काशी से भाग न पाएं केजरीवाल

रविंद केजरीवाल नरेंद्र मोदी से हकीकत में ही टकराना चाहते हैं या फिर कोई नुक्कड़ नाटक कर रहे हैं? अगर ऐसा सही है तो फिर ‘आम आदमी पार्टी’ के संस्थापक-नेता को 25 मार्च की प्रतीक्षा नहीं करना चाहिए, जब वे भगवान शंकर के त्रिशूल पर विराजित दुनिया के सबसे प्राचीन शहर वाराणसी में रैली निकालकर जनता से पूछेंगे कि उन्हें वहीं से चुनाव लड़ना चाहिए या नहीं। काशी और दिल्ली में फर्क है। उतना ही, जितना कि गंगा और यमुना में। दिल्ली की तर्ज का जनमत संग्रह वाराणसी में कारगर साबित नहीं हो सकेगा। मोदी के खिलाफ केजरीवाल का लड़ना अब इसलिए ज्यादा जरूरी हो गया है कि कांग्रेस ने चुनावों से पहले ही गुजरात के मुख्यमंत्री के सामने हथियार डाल दिए हैं। उसे वाराणसी से मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए कोई अखिल भारतीय कद का नेता पार्टी में हाल-फिलहाल नहीं दिख रहा है। वाराणसी में मामला इंदिराजी के खिलाफ राजनारायण और सोनिया गांधी केे खिलाफ सुषमा स्वराज के संघर्ष करने जैसा बन रहा है। केजरीवाल का लड़ना इसलिए आवश्यक हो गया है कि वाराणसी में नरेंद्र मोदी को वॉकओवर नहीं मिलना चाहिए। देश को पता चलना चाहिए कि पिछले चुनाव में केवल सत्रह हजार मतों से मुश्किल से जीत दर्ज कराने वाले डॉ. मुरली मनोहर जोशी की सीट से अब नरेंद्र मोदी कितनी बड़ी फतह हासिल करते हैं। वाराणसी यह भी स्थापित करेगा कि बाबा विश्वनाथ की नगरी के लाखों मुस्लिम मतदाता नरेंद्र मोदी को भारत देश का अगला प्रधानमंत्री बनवाने में अपनी किस तरह की भूमिका निभाते हैं। वाराणसी में नरेंद्र मोदी के पक्ष में पड़ने वाला मुस्लिम वोट न सिर्फ उन्हें वर्ष 2002 के अभिशाप से मुक्त करेगा, देश के करोड़ों अल्पसंख्यकों का उनके नेतृत्व में यकीन होने की पुष्टि भी करेगा। साथ ही यह भी कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के लिए अपनी अखिल भारतीय स्वीकृति पर मोहर लगवाने के लिए वाराणसी से श्रेष्ठ और कोई स्थान नहीं हो सकता।

केजरीवाल अगर चाहें तो वाराणसी में नरेंद्र मोदी को ‘सीरियसली’ चुनाव लड़ने के लिए मजबूर कर सकते हैं। अगर वे नई दिल्ली में शीला दीक्षित की तरह ही वाराणसी में मोदी को चुनौती देने में कामयाब हो जाते हैं तो फिर भारतीय जनता पार्टी और भारतीय राजनीति दोनों का ही इतिहास बदल जाएगा। मोदी के लिए वाराणसी से केवल चुनाव भर जीत लेना या पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा उससे लगे हुए बिहार की सीटों को प्रभावित करना ही बड़ी उपलब्धि नहीं माना जाना चाहिए। असल चुनौती यह है कि मोदी वाराणसी में मतों के ध्रुवीकरण को रोककर देश को कोई नया संदेश देने में कितने कामयाब होते हैं। नरेंद्र मोदी को गुजरात के सुरक्षित अभयारण्यों से बाहर निकालकर उस उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधि बनाना जरूरी है, जिसने कि देश को सबसे अधिक प्रधानमंत्री दिए हैं। राहुल गांधी केवल नरेंद्र मोदी का विरोध कर रहे हैं, जबकि केजरीवाल गुजरात के मुख्यमंत्री के साथ-साथ बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों और ‘बिक चुके’ मीडिया की भी जमकर मुखालफत कर रहे हैं। वाराणसी में केजरीवाल की मोदी से लड़ाई यह भी बताएगी कि देश ‘आम आदमी पार्टी’ की राजनीति को कितनी दूरी तक ले जाने के लिए तैयार है। वाराणसी में केजरीवाल के साथ-साथ देश के मीडिया की विश्वसनीयता भी साबित हो जाएगी।

