को फूटे कोई तीस-पैंतीस साल से ज्यादा का वक्त हो चुका है पर जमींदार के खिलाफ उछाला गया पत्थर अभी तक सिनेमा के पर्दे के भीतर ही कैद है। इधर सिनेमा हाल के बाहर की दुनिया पूरी तरह से बदल चुकी है। पूरी की पूरी पुरानी पीढ़ी इस दौरान या तो बूढ़ी हो चुकी है या सांसें तोड़ चुकी है। एक नई जनरेशन इस दौरान अपने पैरों पर खड़ी होकर दुनिया बदलने की तैयारी में है और इसमें वह बच्च भी शामिल होगा जिसने फिल्म में जमींदार की हवेली पर पत्थर फेंका था।

मोहल्ले के ओटलों पर अपनी मशीनें जमाकर सिलाई करने वाले दर्जियों से त्यौहारों के मौकों पर झगड़ा हुआ करता था कि उन्होंने वक्त पर कपड़े सिलकर नहीं दिए। छोटे-छोटे गांवों से लेकर बड़े-बड़े शहरों तक हजारों की तादात में फैले हुए ये दर्जी पिछले तीस सालों के दौरान बगैर कोई खबर किए हुए ही रेडिमेड गारमेंट्स की दुकानों में छुप गए हैं। सर्दी, गर्मी, बरसात-हर मौसम में शहर के चौराहों पर एक टूटी-फूटी छतरी के नीचे बैठने वाला मोची, दो रुपए रोज पर सायकल किराए से देने वाली ढेर सारी दुकानें, सड़क किनारे पंचर जोड़ने की दुकान जमाए हुए कोई चचा, कोई रफूगर, कोई रंगरेज – देखते ही देखते सब कब और कहां गायब हो गए पता ही नहीं चला। शहरों में चलने वाले तांगे पलक झपकते ही पहले ऑटो रिक्शा और फिर कार-टैक्सियों में बदल गए। तांगों के आगे जुतने वाले घोड़े बिक गए और उनके अस्तबल साबुन-तेल के गोदाम बन गए। गली-गली डिब्बे में मलाई की कुल्फियां या कचौरी-समौसे लेकर शहर भर का चक्कर लगाने वाले लोग, बर्फ के लड्डू का ठेला लेकर घूमने वाला बाबा, बुड्ढी के मीठे-मीठे बालों का गोला बनाकर बेचने वाला लाला या गैस की टंकी पर गुब्बारे बांधकर बच्चों को लुभाता हुआ फुग्गे वाला भैया-गुम हो चुके हैं सब लोग। और शहर के उन सिनेमा हॉल्स का क्या हुआ जहां सुबह से रात तक फिल्में चलती थीं। लोग टिकटों के लिए लाइनें बनाकर खड़े रहते थे या धक्के खाते थे। सिनेमा हॉल्स रात के अंधेरों में मलबों के ढेर में बदले और दिन की रोशनी में व्यावसायिक परिसरों, मॉल्स और मल्टीप्लेक्स में ढल गए। कहीं कोई हो-हल्ला या आहट नहीं हुई।

याद पड़ता है कि एक जमाने में ट्रेन के लंबे सफर के दौरान पानी के बॉटल्स लेकर चलना पड़ता था। ट्रेन जैसे ही किसी स्टेशन पर रुकती, लोगों की भीड़ टूट पड़ती थी पानी के नलों पर। एक-दूसरे की बाटलें हटाई जाती थीं, झगड़े होते थे। बॉटल का मुंह पानी के नल पर होता था और नजरें ट्रेन पर। ट्रेन जैसे ही चलने लगती, लोग नल को खुला छोड़ अपने-अपने डिब्बों की तरफ दौड़ पड़ते थे। स्टेशनों पर पानी की प्याऊ बनी होती थी। वहां एक स्टूल पर पानी का मटका, कुछ खुल्ले पैसे पड़े होते थे और पीछे एक बूढ़ा चेहरा होता था जो पानी पिलाता था। कोई पता बताए कि ये सब लोग कहां जाकर बस गए हैं। स्टेशनों के नल आज सूने पड़े रहते हैं। मुसाफिरों की कोई भीड़ अब उन पर नहीं टूटती। स्टेशनों पर भी और चलती हुई ट्रेन में भी मिनरल वॉटर की बोतलें आसानी से मिलती हैं और सुकून से पी जाती हैं।

हमें पता ही नहीं चल पाया और हम अपने ही उन सभी ठिकानों से बेदखल कर दिए गए जिनके साथ पीढ़ियों से जुड़े हुए थे। तीज-त्यौहारों पर घरों में पूजन करवाने वाले पंडितजी फोन पर प्रार्थना करते हैं कि उन्हें नौकरी की जरूरत है। यजमान धीरे-धीरे कर्मकांड छोड़ रहे हैं। महीने में बीस-पच्चीस दिन काम नहीं रहता। कोई वक्त शायद ऐसा भी आए जब यज्ञोपवीत ढूंढ़ने के लिए संग्रहालयों में जाना पड़े। पीत्जा संस्कृति में अपना वजन बढ़ा रही नई पीढ़ी को उनकी कारें उन कोल्ड स्टोरेजों तक ही ले जा पाएंगी जहां ऊंची किस्म के गेहूं को सुरक्षित रखा जाता है। काली मिट्टी और गेहूं की बालियां इंसानी बस्तियों की पहुंच से लगातार दूर हो रही हैं। लहलहाती फसलें अब केवल फिल्मों में दिखाई देती हैं। कैमरों की आंखों से खेत और किसान दोनों ही रंगीन नजर आते हैं। कर्ज में डूबे हुए किसान सैकड़ों की संख्या में आत्महत्याएं करते रहते हैं पर कहीं कोई शोक सभा नहीं आयोजित होती। दूसरी ओर, फिल्मी सितारों के जेलों में प्रवेश करते और बाहर निकलते वक्त समूचा मीडिया और संगठित दर्शक समुदाय भाव विभोर होकर आंसू बहाता रहता है। हमें ही पता नहीं कि हम कितने बदल गए हैं।

हमारा सबकुछ हमारी आंखों के सामने और देखते-देखते खत्म हो रहा है और हम हैं कि देख ही नहीं पा रहे हैं। नदियां पहले नालों में बदलीं फिर उन पर बस्तियां खड़ी हो गईं। सड़कों के दोनों ओर लहलहाते बूढ़े-जवान पेड़ ईंधन में बदलकर धुंआ हो गए। इतना सब हो गया पर न तो हमें कभी गुस्सा आया और न ही आंखों से आंसू फूटे। ताजा सब्जियां और फल बेचने वाले अत्याधुनिक स्टोर की तरफ पत्थर उछालती भीड़ में शामिल होकर नाराजगी जाहिर कर देने भर से जो खत्म हो रहा है, वह कभी वापस लौटने वाला नहीं। अब तो कासाबियां भी अपनी जगह खड़ा हुआ नहीं मिलता और समूचा जहाज जलकर खाक भी हो जाता है।