कोयले की कालिख पर डीजल का छिड़काव

डीजल की कीमतों में पांच रुपए लीटर (स्थानीय करों को छोड़कर) की वृद्धि के फैसले पर केवल दो तरह की प्रतिक्रियाएं ही दी जा सकती हैं। पहली तो यह कि : लड़ाई में हारती हुई सेनाएं जिस तरह से मैदान छोड़ने से पहले पुलों, सड़कों और संचार साधनों को ध्वस्त करने की हरकतों को अंजाम देती हैं और अपने कृत्य को जायज भी ठहराती है, सरकार का निर्णय उसी श्रेणी में शामिल किया जा सकता है। दूसरे यह कि : कोयले की कालिख में गले-गले तक लिप्त मनमोहनसिंह सरकार का यह मुलायमसिंह यादव को जवाब है कि समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस यूपीए-दो से समर्थन वापस लेकर दिखाएं, कांग्रेस पार्टी मध्यावधि चुनावों के लिए तैयार है। और यह कि कांग्रेस के लिए इस समय प्राथमिकता प्रधानमंत्री की गिरती छवि को बचाना है, सरकार को सुरक्षित रखना नहीं।

इस बात पर गौर किया जा सकता है कि भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते जिस तरह से सरकार को संसद से सड़क तक संकटों का सामना करना पड़ रहा है वह एक ऐसे फैसले पर किस हिम्मत से मोहर लगा सकती है जिससे अंततः उसी मतदाता की जेब कटने वाली है जिसके दम पर वह फिर से सरकार बनाने के ख्वाब देख रही है। राजनीतिक अनिश्चितता और गठबंधनों के बनते-बिगड़ते समीकरणों के बीच कोई भी समझदार हुकूमत इस तरह के निर्णय लेने से परहेज बरतती है। पर सरकार ने जिस तरह की जोखिम मोल ली है वह निश्चित ही उसकी किसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है जिसके राजनीतिक नतीजे आने वाले दिनों में देखने को मिल सकते हैं। बहुत मुमकिन है कि विपक्षी पार्टियों के साथ ही अपने सहयोगी दलों की भी सांसें थामने के लिए कांग्रेस अपनी ओर से ही मध्यावधि चुनावों की घोषणा कर दे।

कांग्रेस को पता है कि प्रमुख विपक्षी दल (भाजपा) अब संसद चलने नहीं देगा। कोयले की लड़ाई अब चुनावी झंडों और पोस्टरों के जरिए सड़कों पर ही लड़ी जाने वाली है। विपक्षी दलों का साथ अपरोक्ष रूप से समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस भी देने वाली हैं। और सबसे बड़ी बात यह कि सरकार की लोकप्रियता का ग्राफ वक्त के बीतने के साथ और ज्यादा गिरने ही वाला है। अतः प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवारी के सवाल पर अपने ही अंदरूनी झगड़ों से त्रस्त भाजपा को चुनावों के मोर्चे पर ललकारने के लिए कांग्रेस के पास इससे बेहतर कोई अवसर नहीं हो सकता था। सभी पार्टियां जानती हैं कि सरकार अब किसी भी दबाव के आगे झुककर इस मूल्य वृद्धि को वापस नहीं लेने वाली है। वह सहयोगी दलों को भी बाध्य करने की रणनीति चलाएगी कि वे समर्थन वापस लेकर सरकार को गिराने की हिम्मत दिखाएं। अमेरिकी मीडिया सहित वे तमाम लोग जो अब तक आरोप लगाते हैं कि डॉ. मनमोहनसिंह ऐसे ढीले-ढाले प्रधानमंत्री हैं जो फैसले लेने से कतराते हैं उनके लिए यह चौंकने का क्षण है। अपनी सरकार को पूरी तरह से गिराने से पहले प्रधानमंत्री ऐसे और भी चमत्कार करके दिखा सकते हैं। निश्चित ही उनके ये फैसले श्रीमती सोनिया गांधी और राहुल गांधी की स्वीकृति के बगैर नहीं हो रहे हैं। अतः समाजवादी पार्टी राहुल गांधी की भूमिका को लेकर अपने बयान पर पुनर्विचार भी कर सकती है। अमेरिकी मीडिया की ताजा प्रतिक्रिया की भी प्रतीक्षा की जा सकती है।