कहीं एक मोहरा भर तो नहीं हार्दिक?

किसने सोचा था कि जो नरेंद्र मोदी एक सफल मुख्यमंत्री के रूप में गुजरात में किए गए विकास की उपलब्धियों के आधार पर देश के प्रधानमंत्री के पद पर पहुंचे थे, उनके उसी प्रदेश के नागरिकों से उन्हें एक दिन दिल्ली में बैठकर शांति बनाए रखने की अपील करनी पड़ेगी और कहना पड़ेगा कि हिंसा से कुछ नहीं मिलेगा। कोई सवा छह करोड़ की जनसंख्या वाले गुजरात में पटेल-पाटीदार समुदाय द्वारा आरक्षण की मांग को लेकर किए जा रहे आंदोलन के दौरान हिंसा और अविश्वास का जो माहौल कायम हो गया है, वह कब और किस तरह से पूरा शांत होगा, कुछ नहीं कहा जा सकता। इस तरह के भी कोई अनुमान हाल-फिलहाल नहीं लगाए जा सकते कि गुजरात की घटनाओं का क्या और कितना प्रभाव प्रदेश की राजनीति पर आगे चलकर पड़ने वाला है। पटेल-पाटीदार समाज के लोगों का इस तरह से अहमदाबाद की सड़कों पर उतर आना और बाइस वर्ष के एक नौजवान नेता द्वारा प्रदेश की मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को सार्वजनिक रूप से चुनौती दे देना प्रशासन तंत्र की कमजोरी और प्रदेश के उस राजनीतिक नेतृत्व की विफलता को उजागर करता है, जिसके हाथों में सत्ता के सूत्र सौंपकर नरेंद्र मोदी ने देश की राजधानी की ओर रुख किया था। हार्दिक पटेल की आकांक्षाएं चार-पांच लाख आंदोलनकारियों के समुद्र को देखकर किस तरह से हिलोरें ले रही थीं, इसका पता इस तथ्य से लगता है कि राजनीति का नौसिखिया समझा जाने वाला नेता हिंदी में ललकार रहा था और प्रधानमंत्री अपने प्रदेशवासियों से गुजराती में शांति बनाए रखने का आग्रह कर रहे थे।

शिक्षण और रोजगार के क्षेत्र में एक ऐसे समुदाय के लोगों द्वारा आरक्षण की मांग करना, जिसकी गणना आमतौर पर गुजरात के संपन्न वर्ग में होती है, समझ से परे माना जा रहा है। वर्ष 2002 में गोधरा की दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद गुजरात में हुई हिंसक घटनाओं का अगर जिक्र छोड़ दिया जाए तो इसी तरह का बड़ा आंदोलन राज्य में कोई पैंतीस साल पहले हुआ था। गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन के नाम से जाने गए युवाशक्ति के विस्फोट ने उस समय के मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल की सत्ता को हिलाकर रख दिया था और उन्हें बाद में पद छोड़ना पड़ा था। इस समय एक अन्य पटेल आनंदीबेन सत्ता में हैं। उस समय भी नवनिर्माण आंदोलन के मूल में आरक्षण का ही मुद्दा था, जो बाद में अन्य मांगों में बदल गया और हिंसा हुई। बहुत मुमकिन है कि प्रधानमंत्री मोदी को अपने गृह प्रदेश में आगे या पीछे नेतृत्व परिवर्तन का फैसला करना पड़े, पर उसके परिणाम पार्टी के आंतरिक समीकरणों को किस तरह से प्रभावित करेंगे, अभी कुछ भी नहीं कहा जा सकता। भाजपा के वर्तमान विधायकों में एक बड़ी संख्या (आधी के करीब) पटेल-पाटीदार समुदाय से जुड़े लोगों की है। आंदोलनकारियों के विरोध के निशाने पर अपने ही समुदाय से संबद्ध विधायक और मंत्री भी हैं। प्रदेश के गृह राज्यमंत्री रजनी पटेल का आवास भी आंदोलनकारियों के हमले से नहीं बच पाया।

