क्या खुद सीबीआई आजाद होना चाहती है?

सुप्रीम कोर्ट सीबीआई को तमाम तरह के राजनीतिक दबावों, अतिक्रमणों और “राजनीतिक आकाओं” के नियंत्रण से मुक्त कर उसे स्वायत्तता प्रदान कराना चाहती है, पर केंद्रीय जांच ब्यूरो भी अपने आपको राजनीतिक गुलामी से मुक्त देखने के लिए न्यायपालिका की तरह ही बेताब है, इस पर थोड़ा-सा संदेह व्यक्त किया जा सकता है। मामला केवल कोयला खदानों के आवंटन में हुए भ्रष्टाचार और उसकी निष्पक्ष जांच में राजनीतिक हस्तक्षेप तक सीमित नहीं माना जाना चाहिए। सीबीआई को राजनीतिक नियंत्रण से मुक्त करने का अंतिम परिणाम यह हो सकता है कि देश भर में विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार और काले कारनामों की जांच में लगी सभी तरह की संस्थाएं और एजेंसियां भी अपनी आजादी के लिए छटपटाने लगेंगी।अगर ऐसा होने लगा तो अपने विपक्षियों के खिलाफ जांच एजेंसियों की मदद से राजनीतिक षड्‌यंत्र रचने के तमाम कारखानों पर ताले पड़ जाएंगे।स्वतंत्रता प्राप्ति और गणतंत्र की स्थापना के बाद जितने भी राजनीतिक छल-कपट हुए हैं, उनके दस्तावेज उन ईमानदार अधिकारियों के निजी लॉकरों से बाहर आने लगेंगे, जिन्हें कि जनता और न्यायपालिका के प्रति उस “विश्वास” को कायम रखने की भारी कीमतें चुकाना पड़ी हैं जिसे कि ताजा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने “जबरदस्त विश्वासघात” निरूपित किया है।

प्रधानमंत्री ने कहा है कि जो भी कार्रवाई जरूरी होगी, वह सुप्रीम कोर्टद्वारा की गई टिप्पणियों का उनके द्वारा अध्ययन करने के बाद की जाएगी।प्रधानमंत्री ने यह नहीं बताया कि वे इस अध्ययन को पूरा करने में कितना समय लेंगे।हमें पता है कि प्रधानमंत्री अपने कोयला मंत्री जितना बड़ा मुंह नहीं खोलते और यूपीए सरकार को किसी भी बात की जल्दी नहीं है। सुप्रीम कोर्टको विनीत नारायण मामले में अपने ही द्वारा पंद्रह वर्ष पूर्व दिए उस फैसले का जिक्र मंगलवार को करना पड़ा, जिसमें सीबीआई को स्वतंत्र संस्था बनाने की बात तब कही गई थी।सुप्रीम कोर्टकी ताजा टिप्पणी के बाद सरकार इस बार चुनावों तक के पंद्रह महीनों की नींद तो ले ही सकती है। गौर किया जाए कि विनीत नारायण मामले में टिप्पणी के बाद देश में पांच वर्षों तक एनडीए की हुकूमत रही, पर सीबीआईको कौड़ी भर स्वायत्तता नहीं प्रदान की गई।सीबीआई के काम में हस्तक्षेप के आरोप में प्रधानमंत्री और अश्वनी कुमार का बलिदान मांगने वाली भाजपा के नेता अरुण जेटली एक लंबे समय तक देश के कानून मंत्री थे। सीबीआई को स्वायत्तता प्रदान करने का अर्थ अंततः इसी हकीकत को उजागर करने वाला साबित हो सकता हैकि सत्ता और कोयले की दलाली में सबकी बराबरी की हिस्सेदारी होती है। सुप्रीम कोर्ट की लताड़ के बावजूद अगर सरकार बहादुरी के साथ मोटी चमड़ी ओढ़े हुए है तो भरोसा रखना चाहिए कि कहीं भी कुछ नहीं बदलने वाला है। सीबीआईके निदेशक की प्रतिक्रिया है कि जांच एजेंसी को स्वायत्तता सरकार और न्यायपालिका के बीच का मामला है। दूसरी ओर मनमोहन सिंह सरकार के एक जिम्मेदार मंत्री का कहना है कि सुप्रीम कोर्टने “टिप्पणी” की है, कोई”फैसला” नहीं सुनाया है। प्रतीक्षा की जानी चाहिए कि सरकार अपने प्रचार तंत्र के जरिए इसी बीच बहस के लिए कोईनया मुद्दा जनता के बीच उछाल देगी और सीबीआई की स्वायत्तता का मुद्दा अगले तीस वर्षों के लिए फिर गायब हो जाएगा।