मोदी को गुजरात से बाहर निकालकर वाराणसी लाना इसलिए भी जरूरी है कि अगर वे गुजरात की सीट को ही अपना सुरक्षा कवच बनाए रखेंगे तो गांधीनगर की हुकूमत से अपने आपको कभी मुक्त नहीं कर पाएंगे, जैसा कि वर्तमान में वे कर रहे हैं। वे भारत का प्रधानमंत्री बनने के लिए तो देशभर में फेरी लगा रहे हैं, पर गुजरात में अपने स्थान पर किसी और नेता को मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी उन्होंने अब तक नहीं सौंपी है। इसे उनका असुरक्षा भाव भी माना जा सकता है और यह भी कि उनके द्वारा गुजरात में अपनी सत्ता को ‘डायल्यूट’ करने देने का अर्थ अपने खिलाफ विद्रोह को जान-बूझकर आमंत्रण देना भी हो सकता है। ममता बनर्जी भी ऐसा ही करती रही हैं। वे भी प्रधानमंत्री बनना चाहती हैं, पर कोलकाता की रायटर्स बिल्डिंग का मोह भी नहीं छोड़ना चाहतीं। भारत सरकार की रेल मंत्री के रूप में उन्होंने अपना सारा कामकाज कोलकाता में बैठकर ही निपटाया। भारतीय जनता पार्टी की चुनाव प्रचार समिति का काम संभालने के बाद नरेंद्र मोदी ने जो काम सबसे पहले किए, उनमें गुजरात के पूर्व गृह राज्यमंत्री और अपने अत्यंत विश्वस्त सहयोगी अमित शाह को उत्तर प्रदेश की बागडोर सौंपना शामिल था। इससे यही पता चलता है कि उत्तर प्रदेश की स्थानीय राजनीति में सक्रिय पार्टी के महारथी मोदी का विश्वास अर्जित करने में सफल नहीं रहे। कोई आश्चर्य नहीं अगर अमित शाह के चयन को लेकर मुरली मनोहर जोशी, लालजी टंडन और कलराज मिश्र सहित किसी भी बड़े नेता ने तब उस तरह से आवाज उठाने की हिम्मत नहीं दिखाई, जैसी कि हाल ही में वाराणसी, लखनऊ और कानपुर की सीटों के लिए टिकटों की दावेदारियों को लेकर सुनाई दी।

रविंद केजरीवाल का मानना है कि देश की जनता ‘आम आदमी पार्टी’ के नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार है। यह उनका एकतरफा भ्रम भी हो सकता है। केजरीवाल अगर वाराणसी में जनमत संग्रह की आड़ लेकर मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने से कन्‍नी काटते हैं तो यह भ्रम 2019 के लोकसभा चुनावों तक भी बना रह सकता है। केजरीवाल ने जो रास्ता अख्तियार किया है, उस पर टिके रहना अब उनकी राजनीतिक मजबूरी बन गया है। उन्होंने अपने चेहरे से ‘आदरणीय अण्णाजी’ के मुखौटे को उतार फेंका है। भारतीय जनता पार्टी के नाम पर अगर इस समय मंच पर केवल नरेंद्र मोदी नजर आते हैं तो आम आदमी पार्टी के नाम पर मंच पर केवल केजरीवाल। मोदी पर आक्रमण राहुल गांधी भी कर रहे हैं और केजरीवाल भी। दोनों का उद्देश्य एक ही है – मोदी को सत्ता में नहीं आने देना। कहा जा सकता है कि राहुल गांधी, आम आदमी पार्टी के नेता के मार्फत भी मोदी के खिलाफ अपनी लड़ाई चलाए हुए हैं। ऐसी स्थिति में केजरीवाल को वाराणसी के मैदान से भागने नहीं दिया जाना चाहिए।