भाजपा नेतृत्व के लिए यह चिंता का विषय हो सकता है क्योंकि पटेल-पाटीदार समुदाय उसका एक बड़ा और विश्वसनीय वोट बैंक रहा है। विदेशों में भी व्यापार-व्यवसाय में इस समुदाय के लोगों का वर्चस्व है। ऐसे में अगर यह वोट बैंक हाथ से खिसकता है और आने वाले चुनावों में प्रधानमंत्री को अपने ही प्रदेश में एक और चुनौती का सामना करना पड़ता है तो उसका प्रभाव उनकी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी पड़ेगा। दूसरा यह कि इस आंदोलन को काबू में नहीं किया गया तो सांप्रदायिक तनावों के परिणामों से उबरकर विकास के रास्ते पर बढ़ रहा गुजरात जाति-संघर्ष की आग में जलने लगेगा। पटेल-पाटीदार समुदाय की मांग है कि या तो उसे भी ओबीसी की श्रेणी में डालकर शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ मिले या फिर आरक्षण की समूची व्यवस्था को ही खत्‍म कर दिया जाए। गुजरात में वर्तमान में ओबीसी आरक्षण 27 प्रतिशत है। राज्य की दलित आबादी न तो 27 प्रतिशत के ओबीसी आरक्षण में पटेल-पाटीदारों की भागीदारी स्वीकार करेगी और न ही आरक्षण की व्यवस्था को ही समाप्त होने देगी। इसका अर्थ यह होगा कि दोनों वर्गों के बीच जातीय संघर्ष बढ़ेगा, जैसी कि स्थिति कुछ अन्य राज्यों में है।

इसमें तो कोई शक नहीं हो सकता कि पटेलों और पाटीदारों को इतनी बड़ी संख्या में संगठित करने के लिए हार्दिक पटेल जैसे नेता के पास न तो आर्थिक ताकत हो सकती है और न बौद्धिक-राजनीतिक समझ व क्षमता। निश्चित ही परदे के पीछे कुछ अन्य ताकतें व दिमाग हो सकते हैं। राज्य सरकार की भूमिका इसलिए सवालों के घेरे में आ सकती है कि वैसे तो आरक्षण की मांग को लेकर पटेल-पाटीदारों का आंदोलन वर्ष 2011 से चल रहा था, पर राज्य में मोदी की उपस्थिति के कारण वह ज्यादा मुखर नहीं हो पाया। मोदी की उपस्थिति का ऐसा प्रभाव था कि सरदार पटेल ग्रुप के आंदोलनकारी वीरमगाम तक ही सीमित रह गए। पर आश्चर्य इस बात का है कि 6 जुलाई को मेहसाणा के विसनगर जैसे छोटे-से स्थान पर भी लगभग पच्चीस हजार पटेल-पाटीदार आरक्षण की मांग को लेकर हार्दिक पटेल की रैली में एकत्र हो गए थे, पर राज्य सरकार तब भी हरकत में नहीं आई। इसीलिए 25 अगस्त को अहमदाबाद व गुजरात के अन्य स्थानों पर जो कुछ होने जा रहा था, उससे निपटने को आनंदीबेन पटेल सरकार या तो तैयार नहीं थी या स्थिति को काबू करने में विफल हो गई। दोपहर तक जो रैली पूरी तरह से अनुशासित थी, हार्दिक की गिरफ्तारी और रिहाई के बीच एक हिंसक भीड़ में बदल गई।

पटेल-पाटीदारों का आंदोलन आगे चलकर किस तरह की करवट ले सकता है, इसका पता तभी चलेगा, जब इसके पीछे की असली ताकतों के बारे में सरकार किसी नतीजे पर पहुंच सकेगी। हो सकता है अहमदाबाद की रैली की ‘सफलता’ से उत्साहित होकर हार्दिक किसी और बड़े शक्ति-प्रदर्शन की तैयारी में हों या फिर वे अनशन आदि करने पर उतर आएं। आंदोलन पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा या दबा दिया जाएगा, इस बात की संभावना इसलिए कम दिखती है क्योंकि गुजरात के डेढ़ करोड़ (आबादी का 25 प्रतिशत) पटेलों और पाटीदारों के बीच आपसी एकता जबर्दस्त है और हो सकता है कि हार्दिक पटेल का इस्तेमाल केवल एक मोहरे के तौर पर किया जा रहा हो।