कांग्रेस की जीत या भाजपा की हार?

भारतीय जनता पार्टी को कर्नाटक में अपनी शर्मनाक हार का समाचार एक ऐसे समय प्राप्त हुआ है जब उसके नेता दिल्ली में डॉ. मनमोहन सिंह और उनके दो मंत्रिमंडलीय सहयोगियों-अश्वनी कुमार और पवन बंसल-के सिर हासिल करने के संघर्ष और प्रधानमंत्री पद के लिए अपना उम्मीदवार तय करने के लिए तलवारें भांज रहे हैं। कर्नाटक के परिणामों के बाद निश्चित ही पार्टी के सारे अंदरूनी समीकरण बदल जाएंगे और इस चिंताजनक हार को परदे के पीछे धकेलने के लिए भाजपा केंद्र सरकार के खिलाफ अपनी लड़ाई और तूफानी कर देगी। बताने की जरूरत नहीं कि वर्ष 2008 के चुनावों में पार्टी को जितनी सीटें मिली थीं, उनमें से इस बार लगभग 70 कम हो गई हैं। उसके पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के अलावा शेट्टार मंत्रिमंडल के 12 सदस्य भी चुनाव में खेत रहे। भाजपा में प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार नरेंद्र मोदी ने कर्नाटक में जिन तीन इलाकों में चुनाव-प्रचार किया, वहां भी उम्मीदवारों का वैसा ही सफाया हुआ जैसा कि हिमाचल के चुनावों में हुआ था। पार्टी में मोदी-विरोधियों के लिए गुप्त रूप से प्रसन्न् होने के पर्याप्त कारण बन गए हैं। पूछा जा सकता है कि कर्नाटक में इस चिंताजनक प्रदर्शन के लिए भाजपा में शीर्ष स्तर पर किन नेताओं से इस्तीफों की मांग की जाएगी?

कांग्रेस के लिए कर्नाटक में जश्न मनाने का इसलिए कोई कारण नहीं बनता कि वह भाजपा की हार को अपनी जीत बताना चाहती है जो कि सच नहीं है। श्रीराम सेना, बजरंग दल सहित कट्टर हिन्दूवादी संगठनों की युवाओं पर हुई ज्यादतियों और येदियुरप्पा के पारिवारिक भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता के सामने कर्नाटक में विकल्प कुएं और खाई के बीच ही किसी एक को चुनने का उपलब्ध था। कर्नाटक में सभी दलों की राजनीति ‘खदानों और ‘खानदानों के दम पर ही चलती और फलती-फूलती है। कांग्रेस भी कोई अपवाद नहीं है। कांग्रेस के वहां सत्ता में आ जाने के बाद प्रदेश में कोई भ्रष्टाचार-मुक्त शासन स्थापित हो जाएगा, इसमें शक है। दूसरे यह कि कर्नाटक में जीत को केंद्र में सरकार के भ्रष्टाचार के प्रति जनता की स्वीकृति मानने का जोखिम उठाना कांग्रेस को महंगा पड़ सकता है। कांग्रेस को इसे इस चेतावनी के रूप में ही ग्रहण करना चाहिए कि दिल्ली में उसका कारोबार इसी तरह से चलता रहा तो देश की जनता लोकसभा चुनावों में उसे भी उसी तरह निपटा देगी जैसा सुलूक कर्नाटक में भाजपा के साथ हुआ है। भाजपा ने कांग्रेस से पूछा है कि अगर वह (भाजपा) सभी जगह हार जाती है तो भी क्या इससे उसे (कांग्रेस को) पूरे देश में लूट करने का लायसेंस प्राप्त हो जाता है? सही पूछा जाए तो कर्नाटक के अनुभव के बाद सभी सरकारों को मतदाताओं के साथ मनमानी छूट लेने की ज्यादती नहीं करनी चाहिए। कर्नाटक का फैसला देश की जनता के बदलते हुए मूड की ओर इशारा है और इससे उन सभी दलों को सबक लेने की जरूरत है जो मतदाताओं को भेड़-बकरियों का समूह मानकर हांकते रहने की बार-बार जुर्रत करते रहते हैं। कर्नाटक की जीत में कांगे्रस इस श्रेय की हकदार अपने को अवश्य मान सकती है कि जहां मोदी चुनाव प्रचार करके सफल नहीं हो पाए वहां पार्टी उपाध्यक्ष का पद ग्रहण करने के बाद राहुल ने अपनी पहली जीत दर्ज करा दी।