केजरीवाल का जनमत-संग्रह, राहुल की ‘बरामदगी’

राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी का मुकाबला करने की तैयारी शुरू कर दी है। अण्णा हजारे के समर्थन से डिब्बा-बंद सरकारी लोकपाल बिल को राज्यसभा से पारित करवा लिया गया है। आज लोकसभा में भी पारित करवा लेंगे। अण्णा की जान को कुछ हो जाता तो कांग्रेस की बची-खुची सरकार का भी बचना मुश्किल हो जाता। यह काम अरविंद केजरीवाल की ‘आम आदमी पार्टी’ के विरोध के बावजूद संपन्न् हो गया। दूसरी ओर, दिल्ली में सरकार ‘बनवाने’ के लिए कांग्रेस की ओर से बिना शर्त समर्थन की पेशकश करके ऐसा दांव चलाया गया है कि अरविंद केजरीवाल भी उलझ गए हैं। ”न समर्थन देंगे और न लेंगे” का निर्णय पहले से घोषित कर चुके झाडूदार केजरीवाल ने सफाई के साथ गेंद फैसले के लिए जनता के पाले में खिसका दी है। कांग्रेस अब जनता की तरफ से अरविंद को कहलवा सकती है कि ‘सरकार बनाओ!’ ‘आम आदमी पार्टी’ को मजबूरन ही सही, सरकार बनाना भी पड़ेगी और उसे चलाकर भी दिखाना पड़ेगा। राहुल गांधी के तीसरे कदम की यहां चर्चा नहीं करते कि अमेरिका के खिलाफ (मनमोहन सिंह की ‘शायद’ मंजूरी लिए बिना) जनता का दिल जीतने के लिए सरकार ने जो कड़ा कदम उठाया है, उसका नरेंद्र मोदी को भी समर्थन करना पड़ा है। चार राज्यों में हुए चुनावों से पिटी पड़ी कांग्रेस की तरफ से क्या इतनी जल्दी अलग-अलग मोर्चों पर त्वरित कार्रवाई की उम्मीद की जा सकती थी? नरेंद्र मोदी को अब किसी राज्य में कोई आमसभा नहीं संबोधित करनी है।

दिल्ली में ‘आम आदमी पार्टी’ की सरकार का बनवाना इसलिए जरूरी माना जा रहा है कि छह महीनों तक राष्ट्रपति शासन का सन्नाटा रहने के बाद चुनाव हुए तो कांग्रेस और ‘आप’ दोनों का भारतीय जनता पार्टी सफाया कर देगी। ‘आम आदमी पार्टी’ इस तरह की परिस्थितियों के लिए तैयार नहीं थी। जनता की राय केजरीवाल को रविवार तक मिल जाएगी। अब देखने वाली बात यह होगी कि कांग्रेस के इस ‘रियलिटी शो’ में जनता अपनी राय के जरिए ‘आप’ के ‘बिग बॉस’ को गुलदान भेंट करती है या लानतें रवाना करती है। मीडिया कंपनियों की भूमिका एक बार फिर महत्वपूर्ण हो जाएगी। मीडिया कंपनियों के प्रबंधक एसएमएस, फोन-कॉल्स, फेसबुक, टि्वटर का थोकबंद इस्तेमाल जनता की भावनाएं पार्टियों की व्यथानुकूल केजरीवाल तक पहुंचाने में कर सकते हैं। सही पूछा जाए तो केजरीवाल यह जनमत-संग्रह इस नब्ज को टटोलने के लिए कर रहे हैं कि भाजपा को पूर्ण बहुमत न देकर जनता अब कहीं पछता तो नहीं रही है। और दूसरे यह भी कि अगर जनता वास्तव में ‘आप’ को कांग्रेस का समर्थन लेने से मना कर देती है तो केजरीवाल अपने आपको इस आरोप से बरी मान लेंगे कि उन्हें सरकार बनाने का मौका मिला और वे जिम्मेदारी लेने से बच भागे। भाजपा के मीडिया मैनेजर अगर जनता की ओर से यह संदेश स्थापित करवाने में कामयाब हो जाते हैं कि ‘आप’ को कांग्रेस का समर्थन लेकर सरकार बनाना ही चाहिए तो फिर डॉ. हर्षवर्द्धन को अरविंद केजरीवाल की भूमिका निभाने का अवसर मिल जाएगा। भाजपा को दिल्ली में हाल-फिलहाल इसी भूमिका की तलाश है। कांग्रेस दिल्ली में मैदान ‘आम आदमी पार्टी’ और भाजपा के बीच लड़ाई के लिए तैयार कर रही है। अगर सरकार नहीं चल पाती है तो उसका दोष भाजपा पर जाएगा और चल निकलती है तो उसकी सारी क्रेडिट राहुल गांधी के खाते में जाएगी। अरविंद केजरीवाल अगर सरकार बनाने को तैयार हो जाते हैं तो कांग्रेस उन्हें केवल बिना शर्त समर्थन ही नहीं देगी, सरकार चलाने का गुर भी सिखाएगी। वैसे में शीला दीक्षित के लिए भी कोई मौन भूमिका बन सकती है, जिन्हें कि अरविंद केजरीवाल ने हराया है। इस ‘शो’ के फैसले के लिए सोमवार तक तो प्रतीक्षा करनी ही पड़ेगी।